New Fuel Rules: भारत सरकार ने ईंधन नीति में बड़ा बदलाव करने की दिशा में कदम बढ़ाते हुए सेंट्रल मोटर व्हीकल रूल्स, 1989 में संशोधन के लिए एक ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया है। इस प्रस्ताव का उद्देश्य नई फ्यूल कैटेगरी को परिभाषित करना और देश में एथेनॉल ब्लेंडिंग को बढ़ावा देना है, ताकि इम्पोर्टेड फ्यूल पर निर्भरता कम की जा सके और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा मिले।
क्या हैं प्रस्तावित बदलाव?
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय द्वारा जारी ड्राफ्ट में कई अहम बदलाव सुझाए गए हैं। हाइड्रोजन ईंधन की कैटेगरी को “Hydrogen + CN” से बदलकर “Hydrogen + CNG” किया गया है। वहीं पेट्रोल के मानकों को E10/E से अपडेट कर E10/E20 किया गया है, जो देश में E20 फ्यूल लागू होने के अनुरूप है।
इसके अलावा, E85 और E100 जैसे हाई एथेनॉल फ्यूल को भी नियमों में शामिल किया गया है। बायोडीजल कैटेगरी को B10 से बढ़ाकर B100 तक कर दिया गया है। साथ ही, उत्सर्जन टेस्टिंग और तकनीकी नियमों को स्टैंडर्ड करने का प्रस्ताव भी रखा गया है। कुछ व्हीकल कैटेगरी में अधिकतम भार सीमा 3000 किलोग्राम से बढ़ाकर 3500 किलोग्राम करने की भी बात कही गई है।
हाई एथेनॉल फ्यूल की तैयारी यह कदम तुरंत E85 या E100 को लागू करने के लिए नहीं है, बल्कि इनके परीक्षण और मूल्यांकन के लिए नियम तय करने की दिशा में है। सरकार ऑटो कंपनियों और ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के साथ मिलकर फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों और जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर की तैयारियों का आकलन कर रही है।
अंतरराष्ट्रीय उदाहरण और आगे की राह ब्राजील जैसे देशों में पहले से E100 का उपयोग हो रहा है, जबकि अमेरिका में E85 सीमित स्तर पर उपलब्ध है। भारत फिलहाल E20 पर फोकस कर रहा है, लेकिन यह ड्राफ्ट भविष्य में उच्च एथेनॉल ईंधन अपनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह ड्राफ्ट 30 दिनों तक सार्वजनिक सुझावों के लिए खुला रहेगा, जिसके बाद अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
आपने यूरोप या फिर यूरोपियन यूनियन सुन तो रखा होगा। लेकिन ये यूरोपियन यूनियन है क्या, समझते हैं की यह यूरोपियन यूनियन के पीछे की हिस्ट्री क्या है और यह क्यों बनाया गया। उसके बारे में बताते हैं। उसे सिंपल टर्म्स में यूरोप एक कॉन्टिनेंट है, जिसमें र्मनी, नीदरलैंड्स, स्वीटजरलैंड, बेल्जियम जैसे 44 कंट्रीज हैं। द्वितीय विश्व युद्ध की तबाही के बाद यूरोप के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि भविष्य में ऐसे विनाशकारी संघर्ष को रोकना। इसी लक्ष्य के साथ 9 मई 1950 को फ्रांस के विदेश मंत्री रॉबर्ट शूमन ने एक अहम प्रस्ताव पेश किया। उन्होंने सुझाव दिया कि फ्रांस और पश्चिम जर्मनी अपने कोयला और इस्पात उद्योग को एक साझा प्राधिकरण के तहत लाएं। चूंकि ये संसाधन युद्ध के लिए बुनियादी थे, इसलिए इस कदम का उद्देश्य दोनों देशों के बीच युद्ध को न सिर्फ अकल्पनीय, बल्कि व्यावहारिक रूप से असंभव बनाना था।
