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86 साल के लकवाग्रस्त अयातुल्ला खामेनेई की कहानी: एक मौलवी कैसे बना ईरान का सुप्रीम लीडर?

नई दिल्ली : ईरान और इजराइल के बीच जारी भीषण युद्ध के बीच ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत को लेकर दुनिया भर में सस्पेंस बना हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजराइल ने हवाई हमले के बाद मलबे से उनका शव मिलने का दावा किया है, जबकि ईरान ने इन खबरों को सिरे से खारिज किया है।

86 वर्षीय खामेनेई, जो पिछले 35 वर्षों से ईरान की सत्ता के केंद्र में हैं, उनके जीवन की कहानी एक साधारण मौलवी से लेकर दुनिया के सबसे शक्तिशाली धार्मिक नेता बनने तक की है।

​मशहद के धार्मिक परिवार में जन्म

​अयातुल्ला अली खामेनेई का जन्म 19 अप्रैल 1939 को ईरान के धार्मिक शहर मशहद में एक मौलवी सैयद जावेद खामेनेई के घर हुआ था। वे 8 भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर थे। महज 4 साल की उम्र में उन्हें मकतब भेजा गया, जहाँ उन्होंने कुरान और इस्लामी तालीम हासिल की। बचपन में मौलवियों की पोशाक पहनने के कारण लोग उनका मजाक उड़ाते थे, लेकिन उन्होंने अपने पिता की राह पर चलते हुए मौलवी बनने का फैसला किया।

​राजनीति में पहला कदम: सिनेमाघरों का विरोध

​खामेनेई की राजनीति की शुरुआत 1950 के दशक में हुई, जब ईरान में पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव बढ़ रहा था। उन्होंने मुहर्रम के दौरान सिनेमाघरों पर लगी पाबंदी हटाने के सरकारी आदेश का कड़ा विरोध किया। हाथ से लिखकर सैकड़ों पत्र तैयार करना और उन्हें लोगों तक पहुँचाना उनके राजनीतिक जीवन का पहला बड़ा कदम था।

​अयातुल्ला खुमैनी का साथ और 1979 की इस्लामी क्रांति

​1960 के दशक में खामेनेई ईरान के धर्मगुरु रूहोल्ला खुमैनी के विचारों से प्रभावित हुए, जो शाह के शासन को 'गैर-इस्लामी तानाशाही' मानते थे। खामेनेई ने शाह के खिलाफ आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई और खुमैनी के संदेशों को फैलाया, जिसके कारण उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। अंततः 1979 में क्रांति सफल हुई और शाह की सरकार गिर गई।

​टेप रिकॉर्डर से हत्या की कोशिश और लकवाग्रस्त हाथ

​27 जून 1981 को तेहरान की अबुजार मस्जिद में एक भाषण के दौरान खामेनेई के सामने रखे टेप रिकॉर्डर में बम धमाका हुआ। इस हमले में उनके गले, फेफड़े और दाईं बांह को गंभीर क्षति पहुँची। उपचार के बाद वे ठीक तो हुए, लेकिन उनका दाहिना हाथ हमेशा के लिए लकवाग्रस्त हो गया और उन्हें एक कान से सुनाई देना भी बंद हो गया।

​ईरान के तीसरे राष्ट्रपति के रूप में कार्यकाल

​30 अगस्त 1981 को एक बम धमाके में राष्ट्रपति राजाई की मौत के बाद, खुमैनी ने खामेनेई को राष्ट्रपति पद के लिए नामांकित किया। खामेनेई ईरान के तीसरे राष्ट्रपति बने और 1981 से 1989 तक इस पद पर रहे। इस दौरान उन्होंने सैन्य मामलों में खुमैनी के दृष्टिकोण को मजबूती से आगे बढ़ाया।

​ताकतवर IRGC का गठन और सैन्य कमान

​खामेनेई ने ईरान की सबसे शक्तिशाली सैन्य इकाई 'इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर' (IRGC) के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उप रक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने इस सेना को एक ऐसे संगठन में तब्दील किया जो सीधे सुप्रीम लीडर के प्रति जवाबदेह है। आज IRGC ईरान की रक्षा और सुरक्षा का मुख्य आधार है।

​सुप्रीम लीडर के पद पर 35 वर्षों का एकछत्र राज

​1989 में खुमैनी की मृत्यु के बाद खामेनेई को ईरान का 'सुप्रीम लीडर' चुना गया। इसके लिए ईरानी संविधान में संशोधन भी किया गया ताकि वे इस पद की योग्यता पूरी कर सकें। पिछले 35 वर्षों से वे ईरान के कमांडर-इन-चीफ हैं और सभी प्रमुख विदेश नीति और रणनीतिक मुद्दों पर उनका फैसला ही अंतिम होता है।

​अमेरिका और इजराइल क्यों पड़े हैं जान के पीछे?

​खामेनेई की जान के पीछे अमेरिका और इजराइल के पड़ने के तीन प्रमुख कारण हैं:-

  • परमाणु कार्यक्रम: इजराइल का मानना है कि खामेनेई के नेतृत्व में ईरान परमाणु हथियार बनाने के बहुत करीब पहुँच गया है।
  • सैन्य प्रभाव: खामेनेई द्वारा IRGC और हिजबुल्लाह जैसे समूहों को दिया जाने वाला समर्थन इजराइली हितों को निशाना बनाता है।
  • सत्ता परिवर्तन: ट्रंप और नेतन्याहू ईरान में 'रिजीम चेंज' चाहते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि खामेनेई की हत्या के बाद ही क्षेत्र में स्थिरता आएगी।

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