इंग्लिश में NATO और हिंदी में नॉटो बोले या फिर नाटो भी कह सकते हैं। लेकिन इसका फुल फॉर्म जरूर याद कर लीजिए शायद किसी परीक्षा में पूछ लिया जाए। नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन हिंदी में कहे तो उत्तरी अटलांटिक सन्धि संगठन। क्या है नाटो जिससे रूस को इतनी नफरत है। कहानी की शुरुआत इतिहास से करते हैं। साल 1945 की बात है दूसरा विश्व युद्ध खत्म हो चुका था। सोवियत संघ और अमेरिकी दुनिया की दो महाशक्तियों के बीच प्रभुत्व की लड़ाई जिसके बारे में आपने पढ़ा भी होगा और हम भी आपको कई दफा बता चुके हैं। फुल्टन भाषण व टू्रमैन सिद्धांत के तहत जब साम्यवादी प्रसार को रोकने की बात कही गई तो प्रत्युत्तर में सोवियत संघ ने अंतर्राष्ट्रीय संधियों का उल्लंघन कर 1948 में बर्लिन की नाकेबंदी करते हुए और स्टालिन की रेड आर्मी ने बर्लिन में झंडा फहरा दिया था। अमेरिका को डर लगा कि स्टालिन के साम्यवाद की ये लहर ऐसी ही चली तो ये पश्चिमी यूरोप में भी पहुंच जाएगी। 1948 में बर्लिन की नाकेबंदी की घटना ने अमेरिका के डर को और भी पुख्ता कर दिया। उसे लगा कि सोवियत संघ से निपटने के लिए एकजुट होने का वक्त आ गया है। इसी क्रम में यह विचार किया जाने लगा कि एक ऐसा संगठन बनाया जाए जिसकी संयुक्त सेनाएं अपने सदस्य देशों की रक्षा कर सके। 4 अप्रैल 1949 को ब्रिटेन, फ्रांस, बेल्जियम, नीदरलैण्ड तथा लक्सेमबर्ग ने बूसेल्स की संधि पर हस्ताक्षर किए। इसका उद्देश्य सामूहिक सैनिक सहायता व सामाजिक-आर्थिक सहयोग था। ये पूंजीवादी देशों की सोवियत विस्तार को चुनौती देने के लिए बना सैन्य संगठन था। इन देशों ने एक दूसरे को एक वादा किया है। कैसा वादा- एक दूसरे को खतरे की स्थिति में सहायता देने का वादा यानी सामूहिक सुरक्षा का वादा। किसी एक देश पर हमला तो माना जाएगा सबके सब देशों पर हमला।
उत्तर अटलांटिक संधि पर 12 देशों ने हस्ताक्षर किए
संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर के अनुच्छेद 15 में क्षेत्रीय संगठनों के प्रावधानों के अधीन उत्तर अटलांटिक संधि पर 12 देशों ने हस्ताक्षर किए थे। ये देश थे- फ्रांस, बेल्जियम, लक्जमर्ग, ब्रिटेन, नीदरलैंड, कनाडा, डेनमार्क, आइसलैण्ड, इटली, नार्वे, पुर्तगाल और संयुक्त राज्य अमेरिका। शीत युद्ध की समाप्ति से पूर्व यूनान, टर्की, पश्चिम जर्मनी, स्पेन भी सदस्य बने और शीत युद्ध के बाद भी नाटों की सदस्य संख्या का विस्तार हो रहा। इस गुट में अमेरिका सबसे ताकतवर था इसलिए उसे इसका मुखिया मान लिया गया। 18 फरवरी 1952 और 6 मई 1955 के बीच तीन और देशों को नाटो में शामिल किया गया। इनमें पश्चिम जर्मनी भी शामिल था। इससे सोवियत यूनियन की चिंता और बढ़ी, क्योंकि पूर्वी जर्मनी सोवियत समर्थक था।
नाटो के 30 सदस्य देशों की सूची:
अलबानिया, बेल्जियम, बुल्गारिया, कनाडा, क्रोएशिया, चेक गणराज्य, डेनमार्क, एस्तोनिया, फ़्रान्स, जर्मनी, यूनान, हंगरी, आइसलैण्ड, इटली, लातविया, लिथुआनिया, लक्ज़मबर्ग, नीदरलैंड, नॉर्वे, पोलैंड, पुर्तगाल, रोमानिया, स्लोवाकिया, स्लोवेनिया, स्पेन, तुर्की, यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त राज्य अमेरिका, मॉन्टिनीग्रो
नाटो और रूस की ताकत
आंकड़ों से पता चलता है कि रूस की सेना अमेरिका के बाद दूसरी बड़ी सेना है। सशस्त्र बलों के आंकड़े बताते हैं कि देश में लगभग 1,154,000 सक्रिय सैनिक हैं। सेना को रिजर्व में रखे गए लगभग 250,000 और सैनिकों का समर्थन प्राप्त है। रूस के पास लगभग 6,400 वॉरहेड की आपूर्ति के साथ, परमाणु हथियारों का दुनिया का सबसे विशाल संग्रह है। नाटो सदस्यों के पास लगभग 1,346,400 कर्मियों की सेना है। उनमें से मोटे तौर पर 165000 सैनिक तैनात हैं, जबकि 799,500 रिजर्व सैनिक हैं। नाटो 30 देशों का एक ग्रुप है। लेकिन जो सैनिक सक्रिय हैं, वही युद्ध की स्थिति में सबसे पहले उतारे जाएंगे।
