वाशिंगटन राज्य के सिएटल शहर ने भारत की 23 वर्षीय छात्रा जाह्नवी कंदुला के परिवार के साथ 29 मिलियन डॉलर (लगभग 262 करोड़ रुपये) का समझौता किया है, जिसकी 2023 में संयुक्त राज्य अमेरिका में सड़क पार करते समय एक तेज रफ्तार पुलिस अधिकारी द्वारा कुचलकर हत्या कर दी गई थी। शहर की अटॉर्नी एरिका इवांस ने कहा जाह्नवी कंदुला की मौत दिल दहला देने वाली थी, और शहर को उम्मीद है कि यह वित्तीय समझौता कंदुला परिवार को कुछ हद तक राहत देगा।जाह्नवी कंदुला का जीवन मायने रखता था। यह उनके परिवार, उनके दोस्तों और हमारे समुदाय के लिए मायने रखता था।
जाह्नवी कंदुला के साथ क्या हुआ?
कंदुला आंध्र प्रदेश की रहने वाली थीं और साउथ लेक यूनियन स्थित नॉर्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी परिसर में स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रही थीं। वह 2021 में छात्र विनिमय कार्यक्रम के तहत बेंगलुरु से अमेरिका आई थीं और दिसंबर में स्नातक होने वाली थीं। उनकी टक्कर पुलिस अधिकारी केविन डेव की गाड़ी से हुई, जो कथित तौर पर 40 किमी प्रति घंटे (25 मील प्रति घंटे) की सीमा वाले क्षेत्र में 119 किमी प्रति घंटे (74 मील प्रति घंटे) की रफ्तार से गाड़ी चला रहे थे। उस समय वह ड्रग ओवरडोज की शिकायत पर कार्रवाई कर रहे थे। उनकी मृत्यु के कारण 2023 में व्यापक आक्रोश और विरोध प्रदर्शन हुए। एक अन्य अधिकारी के बॉडी कैमरा फुटेज के सामने आने के बाद आक्रोश और बढ़ गया, जिसमें अधिकारी हंसते हुए कह रहा था कि कंदुला के जीवन का सीमित मूल्य था और शहर को बस एक चेक लिख देना चाहिए।
जाह्नवी कंदुला की मौत पर आक्रोश
भारतीय राजनयिकों ने घटना की जांच की मांग की। शहर के नागरिक निगरानी निकाय ने बाद में कहा कि अधिकारी डैनियल ऑडरर, जो एक यूनियन नेता भी थे, की टिप्पणियों से विभाग की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा और जनता का विश्वास कमजोर हुआ। ऑडरर को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया और बाद में उन्होंने शहर के खिलाफ गलत तरीके से बर्खास्तगी का आरोप लगाते हुए मुकदमा दायर किया। उन्होंने कहा कि उनकी टिप्पणियां इस बात की आलोचना करने के लिए थीं कि वकील इस मामले पर कैसे प्रतिक्रिया दे सकते हैं।
Continue reading on the app
बांग्लादेश में इन दिनों हवाओं का रुख बदला हुआ है। सड़कों पर 'Gen Z' का शोर है, तो सत्ता के गलियारों में पुराने चेहरों की वापसी की जद्दोजहद। भारत के लिए यह सिर्फ एक पड़ोसी देश का चुनाव नहीं है, बल्कि हमारी सुरक्षा और कूटनीति से जुड़ा एक बड़ा इम्तिहान है। ज्यादातार लोग पूछ रहे हैं कि क्या शेख हसीना के बिना बांग्लादेश पहले जैसा रहेगा? क्या बॉर्डर पर हालात बिगड़ेंगे?तो आपके लिए हमने इन सभी सवालों के जवाब इस आर्टिकल में दिए हैं, आइए इन सभी सवालों के जवाब आसान भाषा में समझते हैं।
प्रश्न: क्या इस चुनाव के बाद भारत में घुसपैठ (Infiltration) का खतरा बढ़ जाएगा?