शूमन योजना को 1951 में ट्रीटी ऑफ पेरिस के माध्यम से लागू किया गया, जिससे यूरोपीयन कोल एंड स्टील कम्युनिटी (ईसीएससी) की स्थापना हुई। इस समझौते पर बेल्जियम, फ्रांस, पश्चिम जर्मनी, इटली, लक्ज़मबर्ग और नीदरलैंड जैसे छह देशों ने हस्ताक्षर किए। इन देशों को सामूहिक रूप से “इनर सिक्स” कहा गया। ईसीएससी को यूरोप में आर्थिक सहयोग और शांति स्थापना की दिशा में पहला ठोस कदम माना जाता है।
ट्रीटी ऑफ रोम और ईसीएससी
ईसीएससी की सफलता के बाद सदस्य देशों ने सहयोग को अन्य क्षेत्रों तक विस्तारित करने का निर्णय लिया। 1957 में Treaties of Rome पर हस्ताक्षर किए गए, जिसके तहत दो प्रमुख संस्थाएं स्थापित हुईं। पहली, यूरोपीयन यूनियन कम्युनिटी (ईईसी), जिसका उद्देश्य एक कॉमन मार्केट बनाना था, जहां वस्तुओं, सेवाओं, पूंजी और लोगों की आवाजाही बिना बाधा के हो सके। दूसरी, Euratom, जिसे परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया। आने वाले दशकों में ईईसी ने व्यापार बाधाओं को कम करते हुए अपने दायरे का विस्तार किया और नए सदस्य देशों को शामिल किया। 1973 में डेनमार्क, आयरलैंड और यूनाइटेड किंगडम इसमें शामिल हुए, जबकि 1981 में ग्रीस और 1986 में स्पेन व पुर्तगाल सदस्य बने। इसी वर्ष Single European Act (1986) पर हस्ताक्षर किए गए, जिसका लक्ष्य 1992 तक एक पूर्ण सिंगल मार्केट स्थापित करना और सदस्य देशों के बीच राजनीतिक एकीकरण को और मजबूत करना था।
मास्ट्रिच ट्रीटी और ईयू का जन्म
साल 1992 में साइन हुई मास्ट्रिच ट्रीटी (ट्रीटी ऑन यूरोपीयन यूनियन) ने यूरोप की दिशा ही बदल दी। यह सिर्फ एक आर्थिक समझौता नहीं था, बल्कि इसने यूरोप को एक पॉलिटिकल यूनियन में बदलने की नींव रखी। इस संधि के बाद यूरोपीयन कम्युनिटी का नाम बदलकर आधिकारिक रूप से यूरोपीयन यूनियन (ईयू) कर दिया गया। मास्ट्रिच ट्रीटी के तहत एक सिंगल करेंसी – यूरो की नींव रखी गई। 1999 में इसे इलेक्ट्रॉनिक फर्म में लॉन्च किया गया। 2002 में यह कैश के रूप में लागू हुआ। इससे यूरोप की इकोनॉमी को एक यूनिफाइड डायरेक्शन मिली। इस संधि की एक और बड़ी उपलब्धि ईयू सीटिजनशिप थी।
लिस्बन की संधि
2000 के दशक में यूरोपीय संघ (ईयू) ने तेज़ी से विस्तार किया और 2004 में मुख्यतः सेंट्रल और ईस्टर्न यूरोप के 10 नए देशों को शामिल किया, जो सोवियत यूनियन के पतन के बाद संभव हुआ। इस बड़े विस्तार के साथ EU की संस्थाओं और नीतियों को अधिक प्रभावी बनाने की जरूरत महसूस हुई। इसी दिशा में 2007 में Treaty of Lisbon पर हस्ताक्षर किए गए, जो 2009 में लागू हुआ। इस संधि का उद्देश्य ईयू को अधिक efficient, democratic और वैश्विक स्तर पर एक मजबूत collective voice के रूप में स्थापित करना था। इसके तहत European Council के President का स्थायी पद बनाया गया और European Parliament की शक्तियों को बढ़ाया गया। वर्तमान में, 2020 में United Kingdom के अलग होने के बाद, EU में कुल 27 सदस्य देश हैं और यह एक unique economic और political partnership के रूप में यूरोप के बड़े हिस्से के governance को प्रभावित करता है।
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