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Deoria में अवैध मदरसे पर आर-पार: BJP विधायक Shalabh Mani Tripathi ने शुरू की कानूनी लड़ाई | UP News

देवरिया सदर से भाजपा विधायक डॉ. शलभमणि त्रिपाठी ने बैतालपुर क्षेत्र के भंडा गांव में सरकारी स्कूल की जमीन पर बने एक कथित अवैध मदरसे को हटाने के लिए कानूनी मोर्चा खोल दिया है। सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी कर विधायक ने दावा किया कि इस गांव में अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं और बहुसंख्यक समाज (हिंदू) अल्पसंख्यक हो गया है. स्थानीय निवासियों के हवाले से उन्होंने आरोप लगाया कि चरमपंथियों के बढ़ते प्रभाव के कारण गांव में दुर्गा पूजा और छठ पूजा जैसे धार्मिक त्योहार ठीक से नहीं मनाने दिए जा रहे हैं। विधायक शलभमणि त्रिपाठी ने इस स्थिति को गंभीर बताते हुए जनता से अपील की है कि वे भंडा गांव के पीड़ित हिंदू परिवारों का साथ दें। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकारी जमीन पर अतिक्रमण कर बनाए गए इस अवैध मदरसे को ध्वस्त कराने के लिए वह कानूनी रूप से प्रतिबद्ध हैं और इसे नेस्तनाबूद करके ही दम लेंगे। Deoria में अवैध मदरसे पर आर-पार: BJP विधायक Shalabh Mani Tripathi ने शुरू की कानूनी लड़ाई | UP News . #Deoria #ShalabhManiTripathi #IllegalMadrasa #Baitalpur #UttarPradesh #Encroachment #UPNews #SaveHindus #DeoriaPolitics ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------ Disclaimer: Republic Media Network may provide content through third-party websites, operating systems, platforms, and portals (‘Third-Party Platforms’). Republic does not control and has no liability for Third-Party Platforms, including content hosted, advertisements, security, functionality, operation, or availability. ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------ रिपब्लिक भारत देश का नंबर वन न्यूज चैनल है। देश और दुनिया की जनहित से जुड़ी ब्रेकिंग न्यूज़, राजनीति, खेल और मनोरंजन की खबरों का खजाना है । इस खजाने तक पहुंचने के लिए रिपब्लिक भारत से जुड़े रहिए और सब्सक्राइब करिए। ► http://bit.ly/RBharat R. Bharat TV - India's no.1 Hindi news channel keeps you updated with non-stop LIVE and breaking news. Watch the latest reports on political news, sports news, entertainment, and much more. आप Republic Bharat से जुड़ें और अपडेट्स पाएं! ???? Facebook: https://www.facebook.com/RepublicBharatHindi/ ???? Twitter: https://twitter.com/Republic_Bharat ???? Instagram: https://www.instagram.com/republicbharat/ ???? WhatsApp: https://whatsapp.com/channel/0029Va7GPTi7dmecQ2LFH01I ???? Telegram: https://t.me/RepublicBharatHindi ???? LinkedIn: https://www.linkedin.com/company/republic-bharat/

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नाम किसी और का, काम किसी और का? बॉलीवुड के 'घोस्ट डायरेक्टर्स' का पूरा खेल समझिए

Ghost Directors And Credit Disputes Explainer: बॉलीवुड के ग्लैमर वर्ल्ड, रेड कार्पेट, अवॉर्ड नाइट्स और करोड़ों की कमाई के पीछे एक ऐसी दुनिया भी मौजूद है, जिसकी चर्चा अक्सर बंद कमरों में की जाती है. आपने अक्सर देखा होगा कि जब कोई फिल्म सुपरहिट होती है तो लोगों की नजर पोस्टर पर लिखे डायरेक्टर, प्रोड्यूसर और बड़े-बड़े हीरो और हीरोइन पर जाती है, लेकिन फिल्म बनाना इतना आसान नहीं होता क्योंकि एक फिल्म बनाने के पीछे सैकड़ों लोगों की मेहनत लगती है.जिनका रोल पर्दे पर दिखाई देने वाले क्रेडिट से कहीं ज्यादा होती है. 

इसी के साथ हमारे सामने दो शब्द आते हैं पहला घोस्ट डायरेक्टिंग (Ghost Directing) और  दूसरा क्रेडिट डिस्प्यूट (Credit Disputes). ये ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर सालों से फिल्म इंडस्ट्री के अंदर  बहस होती रही है. हालांकि हर मामला अलग होता है और किसी एक मामले के आधार पर पूरी इंडस्ट्री के विवाद को नहीं समझा जा सकता है. लेकिन यह समझना दिलचस्प है कि आखिर ये शब्द क्या हैं, इनकी इंडस्ट्री में क्यों होती है और फिल्म बनाने के पीछे कितनी मेहनत लगती है. आइए इस बारे में विस्तार से समझते हैं-

क्या होता है 'घोस्ट डायरेक्टिंग'?

