हाईकोर्ट ने केजरीवाल के किराए के वादे पर आदेश पलटा:कहा- मीडिया में दिया बयान लागू करवाने लायक नहीं, रिट ऑफ मैंडमस भी मजबूर नहीं कर सकता
दिल्ली हाईकोर्ट ने 2021 के एक सिंगल जज के आदेश को पलट दिया है। उस आदेश में कहा गया था कि COVID-19 लॉकडाउन के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गरीबों के किराए का भुगतान करने की घोषणा कानूनी तौर पर लागू करने लायक थी। जस्टिस सी हरि शंकर और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला की डिवीजन बेंच ने कहा कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए गए बयान को कानूनी वादा नहीं माना जा सकता, जिसे अदालतें लागू करवा सकें। बेंच ने जोर देकर कहा कि कोई भी 'रिट ऑफ मैंडमस' (आदेश जारी करने का अधिकार) सरकार को ऐसे वादे को लागू करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। कोर्ट का आदेश 3 पॉइंट्स में… हाईकोर्ट बोला- दिल्ली सरकार फैसला लेने के लिए स्वतंत्र है हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि दिल्ली सरकार इस बारे में कोई भी नीतिगत फैसला लेने के लिए स्वतंत्र है कि वह किराए का भुगतान करके किराएदारों की मदद करना चाहती है या नहीं, लेकिन अदालत सरकार को ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं कर सकती। अदालत ने आगे कहा कि ऐसे वादे के वित्तीय और व्यावहारिक असर के बारे में कुछ भी साफ नहीं है, और ऐसा लगता है कि यह बयान किसी आपातकालीन स्थिति में दिया गया था। सिंगल जज बेंच ने क्या आदेश दिया था मामला 22 जुलाई 2021 को एक सिंगल जज के आदेश से जुड़ा है। उस आदेश में कहा गया था कि मुख्यमंत्री के वादे को लागू करवाया जा सकता है। साथ ही बेंच ने सरकार एक तय समय-सीमा के भीतर इस पर कोई नीति बनाने का निर्देश दिया गया था। यह आदेश 5 दिहाड़ी मजदूरों की तरफ से दायर एक याचिका पर दिया गया था। ये मजदूर लॉकडाउन के दौरान अपने किराए का भुगतान करने में असमर्थ थे और चाहते थे कि सरकार मुख्यमंत्री की ओर से की गई घोषणा को पूरा करे। दिल्ली सरकार ने कोर्ट में कहा था- हमने अपील की थी, वादा नहीं दिल्ली सरकार ने सिंगल जज बेंच के आदेश को चुनौती देते हुए कहा था कि यह बयान मकान मालिकों से सिर्फ एक अपील थी कि वे किराएदारों पर किराया देने का दबाव न डालें, न कि कोई पक्का वादा। सरकार ने दलील दी कि उसने तो सिर्फ इतना कहा था कि अगर जरूरत पड़ी, तो वह इस मामले पर विचार करेगी। इससे पहले, 27 सितंबर 2021 को डिवीजन बेंच ने सिंगल-जज के आदेश पर रोक लगा दी थी, यह कहते हुए कि इसे लागू करने से सरकार के लिए गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इस अंतिम फैसले के साथ हाईकोर्ट ने अब पिछले आदेश को रद्द कर दिया है और अपील का निपटारा कर दिया है, जिसमें खर्चों के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया गया है।
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