Explainer: चीन की सोलर टेक्नोलॉजी पर पाबंदी से भारत के सौर ऊर्जा मिशन को क्या खतरा है?
Explainer: दुनिया भर के देश ऊर्जा के पारंपरिक स्रोतों को छोड़कर अब वैकल्पिक एनर्जी की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं. जिसके लिए सौर ऊर्जा सबसे अच्छा विकल्प माना जा रहा है. ऐसे में भारत समेत दुनिया के सभी देश अपनी सौर क्षमताओं को दिन-रात बढ़ाने में लगे हैं. जिससे सौर ऊर्जा से अपनी विद्युत से जुड़ी सभी जरूरतों को पूरा किया जा सके. इस बीच चीन ने एक बड़ा फैसला लिया है. जो भारत समेत दुनिया के तमाम देशों के लिए मुसीबत पैदा कर सकता है.
चीन ने सोलर टेक्नोलॉजी को लेकर लिया बड़ा फैसला
दरअसल, चीन ने सौर ऊर्जा से जुड़े उपकरण बनाने में इस्तेमाल होने वाली अपनी 12 तकनीकी पर निर्यात नियंत्रण लगाने का प्रस्ताव रखा है. जिसमें AI और बायोटेक्नोलॉजी भी शामिल हैं. हालांकि अभी यह एक व्यापक समीक्षा का हिस्सा है. इस कदम के पीछे चीन ने राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं का हवाला दिया है. बीते शुक्रवार को एक बयान में, चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने इन फोटोवोल्टिक तकनीकों को चीन की निर्यात-नियंत्रण सूची में शामिल करने का प्रस्ताव दिया.
मंत्रालय ने कहा कि इन पर कड़ी निगरानी की जरूरत है, क्योंकि सौर तकनीकों का इस्तेमाल एयरोस्पेस और राष्ट्रीय रक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में तेजी से बढ़ रहा है. इसी साल अप्रैल में एक रिपोर्ट सामने आई थी. जिसमें चीनी अधिकारियों ने एडवांस सोलर-पैनल निर्माण तकनीकों पर संभावित प्रतिबंधों को लेकर निर्माताओं के साथ शुरुआती बातचीत की थी. इस कदम से टेस्ला जैसी अमेरिकी कंपनियों की अमेरिका में अपना उत्पादन बढ़ाने की योजनाओं पर भी खतरा मंडराने लगा.
भारत को सोलर-निर्माण तकनीक के निर्यात पर भी लगाई रोक
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात ये है कि बीजिंग ने भारत को सोलर-निर्माण तकनीक के निर्यात पर भी रोक लगा दी है. विश्लेषकों का कहना है कि इस क्षेत्र में चीन अपना दबदबा बनाए रखना चाहता है, जबकि भारत घरेलू स्तर पर विनिर्माण क्षमता बढ़ाने और चीन पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है.
मंत्रालय ने कहा कि निर्यात प्रतिबंधों का उद्देश्य "तकनीकों के बेकाबू होने या उनके गलत तरीके से फैलने के जोखिमों से बचाव करना है, साथ ही विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सामान्य अंतरराष्ट्रीय आदान-प्रदान और सहयोग को सुरक्षित रखना है."
ऐसे में निर्यातकों को अब निर्यात नियंत्रण सूची के औपचारिक रूप से लागू होने तक कुछ विदेशी प्रौद्योगिकी हस्तांतरणों का पंजीकरण कराना होगा. इस प्रस्ताव पर सार्वजनिक परामर्श 15 नवंबर को समाप्त होगा.
चीन ने सौर ऊर्जा से जुड़ी इन तकनीकी पर लगाई रोक
बता दें कि चीन ने इस प्रतिबंध के तहत कुछ पतले वेफर्स, पेरोव्स्काइट और टैन्डम सौर सेल बनाने में प्रयुक्त तकनीकों के साथ-साथ बड़े पैमाने पर द्रवीकृत-बिस्तर पॉलीसिलिकॉन उत्पादन तकनीकों पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी शुरू कर दी है. बता दें कि पेरोव्स्काइट एक उभरती हुई तकनीक है जो रूपांतरण दक्षता बढ़ाने की क्षमता प्रदान करती है. टैन्डम सेल सूर्य के प्रकाश के स्पेक्ट्रम के अधिक भाग को ग्रहण करने के लिए पेरोव्स्काइट और सिलिकॉन परतों को संयोजित करते हैं.
पॉलीसिलिकॉन के उत्पादन के लिए द्रवीकृत-बिस्तर तकनीक- जो सौर पैनलों का एक प्रमुख घटक है. जिसे प्रचलित सीमेंस प्रक्रिया की तुलना में कम खर्चीली और अधिक ऊर्जा-कुशल माना जाता है. चीन उन्नत सौर सेल निर्माण तकनीकों, जिनमें TOPCon, HJT और XBC शामिल हैं, के निर्यात को भी प्रतिबंधित करेगा, हालांकि बीजिंग इस पर पूरी तरह से रोक नहीं लगाएगा.
चीन के प्रतिबंधों पर क्या होगा भारत पर असर?
भारत के घरेलू उद्योग पर बढ़ सकता है दबाव
भारत में सौर ऊर्जा उपकरणों के निर्माण को बढ़ावा देने की कोशिशों के बीच चीन द्वारा नई तकनीकी पर पाबंदियां लगाने से भारतीय कंपनियों के लिए चुनौती पैदा हो सकती है. खास तौर पर सोलर सेल, सिलिकॉन वेफर और अगली पीढ़ी की सौर तकनीकों तक पहुंच सीमित होने की स्थिति में भारत के घरेलू विनिर्माण क्षेत्र की रफ्तार प्रभावित होने की आशंका है.