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दुनिया में कभी आपसी एकता, खुली सीमाओं और मजबूत अर्थव्यवस्था की मिसाल माना जाने वाला यूरोपियन यूनियन (EU) आज एक बड़े संकट के दौर से गुजर रहा है। हालात ऐसे हैं कि अर्थव्यवस्था से लेकर राजनीति तक, ईयू चौतरफा घिर चुका है। अमेरिका और चीन के मुकाबले यूरोप अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) जैसी नई तकनीकों और आर्थिक विकास में काफी पिछड़ रहा है। वहां लगातार बढ़ती महंगाई और सुस्त विकास दर ने आम जनता की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इसके अलावा, पर्यावरण को बचाने के लिए EU ने 'ग्रीन ट्रांजिशन' के नाम पर जो सख्त नियम बनाए हैं, उनसे खेती और जनजीवन इतना महंगा हो गया है कि पूरे यूरोप में किसान सड़कों पर उतर कर विरोध कर रहे हैं। वहीं, रूस-यूक्रेन युद्ध के लंबा खिंचने से यूरोप का खजाना खाली हो रहा है और अब खुद सदस्य देशों के बीच इस बात पर मतभेद गहराने लगे हैं कि यूक्रेन को और कितनी आर्थिक और सैन्य मदद दी जाए।
इन आर्थिक और बाहरी चुनौतियों के बीच, यूरोप की राजनीति में भी एक बड़ा भूचाल आ गया है। फ्रांस, जर्मनी, इटली और नीदरलैंड्स जैसे देशों में दक्षिणपंथी यानी राष्ट्रवादी और प्रवासी विरोधी पार्टियां तेजी से हावी हो रही हैं, जो सीधे तौर पर ईयू के सिस्टम और उसकी एकता को चुनौती दे रही हैं।
लेकिन, यूरोप की इस राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल की शुरुआत अचानक नहीं हुई है। विशेषज्ञों की मानें तो इसकी सबसे गहरी जड़ें 2015 के 'सीरियाई शरणार्थी संकट' में छिपी हैं। आइए समझते हैं कि सीरिया ने यूरोप को हमेशा के लिए कैसे बदल दिया। 2015-16 के दौरान सीरियाई गृहयुद्ध के कारण करीब 10 लाख से ज्यादा लोग जान बचाकर अचानक यूरोप की सीमाओं पर पहुंच गए। यूरोप का पूरा सिस्टम इतने बड़े शरणार्थी संकट को एक साथ संभालने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था। जब इन शरणार्थियों को 27 देशों के बीच 'कोटा सिस्टम' से बांटने की बात आई, तो देशों के बीच भारी विवाद शुरू हो गया। कई देशों ने अपनी सीमाएं सील कर दीं। इससे बिना पासपोर्ट पूरे यूरोप में घूमने की आज़ादी देने वाला मशहूर 'शेंगेन एग्रीमेंट' ही खटाई में पड़ गया। प्रवासियों के अचानक आने से जो डर का माहौल बना, उसका सीधा फायदा दक्षिणपंथी (Right-Wing) नेताओं को मिला। उन्होंने इसे 'राष्ट्रीय सुरक्षा', 'संस्कृति' और 'नौकरियों' पर खतरा बताकर वोट बटोरे। आज यही पार्टियां सत्ता की चाबी बन गई हैं और इन्होंने यूरोप की मुख्यधारा की राजनीति को पूरी तरह पलट दिया है। आपको याद होगा कि ब्रिटेन ने ईयू छोड़ दिया था। इस 'ब्रेग्जिट' के पीछे भी सबसे बड़ा कार्ड प्रवासियों का डर ही था। वहां के नेताओं ने सीरियाई संकट का हवाला देकर ही जनता से EU छोड़ने के पक्ष में वोट करवाया था। जो लिबरल (उदारवादी) पार्टियां पहले मानवाधिकारों की बात करते हुए शरणार्थियों का स्वागत कर रही थीं, उन्हें भी चुनाव जीतने और जनता का गुस्सा शांत करने के लिए अपने नियम कड़े करने पड़े। आज यूरोप की सीमाएं पहले से कहीं ज्यादा सख्त हैं।
कुल मिलाकर कहें तो, 2015 के सीरिया संकट ने यूरोपियन यूनियन की उस 'एकता' और 'उदारवाद' वाली छवि को तोड़ दिया, जिस पर वह खड़ा था। उसी दरार से आज की राजनीतिक अस्थिरता पैदा हुई है। अब देखना यह होगा कि क्या EU इस चक्रव्यूह से बाहर निकल पाता है, या फिर आपसी मतभेदों में और उलझता चला जाएगा। संक्षेप में कहें तो, 2015 के सीरियन संकट ने यूरोपियन यूनियन की उस 'एकता' और 'उदारवाद' की नींव हिला दी, जिस पर वह खड़ा था। उसी दरार से जो राजनीतिक अस्थिरता पैदा हुई, वह आज यूरोप की सबसे बड़ी कमजोरी बन गई है।
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