'घोस्ट डायरेक्टर' कोई ऑफिशियल पोस्ट नहीं होती है.  यह एक बोलचाल शब्द है, जिसका इस्तेमाल उन जगह किया जाता है जहां किसी फिल्म के डायरेक्शन में किसी ऐसे शख्स का अहम रोल होता है, जिसे क्रेडिट नहीं मिल पाता है. एक फिल्म को कई सारे लोग मिलकर बनाते हैं. इसमें सेट पर डायरेक्टर के अलावा एसोसिएट डायरेक्टर, सेकंड यूनिट डायरेक्टर, क्रिएटिव प्रोड्यूसर, एक्शन डायरेक्टर और कई एक्सपर्ट्स मौजूद होते हैं. कई बार इनमें से कुछ लोग फिल्म के फिल्म बनाने में अहम योगदान देते हैं , यानी कई लोगों को यह नहीं पता चल पाता कि फिल्म बनाने में असली योगदान किसका था. हालांकि यह समझना भी जरूरी है कि फिल्म के डायरेक्शन की जिम्मेदारी केवल कैमरे के सामने का काम नहीं होती. इसके लिए स्क्रिनप्ले, कलाकारों की कास्टिंग, क्रिटिव काम , पोस्ट-प्रोडक्शन और फिल्म कैसे बनेगी इन लोगों का ही काम होता है. 

स्टार सिस्टम और बड़े नामों का बोलबाला

फिल्म इंडस्ट्री में नाम और ब्रांड वैल्यू की रोल बेहद बड़ा माना जाता है. किसी बड़े डायरेक्टर, प्रोड्यूसर या स्टार का नाम जुड़ने से फिल्म में पैसा लगाने वाला, डिस्ट्रीब्यूटर और ऑडियंस  का भरोसा बढ़ता है.यही वजह है कि कई बार बड़े फिल्मकारों की टीम में काम करने वाले टैलेंटेड लोगों का अहम रोल होता है, लेकिन  इसका क्रेडिट किसी और को मिल जाता है. यह केवल बॉलीवुड तक सीमित नहीं है, हॉलीवुड  इंडस्ट्री में भी बड़े क्रिएटिव प्रोजेक्ट्स अक्सर टीमवर्क का नतीजा होते हैं. इसी वजह से कभी-कभी यह बहस छिड़ जाती है कि किसी फिल्म की कामयाबी का असली क्रेडिट किसे मिलना चाहिए, उस शख्स को जिसका नाम पोस्टर पर है या पूरी टीम को जिसने उसे संभव बनाया.

क्रेडिट विवाद आखिर होते क्यों हैं?

फिल्म बनाने में सबसे ज्यादा विवाद राइटिंग, डायरेक्शन और म्यूजिशियन के बीच देखने को मिलते हैं.एक फिल्म की स्टोरी पर कई लोग काम कर सकते हैं. कोई मैन स्टोरी लिखता है, कोई स्क्रीनप्ले तैयार करता है, कोई डायलॉग लिखता है और कोई बाद में इसमें बदलाव करता है. जब इतने सारे क्रेटिव लोग एक साथ आते हैं, तो कभी-कभी यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि इसका क्रेडिट किसे मिलना चाहिए.

म्यूजिशियन की दुनिया में भी ऐसी चर्चाएं समय-समय पर सामने आती रही हैं. किसी गाने को बनाने में कंपोजर, अरेंजर, लिरिसिस्ट, प्रोड्यूसर और टेक्निकल टीम शामिल होती है. ऐसे में ऑडियंस को अक्सर कुछ लोगों के नाम ही देखने के लिए मिलेत हैं. जबकि पर्दे के पीछे कई लोगों ने काम किया होता है. 

एग्रीमेंट और क्रेडिट को लड़ाई

फिल्म इंडस्ट्री में ज्यादातर काम एग्रीमेंट पर होता है. इन एग्रीमेंट में साफ लिखा होता है कि किसका क्या रोल होगा. उसे कितने पैसे दिए जाएंगे और उसका क्रेडिट किसे मिलेगा. ऐसे में कई बार भ्रम पैदा होता है कि जिसने काम किया, उसी को  क्रेडिट मिलना चाहिए. लेकिन ये सब एग्रीमेंट के हिसाब से तय होता है. इसीलिए किसी भी क्रेडिट विवाद को समझने के लिए एग्रीमेंट को भी समझना जरूरी होता है.

