Saint Surdas Jayanti: आज सूरदास जयंती पर्व, जानें इनके जीवन से जुड़ी खास बातें
Saint Surdas Jayanti: आज भगवान कृष्ण के अनन्य भक्त श्रीसूरदास जी का जयंती पर्व है. हर साल वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को सूरदास जी का जयंती पर्व मनाया जाता है. संत सूरदास हिन्दी साहित्यके सूर्य माने जाते हैं. सूरदास जी अपने समय के परम भक्त कहे जाते हैं. वे जन्म से ही अंधे थे, लेकिन अपनी बंद आंखों से ही भगवान श्रीकृष्ण के उस दिव्य रुप का वर्णन किया, जिसे खुली आंखों से देख पाना मुश्किल था. सूरदास जी भारतीय भक्ति साहित्य के महान कवि माने जाते हैं. भगवान कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम ने उन्हें अमर बना दिया. इनकी रचनाएं प्रमुख रुप से ब्रज भाषा में हैं. इनमें भगवान कृष्ण की लीलाओं का वर्णन मिलता है. इनकी भक्ति के आगे अकबर बादशाह भी नतमस्तक हो गया था. शास्त्रों के अनुसार, वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को भगवान कृष्ण और सूरदास जी का पूजन करने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. इसके साथ ही भगवान कृष्ण के चरणों में भक्ति प्राप्त होती है. घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है. आइए जानते हैं सूरदास जी के जीवन से जुड़ी खास बातें.
सूरदास जी का जन्म
सूरदास जी के जन्म को लेकर विद्वानों में मतभेद है. इनके जन्म की प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती है. कुछ लोगों का मानना है कि इनका जन्म 1478 ई. के आस-पास मथुरा-आगरा मार्ग पर स्थित रुनकता गांव में हुआ था. वहीं कुछ लोग मानते हैं कि सूरदास जी का जन्म सीही नामक गांव में एक सारस्वत परिवार में हुआ था. साहित्य लहरी सूरदास जी की रचना है. इसके अनुसार, इनका जन्म संवत 1607 में बताया गया है. बल्लभ संप्रदाय में मान्यता है कि सूरदास जी का जन्म संवत 1540 ई. में हुआ था. बल्लभाचार्य जी सूरदास जी से दस दिन बड़े थे. बल्लभाचार्य जी का जन्म संवत 1540 ई. की वैशाख कृष्ण एकादशी को हुआ था. इसलिए सूरदास जी की जन्म तिथि वैशाख शुक्ल पंचमी मानी जाती है.
दिव्य दृष्टि का प्रभाव
सूरदास जी जन्म से ही अंधे थे. लेकिन उनकी रचनाओं में भगवान श्रीराधाकृष्ण की बाल-लीलाओं के वर्णन से ऐसा लगता है जैसे उन्हें सबकुछ दिख रहा हो. उनकी रचनाओं में भगवान के स्वरुप का वर्णन और प्रकृति सौंदर्य के वर्णन को देखकर विद्वान भी चकित रह जाते थे. सभी यही सोचते थे कि जन्म से अंधा व्यक्ति ऐसे कैसे लिख सकता है. ऐसा लगता था मानों उनके पास दिव्य दृष्टि थी. जिससे भगवान के रुप, रंग श्रंगार का हूबहू वर्णन अपनी रचनाओं पर कर दिया करते थे.
गुरु बल्लभाचार्य से मुलाकात
सूरदास जी मथुरा और आगरा के बीच गऊघाट पर निवास करते थे. वहीं उनकी मुलाकात पुष्टिमार्ग के प्रथम आचार्य श्रीबल्लभाचार्य जी से हुई. सूरदास जी ने प्रभु बल्लभाचार्य जी से मिलने के बाद उन्हें अपना गुरु मान लिया था. अपने गुरु के सानिध्य में उन्होंने ने अनेक काव्य ग्रंथों की रचना की. सूरदास जी बल्लभाचार्य जी से मिलने से पहले बहुत दीनता के पद गाया करते थे. बल्लभाचार्य जी ने उनसे कहा कि आप भगवान कृष्ण की लीलाओं का गान शुरु करो तब से सूरदास जी भगवान की लीलाओं का गुणगान करने लगे. उन्होंने सूरसागर की रचना की.
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अष्टछाप के प्रमुख कवि
सूरदास जी को पुष्टि मार्ग का जहाज कहा जाता है. बल्लभाचार्य जी के पुत्र बिट्ठलनाथ जी ने कृष्ण भक्ति कवियों का एक समूह बनाया था. जिसे अष्टछाप कहा जाता है. सूरदास जी इस समूह के सबसे प्रभावशाली और प्रथम कवि थे.
अकबर से भेंट
सूरदास जी की प्रसिद्धि इतनी फैल गई कि मुगल सम्राट अकबर भी उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके. अकबर के राजकवि तानसेन थे. तानसेन सूरदास जी को अपना गुरु मानते थे. एकबार राजा अकबर ने तानसेन से कहा कि सूरदास जी से मुलाकात कराएं. तानसेन के माध्यम से जब अकबर की मुलाकात सूरदास जी से हुई तो अकबर ने अपनी प्रशंसा में कुछ गाने को कहा तो सूरदास जी ने साफ मना कर दिया.
सूरदास जी की रचनाएं
सूरदास जी के प्रमुख पांच ग्रंथ माने जाते हैं. उन्होंने सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य लहरी, नल दमयंती और ब्याहलो पांच प्रमुख ग्रंथ लिखे. लेकिन नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित हस्तलिखित पुस्तकों की तालिका में सूरदास जी के 16 ग्रंथों का विवरण मिलता है. इनमें उनके प्रमुख पांच ग्रंथों के अलावा दशमस्कंद टीका, नागलीला, भागवत, गोवर्धन लीला, सूरपचीसी, सूरसागर सार, प्राणप्यारी आदि ग्रंथ सामिल हैं.
मृत्यु का समय और अंतिम पद
सूरदास जी की मृत्यु संवत 1620 से 1648 ई. के बीच माना जाता है. इनका निधन मथुरा के पास पारसौली गांव में हुआ था. अपनी मृत्यु के समय उन्होंने ने अपनी भक्ति को सिद्ध करते हुए एक प्रसिद्ध पद गाया- खंजन नैन रुप रस माते....इसमें भगवान कृष्ण सुंदर और चंचल नेत्रों का वर्णन है. उन्होंने अपना पूरा जीवन श्रीराधाकृष्ण की भक्ति को समर्पित किया और अंत समय पर वे पूर्णतः कृष्णमय थे.
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