देखिए, जब भी किसी पड़ोसी देश में राजनीतिक अस्थिरता (instability) आती है, तो उसका सीधा असर सरहद पर दिखता है। अगर बांग्लादेश में चुनावों के दौरान या बाद में हिंसा बढ़ती है, तो सीमा पर दबाव बढ़ना लाजिमी है। भारत इस मामले में बेहद सतर्क है; न केवल बॉर्डर पर चौकसी बढ़ाई गई है, बल्कि अपनी डिप्लोमैटिक फैमिलीज़ को भी एहतियातन वापस बुला लिया गया है। फिलहाल, हमारी सुरक्षा एजेंसियां हर मूवमेंट पर पैनी नज़र रखे हुए हैं ताकि घुसपैठ की किसी भी कोशिश को नाकाम किया जा सके।
प्रश्न: इस बार के चुनाव में शेख हसीना और उनकी पार्टी 'अवामी लीग' गायब क्यों हैं?
यह इस चुनाव का सबसे बड़ा 'ट्विस्ट' है। 2024 के भारी विद्रोह और तख्तापलट के बाद शेख हसीना फिलहाल भारत में शरण लिए हुए हैं। बांग्लादेश की नई कानूनी व्यवस्था ने उन पर 'मानवता के खिलाफ अपराध' (crimes against humanity) के गंभीर आरोप लगाए हैं और उनकी पार्टी 'अवामी लीग' को फिलहाल बैन कर दिया गया है। ऐसे में मैदान अब BNP (बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी) और जमात-ए-इस्लामी के लिए खुला है। यानी इस बार मुकाबला पूरी तरह बदल चुका है।
प्रश्न: भारत के 'चिकन नेक' (Siliguri Corridor) को लेकर एक्सपर्ट्स इतने परेशान क्यों हैं?
भारत का नक्शा देखें तो सिलीगुड़ी कॉरिडोर (जिसे चिकन नेक कहते हैं) वह पतला सा रास्ता है जो पूरे नॉर्थ-ईस्ट को बाकी भारत से जोड़ता है। अगर बांग्लादेश में कोई ऐसी सरकार आती है जो भारत-विरोधी हो, तो वहां चीन और पाकिस्तान का दखल बढ़ सकता है। यह स्थिति भारत की संप्रभुता के लिए एक बड़ा 'रेड फ्लैग' है। अगर पड़ोस में हमारे दुश्मनों को पनाह मिली, तो इस पतले गलियारे की सुरक्षा संभालना एक बड़ी चुनौती बन जाएगा।
प्रश्न: क्या कट्टरपंथी झुकाव वाली 'जमात-ए-इस्लामी' भारत से दोस्ती का हाथ बढ़ा रही है?
यह काफी दिलचस्प मोड़ है। जमात-ए-इस्लामी के चीफ शफीकुर रहमान आजकल बराबरी और सम्मान वाले रिश्तों की बात कर रहे हैं। सुनने में तो यह अच्छा लगता है, लेकिन भारत के लिए भरोसा करना इतना आसान नहीं है। जमात का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI से उनकी नज़दीकियां जगजाहिर हैं। कूटनीति में शब्दों से ज़्यादा इरादे मायने रखते हैं, और भारत फिलहाल 'वेट एंड वॉच' (इंतज़ार करो और देखो) की स्थिति में है।
प्रश्न: यह 'July Charter' क्या बला है और इसमें युवाओं (Gen Z) का क्या रोल है?
इस बार के चुनावों को 'Gen Z-inspired' रिवोल्यूशन कहा जा रहा है। देश के लगभग 44% वोटर्स 18 से 37 साल के बीच हैं, और यही युवा तय करेंगे कि नया बांग्लादेश कैसा होगा। रही बात 'July Charter' की, तो यह एक तरह का जनमत संग्रह (Referendum) है। इसके ज़रिए देश के संविधान में बड़े बदलावों की तैयारी है, ताकि भविष्य में फिर कभी वैसी तानाशाही न लौटे जैसी पिछली सरकार पर आरोप लगे थे।
कुल मिलाकर, बांग्लादेश इस समय एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है। यह चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन का जरिया नहीं है, बल्कि इस बात का फैसला है कि आने वाले दशकों में दक्षिण एशिया की राजनीति किस दिशा में मुड़ेगी। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह अपनी सुरक्षा और 'चिकन नेक' की संप्रभुता से समझौता किए बिना बांग्लादेश की नई लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ तालमेल बिठाए। चाहे 'Gen Z' का जोश हो या जमात-ए-इस्लामी के बदलते सुर, दिल्ली की नजरें ढाका के हर छोटे-बड़े घटनाक्रम पर टिकी हैं। अब देखना यह है कि क्या यह नया बदलाव दोनों देशों के रिश्तों में स्थिरता लाएगा या कूटनीति की एक नई बिसात बिछाएगा।
Continue reading on the app