संयुक्त अरब अमीरात ने ईरान पर सैन्य हमले किए हैं, जिससे खाड़ी राजशाही ईरान के उस युद्ध में एक सक्रिय लड़ाकू के रूप में उभर रही है जिसमें ईरान का सबसे बड़ा निशाना वही देश रहा है। उसकी सेना पश्चिमी देशों में निर्मित लड़ाकू विमानों और निगरानी नेटवर्क से सुसज्जित है। और ये हमले संकेत देते हैं कि देश अब अपनी आर्थिक शक्ति और मध्य पूर्व में बढ़ते प्रभाव की रक्षा के लिए इनका उपयोग करने को अधिक इच्छुक है। वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट में दावा किया है कि संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने अप्रैल की शुरुआत में ईरान पर गुप्त रूप से सीधे हमले किए। रिपोर्ट के अनुसार, यूएई ने ईरानी क्षेत्र में हमले करके मध्य पूर्व के चल रहे संघर्ष में प्रवेश किया। रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त अरब अमीरात ने फारस की खाड़ी में लावन द्वीप पर स्थित ईरान की रिफाइनरी को निशाना बनाया। 2020 तक यह ईरान की 10वीं सबसे बड़ी रिफाइनरी थी और प्रतिदिन लगभग 60,000 बैरल कच्चे तेल का प्रसंस्करण कर रही थी।
कथित हमले की घटना उसी समय घटी जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पांच सप्ताह के हवाई अभियान के बाद अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष में युद्धविराम की घोषणा की। कथित हमलों के कारण, ईरान को कथित तौर पर कई महीनों तक सुविधा के कुछ हिस्सों को बंद करना पड़ा। उस दौरान, ईरान ने सार्वजनिक रूप से संयुक्त अरब अमीरात का नाम नहीं लिया और घटना को शत्रुतापूर्ण हमला बताया। हालांकि, खबरों के अनुसार, उसने संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत से जुड़े क्षेत्रों को निशाना बनाकर मिसाइल और ड्रोन हमले किए।
यूएई ने ईरान पर हमला किया: अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं
अब तक, यूएई की ओर से इन कथित हमलों के संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। यूएई के विदेश मंत्रालय ने पहले ही कहा था कि देश शत्रुतापूर्ण कृत्यों का सैन्य जवाब देगा। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि संयुक्त राज्य अमेरिका ने क्षेत्रीय गतिविधियों में यूएई की भागीदारी का स्वागत किया, यह देखते हुए कि उस समय तक युद्धविराम लागू नहीं हुआ था।
ईरान के साथ युद्धविराम नाजुक स्थिति में है: ट्रंप
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को कहा कि ईरान के साथ युद्धविराम ‘‘बेहद कमजोर और नाजुक’’ स्थिति में है। ट्रंप ने ईरान के साथ जारी युद्ध पर उसके शांति प्रस्ताव को एक दिन पहले ‘‘पूरी तरह से अस्वीकार्य’’ बताते हुए खारिज कर दिया था। शांति प्रस्ताव को अस्वीकार करने के बाद ईरान के साथ युद्धविराम पर एक सवाल के जवाब में ट्रंप ने ‘ओवल ऑफिस’ (राष्ट्रपति के कार्यालय) में पत्रकारों से कहा, ‘‘यह अपनी सबसे कमजोर स्थिति में है... उन्होंने जो बकवास हमें भेजा, उसे पढ़ने के बाद... तो यह गंभीर नाजुक स्थिति में है।’’ ट्रंप ने कहा, ‘‘उन्हें लगता है कि मैं इससे थक जाऊंगा, या ऊब जाऊंगा, या मुझ पर कुछ दबाव आ जाएगा, लेकिन कोई दबाव नहीं है, बिल्कुल भी दबाव नहीं है। हमें पूरी जीत मिलेगी।’’ ट्रंप को रविवार को ईरान का प्रस्ताव मिला, जिससे उम्मीद जगी थी कि इससे ईरान के साथ 28 फरवरी को शुरू हुए युद्ध को समाप्त करने में कोई सफलता मिल सकती है। इस युद्ध ने वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को अवरुद्ध कर दिया है, जिससे कई देशों में ईंधन की कमी हो गई है। उन्होंने रविवार को अपने ‘ट्रुथ सोशल’ पर लिखा, ‘‘मैंने अभी ईरान के तथाकथित ‘प्रतिनिधियों’ की प्रतिक्रिया पढ़ी है। मुझे यह पसंद नहीं आया, यह पूरी तरह से अस्वीकार्य है।’’ अमेरिका और इजराइल के बीच 28 फरवरी को शुरू हुए युद्ध के बाद आठ अप्रैल से हमले रोक दिए गए हैं, जब युद्धरत पक्षों ने युद्धविराम पर सहमति जताई थी। अमेरिका और ईरान स्थायी रूप से शत्रुता समाप्त करने के लिए एक समझौते पर बातचीत कर रहे हैं, लेकिन अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है। अमेरिका इस बात पर जोर दे रहा है कि ईरान अपने ऊपर लगे प्रतिबंधों को हटाने और अरबों डॉलर की जब्त ईरानी संपत्ति को जारी करने के बदले में अपने यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को समाप्त करने के संबंध में स्पष्ट और ठोस वादा करे। इन वार्ताओं में ईरान और अमेरिका द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकाबंदी हटाने का भी प्रावधान भी शामिल है, जो वैश्विक कच्चे तेल की आपूर्ति के पांचवें हिस्से के लिए एक महत्वपूर्ण मार्ग है।
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नई दिल्ली के गलियारों से लेकर टोक्यो के सत्ता केंद्रों तक एक ऐसी हलचल शुरू हुई है जिसने बीजिंग की रातों की नींद उड़ा दी है। भारत और जापान ने आधिकारिक तौर पर एक ऐसे समझौते पर मुर लगा दी है जो ना केवल इन दो देशों का भविष्य बदलेगा बल्कि पूरे इंडोपेसिफिक क्षेत्र में शक्ति के संतुलन को नई दिशा देगा। भारत जापान इकोनॉमिक सिक्योरिटी डायलॉग के दूसरे दौरे में वह बड़ा फैसला लिया गया जिसकी धमक आने वाले कई दशकों तक महसूस की जाएगी। भारत के विदेश सचिव विक्रम मिश्री और जापान के वरिष्ठ मंत्रियों के बीच हुई इस बैठक का सीधा लक्ष्य है ग्लोबल सप्लाई चेन से चीन के वर्चस्व को उखाड़ फेंकना। दोनों देशों ने तय किया कि वे रणनीतिक औद्योगिक क्षेत्रों में अपने सहयोग को उस स्तर पर ले जाएंगे जहां कोई बाहरी ताकत या भू राजनीतिक तनाव भारत की प्रगति की रफ्तार को रोक ना सके। यह समझौता मुख्य रूप से उन सेक्टर्स पर केंद्रित है जिन्हें भविष्य की अर्थव्यवस्था की रीड माना जाता है।
गौर करने वाली बात यह है कि भारत और जापान अब सिर्फ व्यापारिक साझेदार नहीं रहे बल्कि यह एक ऐसी सुरक्षा दीवार खड़ी करने जा रहे हैं जो सेमीकंडक्टर, क्रिटिकल मिनरल्स, उन्नत मैन्युफैक्चरिंग और उभरती हुई तकनीकों को सुरक्षित करेगी। आज के दौर में जब दुनिया सप्लाई चेन के टूटने और युद्धों के कारण पैदा हुई अनिश्चितता से जूझ रही है तब भारत और जापान ने विश्वसनीय सप्लाई चेन यानी कि ट्रस्टेड सप्लाई चेन का नया नारा बुलंद किया है। इसका मतलब साफ है तकनीक जापान की होगी। जमीन और हुनर भारत का होगा और यह गठबंधन दुनिया को एक सुरक्षित विकल्प देगा। भारत और जापान की यह दोस्ती दशकों पुरानी है। जापान आज भारत में निवेश करने वाले सबसे बड़े देशों में से एक है। लेकिन अब यह साझेदारी बुनियादी ढांचे और ट्रेन प्रोजेक्ट से आगे बढ़कर रक्षा और उच्च तकनीक के मोर्चे पर आ गई है। टोक्यो और नई दिल्ली का यह बढ़ता तालमेल इस बात का सबूत है कि एशिया की यह दो बड़ी ताकतें अब किसी भी तीसरे देश की मनमानी बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।
इन प्रशांत क्षेत्र को खुला, स्वतंत्र और सुरक्षित रखने के लिए भारत का मजबूत होना बहुत जरूरी है और जापान इस हकीकत को बखूबी समझता है। यानी यह डायलॉग सिर्फ कागजी कारवाही नहीं है बल्कि एक स्पष्ट संदेश है कि भारत अब दुनिया की फैक्ट्री बनने के लिए तैयार है और चीन पर निर्भरता कम करने के लिए जापान अपनी फैक्ट्रियों और तकनीक को भारत में शिफ्ट करने के लिए बड़े कदम उठाने जा रहा है। जिससे भारत की औद्योगिक शक्ति में जबरदस्त इजाफा होगा। खैर राजशित में लिए गए इस फैसले ने साफ कर दिया कि कि आने वाला समय भारत का है।
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