शेयर बाजार में शुक्रवार का कारोबारी सत्र बजाज फाइनेंस के निवेशकों के लिए काफी उत्साहजनक रहा। कंपनी के जून 2026 तिमाही के वित्तीय नतीजे उम्मीद से बेहतर आने के बाद इसके शेयरों में जोरदार खरीदारी देखने को मिली। मजबूत मुनाफा, बेहतर लोन क्वालिटी और लगातार बढ़ते कारोबार ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया, जिसके चलते कंपनी का शेयर नया 52 सप्ताह का उच्च स्तर छूने में सफल रहा है।
मौजूद जानकारी के अनुसार, गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी बजाज फाइनेंस का समेकित नेट लाभ वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में 28 प्रतिशत बढ़कर 6,081 करोड़ रुपये हो गया है। पिछले वर्ष की समान अवधि में यह 4,762 करोड़ रुपये के आसपास था। कंपनी की कुल शुद्ध आय भी 22 प्रतिशत बढ़कर 15,224 करोड़ रुपये रही, जबकि एक वर्ष पहले यह 12,460 करोड़ रुपये थी। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनी ने प्रमुख वित्तीय मानकों पर अनुमान से बेहतर प्रदर्शन किया है।
नतीजों के बाद राष्ट्रीय शेयर बाजार में कंपनी का शेयर करीब 8.68 प्रतिशत की तेजी के साथ 1,145 रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले 52 सप्ताह का सबसे ऊंचा स्तर है। गौरतलब है कि हाल के महीनों में बढ़ती ब्याज लागत के बावजूद कंपनी अपने लाभ मार्जिन को स्थिर बनाए रखने में सफल रही है।
कंपनी की कुल प्रबंधनाधीन परिसंपत्तियां 24 प्रतिशत बढ़कर 5 लाख 46 हजार 944 करोड़ रुपये हो गई हैं। पहली तिमाही के दौरान लगभग 36 हजार 969 करोड़ रुपये के नए ऋण वितरित किए गए। वहीं कंपनी ने 51 लाख नए ग्राहक भी जोड़े हैं, जिसके बाद कुल ग्राहक संख्या बढ़कर 12 करोड़ 44 लाख 30 हजार से अधिक हो गई है।
बता दें कि अतिरिक्त प्रावधान को अलग रखने पर वास्तविक लोन हानि में पिछले वर्ष की तुलना में 14 प्रतिशत की कमी आई है। इससे यह संकेत मिलता है कि ग्राहकों की ऋण चुकाने की क्षमता में सुधार हुआ है। इसी अवधि में कंपनी का इक्विटी पर प्रतिफल बढ़कर 20.4 प्रतिशत हो गया है।
हालांकि सभी कारोबारी क्षेत्रों में समान वृद्धि देखने को नहीं मिली है। कंपनी का स्वर्ण ऋण पोर्टफोलियो दोगुने से अधिक बढ़कर 21 हजार 152 करोड़ रुपये पहुंच गया है। कंपनी ने इसका श्रेय देशभर में शाखाओं के विस्तार और बढ़ती मांग को दिया है। दूसरी ओर दोपहिया और तिपहिया वाहन लोन कारोबार में 64 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। वहीं सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र को दिए जाने वाले ऋण में केवल 2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, जहां भुगतान चूक के मामले अपेक्षाकृत अधिक रहे हैं।
इस तिमाही के दौरान एआई आधारित तकनीक और नई शाखाएं खोलने पर निवेश बढ़ने से ऑपरेटिंग खर्च में भी वृद्धि दर्ज की गई है। हालांकि कंपनी प्रबंधन का कहना है कि आने वाली तिमाहियों में परिचालन दक्षता बेहतर होने की उम्मीद है।
गौरतलब है कि वैश्विक ब्रोकरेज संस्थाओं ने भी कंपनी के प्रदर्शन को सकारात्मक बताया है। सीएलएसए के अनुसार, नए फिसलन अनुपात में पिछले वर्ष की तुलना में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। वहीं यूबीएस का कहना है कि पिछले तीन तिमाहियों में पहली बार कंपनी की प्रबंधनाधीन परिसंपत्तियों में सबसे तेज वृद्धि दर्ज की गई है, जिसमें उपभोक्ता वित्त और गोल्ड लोन कारोबार की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय के निवेशकों के लिए कंपनी की विकास संभावनाएं मजबूत बनी हुई हैं। हालांकि हालिया तेज उछाल के बाद नए निवेशकों को किसी संभावित मूल्य सुधार का इंतजार करने की सलाह दी जा रही है।