नई सोलर तकनीक की दौड़ में भारत के सामने चुनौती
बता दें कि भारतीय सौर उद्योग का बड़ा हिस्सा फिलहाल PERC और TOPCon जैसी तकनीकों के विकास और उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर केंद्रित है. दूसरी ओर, पेरोव्स्काइट और टैंडम सोलर सेल जैसी उन्नत तकनीकों पर दुनिया भर में तेजी से काम हो रहा है.
अगर चीन इन तकनीकों से जुड़े उपकरणों, प्रक्रियाओं और तकनीकी ज्ञान के निर्यात पर सख्त पाबंदियां लगाता है, तो भारतीय कंपनियों के लिए नई तकनीक हासिल करना कठिन हो सकता है. इसका असर भविष्य में सौर सेल की कार्यक्षमता बढ़ाने और उत्पादन लागत घटाने की क्षमता पर भी पड़ सकता है.
चीन के साथ तकनीकी सहयोग की योजनाओं पर असर
इसके अलावा सौर ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए भारत को केवल सोलर पैनल असेंबल करने तक सीमित नहीं रहना होगा. इसके लिए पॉलीसिलिकॉन, सिलिकॉन वेफर और सोलर सेल जैसे शुरुआती उत्पादन चरणों में भी मजबूत घरेलू क्षमता विकसित करना जरूरी है. चीन की कंपनियों के पास इन क्षेत्रों में व्यापक औद्योगिक अनुभव और तकनीकी विशेषज्ञता है.
ऐसे में भारतीय कंपनियों के लिए संयुक्त उद्यम, मशीनरी की खरीद और तकनीकी सहयोग महत्वपूर्ण हो सकते हैं. अगर चीन तकनीक के हस्तांतरण पर प्रतिबंध कड़ा करता है, तो इस तरह की साझेदारियों को आगे बढ़ाने में मुश्किलें आ सकती हैं.
सोलर परियोजनाओं की समयसीमा पर पड़ सकता है असर
यही नहीं भारत की सौर ऊर्जा परियोजनाओं के निर्माण में केवल जमीन, निवेश और सोलर पैनल ही पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि उत्पादन उपकरण, विशेष मशीनरी, तकनीकी डिजाइन और इंजीनियरिंग विशेषज्ञता भी अहम भूमिका निभाते हैं. इनमें से किसी महत्वपूर्ण हिस्से की आपूर्ति बाधित होने पर नई विनिर्माण इकाइयों की स्थापना और उत्पादन शुरू करने में देरी होने की संभावना है.
बता दें कि भारत में सौर ऊर्जा की बढ़ती मांग को देखते हुए ऐसी रुकावटें परियोजनाओं की समयसीमा और लागत, दोनों को प्रभावित कर सकती हैं. हालांकि, वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि ये प्रतिबंध किन उत्पादों और तकनीकों पर लागू होते हैं तथा वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता कितनी जल्दी उपलब्ध होते हैं.
घरेलू उत्पादन महंगा होने की आशंका
बता दें कि पॉलीसिलिकॉन से लेकर वेफर और सोलर सेल तक की पूरी उत्पादन प्रक्रिया विकसित करने के लिए बड़ी पूंजी, विशेषज्ञ इंजीनियरिंग और उन्नत उपकरणों की जरूरत होती है. अगर चीनी तकनीक और मशीनरी तक पहुंच सीमित होती है, तो भारतीय निर्माताओं को दूसरे देशों से उपकरण खरीदने या अपनी तकनीक विकसित करने में अधिक निवेश करना पड़ सकता है. इससे अनुसंधान एवं विकास का खर्च बढ़ने के साथ नई उत्पादन इकाइयों को व्यावसायिक स्तर पर पहुंचाने में भी अधिक समय लग सकता है.
छोटे निर्माताओं की बढ़ सकती हैं मुश्किलें
दरअसल, बड़ी कंपनियों के मुकाबले छोटे और मध्यम सोलर उपकरण निर्माताओं के पास महंगी मशीनरी खरीदने, वैकल्पिक तकनीक विकसित करने और लंबे समय तक बढ़ी हुई लागत सहने की क्षमता कम होती है. अगर कच्चे माल, उपकरणों या तकनीकी सेवाओं की उपलब्धता प्रभावित होती है, तो इन कंपनियों के मुनाफे पर दबाव बढ़ सकता है. ऐसे में कुछ इकाइयों को विस्तार की योजनाएं टालनी पड़ सकती हैं, जबकि अधिक गंभीर स्थिति में उत्पादन घटाने की नौबत भी आ सकती है.
भारत के लिए क्या हो सकती है आगे की रणनीति?
बता दें कि चीन की तकनीकी पाबंदियों का संभावित असर सिर्फ सोलर पैनल उद्योग तक सीमित नहीं रहेगा. यह भारत की स्वच्छ ऊर्जा आपूर्ति शृंखला को अधिक आत्मनिर्भर बनाने की रणनीति के लिए भी एक महत्वपूर्ण परीक्षा होगी. इस चुनौती से निपटने के लिए भारत को घरेलू अनुसंधान एवं विकास, उन्नत सोलर सेल तकनीक, मशीनरी निर्माण और कच्चे माल की उपलब्धता पर एक साथ काम करना होगा. इसके अलावा, दूसरे देशों के साथ तकनीकी सहयोग और वैकल्पिक आपूर्ति के लिए प्लांट स्थापित करने होंगे.
ये भी पढ़ें: Explainer: AI एजेंट से साइबर हमले का खतरा, भारत की पहली चेतावनी; आखिर क्या दांव पर लगा है?
थाने में इश्क! शादीशुदा हेड कांस्टेबल और महिला सिपाही पर गिरी गाज, दोनों सस्पेंड
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
News Nation