क्रेडिट को लेकर कई बार देखने को मिले विवाद

इंडियन फिल्म इंडस्ट्री में समय-समय पर कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां फिल्म की राइटिंग और डायरेक्शन को लेकर विवाद देखने को मिला.कई मामलों में कलाकारों, राइटर और डायरेक्टर ने खुलकर अपनी बात रखी, जबकि कई विवाद आपस में सुलझा लिए गए. हालांकि, इन विवादों से एक सवाल जरूर खड़ा होता है कि क्या फिल्म बनाने वाले सभी लोगों को क्रेडिट मिलना चाहिए या नहीं? बहरहाल हर मामले की सच्चाई अलग-अलग होती है और कई विवादों में दोनों पक्षों की अलग राय होती है, लेकिन इन चर्चाओं ने क्रेडिट सिस्टम को लेकर अवेयरनेस जरूर बढ़ाई है.

Photograph: (Chatgpt Generated Image)

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क्या ओटीटी और नई जनरेशन बदल रही है तस्वीर?

पिछले कुछ सालों में ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और डिजिटल कंटेंट की वजह से लोगों के लिए नए अवसर पैदा हुए हैं. अब राइटिंग, डायरेक्शन और टैनिशियन को पहले की तुलना में ज्यादा मौके मिल रहे हैं.वेब सीरीज और डिजिटल फिल्मों में अक्सर राइटर्स और क्रिएटिव टीम को पहचान मिल रही है. इससे दर्शकों का ध्यान केवल स्टार कलाकारों से हटकर कंटेंट बनाने वाले लोगों पर भी जाने लगा है. इसके अलावा सोशल मीडिया ने भी क्रिटिव लोगों को अपनी बात सीधे लोगों तक पहुंचाने का मंच दिया है. अब किसी राइटर, डायरेक्टर या क्रिटिव लोगों का काम पर्दे के पीछे पूरी तरह छिपा नहीं रहता है.

क्या वाकई यह बॉलीवुड का बड़ा मुद्दा है?

इस सवाल का सीधा जवाब देना आसान नहीं है. फिल्म इंडस्ट्री में टीमवर्क हमेशा से मौजूद रहा है और ज्यादातर प्रोजेक्ट्स में कई लोगों की मेहनत होती है. वहीं दूसरी ओर, क्रेडिट और पहचान को लेकर समय-समय पर उठने वाली बहसें यह इशारा भी दिया है कि क्रिएटिविटी का मुद्दा आज भी विचार करने वाला है.  इस मामले में कई एक्सपर्ट का मानना है कि ट्रांसपेरेंस  क्रेडिट सिस्टम, मजबूत पेशेवर संगठनों और एग्रीमेंट से इस तरह की बहसों को कम किया जा सकता है.

'घोस्ट डायरेक्टर' और 'क्रेडिट डिस्प्यूट' जैसे शब्द बॉलीवुड के उस हिस्से की ओर इशारा करते हैं, जिसे आम लोग शायद ही कभी देख पाते हैं. फिल्में केवल एक स्टार, डायरेक्टर या प्रोड्यूसर की मेहनत का नतीजा नहीं होता, बल्कि इसके पीछे सैकड़ों की क्रिएटिविटी होती है. यही वजह है कि आज फिल्म इंडस्ट्री में ट्रांसपेरेंसी,सही क्रेडिट और क्रिएटिविटी की पहचान को लेकर चर्चा पहले से ज्यादा जरूरी  हो गई है. आखिरकार, सिनेमा सिर्फ स्क्रीन पर दिखने वाले चेहरों का नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे काम करने वाले उन अनगिनत लोगों का भी होता है, जिनकी मेहनत से एक फिल्म बनकर तैयार होती है. 

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  Sports

जमीन बेचकर बेटे को बनाया Cricketer, Bihar के Vaibhav Suryavanshi की Team India तक की संघर्ष गाथा

बिहार के समस्तीपुर जिले के रहने वाले संजीव सूर्यवंशी की कहानी एक ऐसे पिता की है, जिन्होंने अपने बेटे वैभव सूर्यवंशी के क्रिकेटर बनने के सपने को साकार करने के लिए हर वह त्याग किया, जिसकी कल्पना करना भी आसान नहीं है।

आज 15 वर्षीय वैभव सूर्यवंशी भारतीय क्रिकेट का नया चमकता सितारा बन चुके हैं। लेकिन इस सफलता के पीछे वर्षों की मेहनत, संघर्ष और परिवार के बलिदान की लंबी कहानी छिपी हुई है। मौजूद जानकारी के अनुसार वैभव के क्रिकेट करियर को आगे बढ़ाने के लिए उनके पिता ने अपनी पैतृक जमीन तक बेच दी थी, ताकि बेटे को बेहतर प्रशिक्षण और सुविधाएं मिल सकें।

