इजराइल और लेबनान बॉर्डर पर मौजूद इजराइल का आखिरी कस्बा, ग्राउंड जीरो से सामने आई रिपोर्ट
इजराइल और लेबनान बॉर्डर पर स्थित ये इजराइल का आखिरी कस्बा रोश हानिक्रा है, जो अब इजराइल डिफेंस फोर्स की तरफ से लगभग खाली करा लिया गया है. यहां केवल मिलिट्री के वाहन और जवान ही नजर आते हैं. यहां से हमारे वरिष्ठ संवाददाता राहुल डबास ग्राउंड जीरो से हालात जायजा ले रहे हैं.
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रॉकेट हमलों की त्वरित सूचना दी जाती है
बॉर्डर से लगभग सौ मीटर की दूरी पर न्यूज नेशन के कैमरे पर यह इजरायल डिफेंस फोर्स की आखिरी पोस्ट है, जहां रडार और लिसनिंग डिवाइस भी है. इसके जरिए हिजबुल्ला की हर कार्यवाही पर नजर रखी जाती है और आयरन डोम ए डिफेंस सिस्टम तक हिज्जबुल्ला के रॉकेट हमलों की त्वरित सूचना भी दी जाती है.
हिजबुल्ला पर लगातार कार्रवाई जारी है
यहां से हमें इजराइल लेबनान बॉर्डर के फेंसिंग नजर आती है, जहां इस समय भी यूनाइटेड नेशन पीसकीपिंग फोर्स मौजूद हैं. यहीं से ही इजरायल डिफेंस फोर्स के हेलीकॉप्टर और हवाई जहाज लेबनान बॉर्डर से लेकर के बेरूद तक लगातार हिजबुल्ला पर कार्रवाई कर रहे हैं.
सैन्य संस्थानों से दूर रखा जा रहा है
आपको बता दें कि इजरायल पर ईरान लगातार बैलिस्टिक मिसाइल से हमले कर रहा है. उसने इन्हें रोकने के लिए मिसाइल डिफेंस सिस्टम का उपयोग किया है. मगर इसके बाद भी हमले तेजी से बढ़ते जा रहे हैं. ऐसे में इजरायल अपने नागरिकों को सुरक्षित बचाने के प्रयास में जुटा है. इस दौरान लोगों को सैन्य संस्थानों से दूर रखा जा रहा है.
सस्ती चीनी ड्रोन पर पाकिस्तान की निर्भरता से सैन्य क्षमता सीमित: रिपोर्ट
कोलंबो, 21 मार्च (आईएएनएस)। पाकिस्तान की सैन्य क्षमताओं पर सस्ती चीनी ड्रोन तकनीक पर बढ़ती निर्भरता का असर पड़ रहा है। श्रीलंका के अखबार डेली मिरर की एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि पश्चिमी देशों के उन्नत रक्षा बाजार से बाहर होने के कारण पाकिस्तान को मजबूरी में चीन का रुख करना पड़ा, न कि केवल रणनीतिक साझेदारी के कारण।
रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के अत्याधुनिक ड्रोन जैसे एमक्यू-1 प्रीडेटर और एमक्यू-9 रीपर तकनीकी रूप से काफी उन्नत हैं, लेकिन वॉशिंगटन इनकी बिक्री पर कड़े प्रतिबंध लगाता है, खासकर चीन के करीबी देशों को। इसी वजह से पाकिस्तान को सीमित विकल्पों के चलते चीन पर निर्भर होना पड़ा।
रिपोर्ट में बताया गया कि चीन ने भी इस स्थिति का फायदा उठाते हुए अपने ड्रोन जैसे विंग लूंग II को सस्ते विकल्प के रूप में पेश किया। इसकी कीमत करीब 1-2 मिलियन डॉलर बताई जाती है, जबकि एमक्यू-9 रीपर की कीमत लगभग 30 मिलियन डॉलर तक होती है। हालांकि, यह कीमत अंतर प्रदर्शन में भी बड़ा अंतर दर्शाता है, जिसे अक्सर प्रचार में स्पष्ट नहीं किया जाता।
रिपोर्ट में आगे कहा गया कि पाकिस्तान द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा सीएच-4बी दिखने में एमक्यू-9 रीपर जैसा जरूर लगता है, लेकिन इसकी क्षमताएं सीमित हैं। वहीं, चीन का उन्नत मॉडल सीएच-5 भी इंजन क्षमता के मामले में पीछे है, जिससे इसकी अधिकतम उड़ान ऊंचाई लगभग 9 किमी तक ही सीमित रहती है, जबकि रीपर 12-15 किमी तक उड़ सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान का ड्रोन कार्यक्रम अब संस्थागत रूप से इतना गहराई से जुड़ चुका है कि इसे बदलना आसान नहीं होगा, चाहे भविष्य में चीन-पाकिस्तान संबंधों में बदलाव ही क्यों न हो। हालांकि, वास्तविक क्षमता उतनी प्रभावशाली नहीं है, जितनी इसके बारे में प्रचार किया जाता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कम कीमत के पीछे कारण स्पष्ट हैं; रखरखाव की समस्याएं और युद्ध में हुए नुकसान पहले से दर्ज हैं, जो इसकी सीमाओं को उजागर करते हैं।
--आईएएनएस
डीएससी
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