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आयात समता मूल्य निर्धारण से प्राथमिक एल्युमीनियम की कीमतों में बढ़ोतरी होने से इस धातु पर निर्भर घरेलू ‘डाउनस्ट्रीम’ उद्योगों की लागत बढ़ रही है, जिससे उनका लाभ मार्जिन घट रहा है और विनिर्माण क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हो रही है। एक रिपोर्ट में यह बात कही गई है। लोक नीति शोध संस्थान पॉलिसी कंसेंसस सेंटर की रिपोर्ट के मुताबिक, सालाना 41.6 लाख टन से अधिक स्थापित क्षमता के साथ भारत प्राथमिक एल्युमीनियम का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है।
इसके बावजूद देश की लगभग 3,500 एल्युमीनियम इकाइयों, जिनमें बड़ी संख्या में सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यम (एमएसएमई) शामिल हैं, को कई संरचनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। रिपोर्ट कहती है कि ये इकाइयां एल्युमीनियम मूल्य श्रृंखला में लगभग 90 प्रतिशत रोजगार उपलब्ध कराती हैं और बिजली पारेषण, नवीकरणीय ऊर्जा, रेलवे, इलेक्ट्रिक वाहन, निर्माण एवं इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों के लिए अहम उत्पाद तैयार करती हैं। रिपोर्ट के अनुसार, एमएसएमई के सामने प्रमुख चुनौतियों में से एक प्राथमिक एल्युमीनियम पर 7.5 प्रतिशत मूल सीमा शुल्क (बीसीडी) और उस पर लागू सामाजिक कल्याण अधिभार है।
घरेलू उत्पादक आयात समता मूल्य निर्धारण के आधार पर कीमत तय करते हैं, जिसमें सीमा शुल्क को भी शामिल कर लिया जाता है। इससे घरेलू खरीदारों को भी आयात के बराबर कीमत चुकानी पड़ती है। इस व्यवस्था के कारण कच्चे माल की लागत बढ़ जाती है, जिससे पहले से सीमित परिचालन मार्जिन और कम हो जाता है तथा मूल्य संवर्धित विनिर्माण क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मकता कमजोर पड़ती है।
रिपोर्ट में शुल्क ढांचे में असंतुलन की ओर भी ध्यान दिलाया गया है। इसके तहत प्राथमिक एल्युमीनियम पर शुल्क कई तैयार उत्पादों की तुलना में अधिक है, जबकि आसियान, जापान और दक्षिण कोरिया के साथ मुक्त व्यापार समझौतों के चलते कई तैयार एल्युमीनियम उत्पाद रियायती या शून्य शुल्क पर भारत में आयात हो रहे हैं, जिससे घरेलू एमएसएमई पर प्रतिस्पर्धी दबाव बढ़ रहा है। इसमें सुझाव दिया गया है कि प्राथमिक एल्युमीनियम पर मूल सीमा शुल्क को चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया जाए और उत्पादकों के लिए ऊर्जा लागत की भरपाई के उपाय किए जाएं, ताकि संतुलन बना रहे।
इसके अलावा, उत्पाद की उत्पत्ति के नियमों को सख्त करने, आवश्यक होने पर शुल्क-दर कोटा लागू करने, मुक्त व्यापार समझौतों के तहत सत्यापन व्यवस्था को मजबूत करने तथा अनुचित मूल्य पर होने वाले आयात के खिलाफ लक्षित व्यापारिक उपाय अपनाने की भी सिफारिश की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, शुल्क का युक्तिसंगत निर्धारण डाउनस्ट्रीम एमएसएमई की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने, घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित करने, मूल्य संवर्धन बढ़ाने और रोजगार सृजन के साथ ‘मेक इन इंडिया’ पहल को मजबूती देने में मददगार होगा।
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