गौरतलब है कि ग्रामीण भारत में पैतृक जमीन केवल संपत्ति नहीं होती, बल्कि परिवार की पहचान और विरासत का प्रतीक मानी जाती है। ऐसे में जमीन बेचना किसी परिवार के लिए बेहद भावनात्मक फैसला होता है। लेकिन संजीव सूर्यवंशी ने बेटे के सपनों को जमीन और पैसों से अधिक महत्व दिया।

संजीव सूर्यवंशी का कहना है कि अब जब उनका सपना पूरा हो रहा है, तब जमीन और धन की कोई अहमियत नहीं रह गई है। उनके अनुसार वैभव को जो सम्मान और पहचान देश-विदेश में मिल रही है, वही उनके लिए सबसे बड़ी खुशी है।

बता दें कि वैभव सूर्यवंशी का नाम हाल ही में आयरलैंड और इंग्लैंड के खिलाफ होने वाली छोटी अवधि की श्रृंखला के लिए भारतीय टीम में शामिल किया गया है। इसके साथ ही वह भारतीय क्रिकेट टीम में चुने जाने वाले सबसे कम उम्र के खिलाड़ी बन गए हैं। यह उपलब्धि उन्हें शानदार घरेलू प्रतियोगिता और जूनियर विश्व कप में दमदार प्रदर्शन के बाद मिली है।

मौजूद जानकारी के अनुसार वैभव ने वर्ष 2026 की बड़ी घरेलू प्रतियोगिता में 776 रन बनाकर सबसे अधिक रन बनाने वाले बल्लेबाज का गौरव हासिल किया था। उन्होंने पूरे सत्र में एक शतक और पांच अर्धशतक लगाए। इसके अलावा उन्हें सर्वश्रेष्ठ उभरते खिलाड़ी, सबसे मूल्यवान खिलाड़ी, सर्वाधिक रन बनाने वाले बल्लेबाज, सर्वश्रेष्ठ प्रहार दर और सबसे अधिक छक्के लगाने जैसे कई पुरस्कार भी मिले थे।

वैभव की क्रिकेट यात्रा तब शुरू हुई थी, जब वह केवल चार साल के थे। उनके पिता ने पहली बार उनके खेल में असाधारण प्रतिभा देखी। इसके बाद प्लास्टिक और टेनिस गेंद से शुरू हुआ सफर धीरे-धीरे पेशेवर प्रशिक्षण तक पहुंचा। समस्तीपुर से पटना तक लगभग 90 किलोमीटर की दूरी तय कर प्रशिक्षण के लिए जाना परिवार के लिए आसान नहीं था, लेकिन संजीव सूर्यवंशी ने कभी हार नहीं मानी।

गौरतलब है कि बेटे को नियमित अभ्यास के लिए ले जाने के उद्देश्य से उन्होंने एक वाहन भी खरीदा था। इसके लिए भी जमीन बेचने से प्राप्त धन का उपयोग किया गया था। आज जब वैभव भारतीय टीम की दहलीज पर खड़े हैं, तब उनके पिता को अपने फैसले पर कोई पछतावा नहीं है।

संजीव सूर्यवंशी बताते हैं कि वैभव बचपन से ही देश के लिए खेलने का सपना देखते थे और उसी लक्ष्य के लिए लगातार मेहनत कर रहे थे। जब भारतीय टीम में चयन की खबर आई, तब पूरा परिवार भावुक हो गया। घर पर रिश्तेदारों, दोस्तों और गांव के लोगों का तांता लग गया। हर कोई इस उपलब्धि का जश्न मना रहा था।

मौजूद जानकारी के अनुसार चयन की खबर मिलने के समय वैभव श्रीलंका में अभ्यास कर रहे थे। उन्होंने अपने पिता को फोन कर चयन की जानकारी दी और बताया कि वहां मौजूद सभी लोग उन्हें बधाई दे रहे हैं।

अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि वैभव को आयरलैंड या इंग्लैंड दौरे पर पदार्पण का मौका मिलता है या नहीं। यदि वह अंतिम एकादश में जगह बनाने में सफल रहते हैं, तो वह भारत के लिए सबसे कम उम्र में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलने वाले खिलाड़ी बन जाएंगे। फिलहाल यह रिकॉर्ड सचिन तेंदुलकर के नाम दर्ज है। ऐसे में वैभव सूर्यवंशी के सामने इतिहास रचने का सुनहरा अवसर है और पूरा देश उनके अगले कदम का इंतजार कर रहा है।
Thu, 11 Jun 2026 22:58:57 +0530

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