नाम किसी और का, काम किसी और का? बॉलीवुड के 'घोस्ट डायरेक्टर्स' का पूरा खेल समझिए
Ghost Directors And Credit Disputes Explainer: बॉलीवुड के ग्लैमर वर्ल्ड, रेड कार्पेट, अवॉर्ड नाइट्स और करोड़ों की कमाई के पीछे एक ऐसी दुनिया भी मौजूद है, जिसकी चर्चा अक्सर बंद कमरों में की जाती है. आपने अक्सर देखा होगा कि जब कोई फिल्म सुपरहिट होती है तो लोगों की नजर पोस्टर पर लिखे डायरेक्टर, प्रोड्यूसर और बड़े-बड़े हीरो और हीरोइन पर जाती है, लेकिन फिल्म बनाना इतना आसान नहीं होता क्योंकि एक फिल्म बनाने के पीछे सैकड़ों लोगों की मेहनत लगती है.जिनका रोल पर्दे पर दिखाई देने वाले क्रेडिट से कहीं ज्यादा होती है.
इसी के साथ हमारे सामने दो शब्द आते हैं पहला घोस्ट डायरेक्टिंग (Ghost Directing) और दूसरा क्रेडिट डिस्प्यूट (Credit Disputes). ये ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर सालों से फिल्म इंडस्ट्री के अंदर बहस होती रही है. हालांकि हर मामला अलग होता है और किसी एक मामले के आधार पर पूरी इंडस्ट्री के विवाद को नहीं समझा जा सकता है. लेकिन यह समझना दिलचस्प है कि आखिर ये शब्द क्या हैं, इनकी इंडस्ट्री में क्यों होती है और फिल्म बनाने के पीछे कितनी मेहनत लगती है. आइए इस बारे में विस्तार से समझते हैं-
क्या होता है 'घोस्ट डायरेक्टिंग'?
'घोस्ट डायरेक्टर' कोई ऑफिशियल पोस्ट नहीं होती है. यह एक बोलचाल शब्द है, जिसका इस्तेमाल उन जगह किया जाता है जहां किसी फिल्म के डायरेक्शन में किसी ऐसे शख्स का अहम रोल होता है, जिसे क्रेडिट नहीं मिल पाता है. एक फिल्म को कई सारे लोग मिलकर बनाते हैं. इसमें सेट पर डायरेक्टर के अलावा एसोसिएट डायरेक्टर, सेकंड यूनिट डायरेक्टर, क्रिएटिव प्रोड्यूसर, एक्शन डायरेक्टर और कई एक्सपर्ट्स मौजूद होते हैं. कई बार इनमें से कुछ लोग फिल्म के फिल्म बनाने में अहम योगदान देते हैं , यानी कई लोगों को यह नहीं पता चल पाता कि फिल्म बनाने में असली योगदान किसका था. हालांकि यह समझना भी जरूरी है कि फिल्म के डायरेक्शन की जिम्मेदारी केवल कैमरे के सामने का काम नहीं होती. इसके लिए स्क्रिनप्ले, कलाकारों की कास्टिंग, क्रिटिव काम , पोस्ट-प्रोडक्शन और फिल्म कैसे बनेगी इन लोगों का ही काम होता है.
स्टार सिस्टम और बड़े नामों का बोलबाला
फिल्म इंडस्ट्री में नाम और ब्रांड वैल्यू की रोल बेहद बड़ा माना जाता है. किसी बड़े डायरेक्टर, प्रोड्यूसर या स्टार का नाम जुड़ने से फिल्म में पैसा लगाने वाला, डिस्ट्रीब्यूटर और ऑडियंस का भरोसा बढ़ता है.यही वजह है कि कई बार बड़े फिल्मकारों की टीम में काम करने वाले टैलेंटेड लोगों का अहम रोल होता है, लेकिन इसका क्रेडिट किसी और को मिल जाता है. यह केवल बॉलीवुड तक सीमित नहीं है, हॉलीवुड इंडस्ट्री में भी बड़े क्रिएटिव प्रोजेक्ट्स अक्सर टीमवर्क का नतीजा होते हैं. इसी वजह से कभी-कभी यह बहस छिड़ जाती है कि किसी फिल्म की कामयाबी का असली क्रेडिट किसे मिलना चाहिए, उस शख्स को जिसका नाम पोस्टर पर है या पूरी टीम को जिसने उसे संभव बनाया.
क्रेडिट विवाद आखिर होते क्यों हैं?
फिल्म बनाने में सबसे ज्यादा विवाद राइटिंग, डायरेक्शन और म्यूजिशियन के बीच देखने को मिलते हैं.एक फिल्म की स्टोरी पर कई लोग काम कर सकते हैं. कोई मैन स्टोरी लिखता है, कोई स्क्रीनप्ले तैयार करता है, कोई डायलॉग लिखता है और कोई बाद में इसमें बदलाव करता है. जब इतने सारे क्रेटिव लोग एक साथ आते हैं, तो कभी-कभी यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि इसका क्रेडिट किसे मिलना चाहिए.
म्यूजिशियन की दुनिया में भी ऐसी चर्चाएं समय-समय पर सामने आती रही हैं. किसी गाने को बनाने में कंपोजर, अरेंजर, लिरिसिस्ट, प्रोड्यूसर और टेक्निकल टीम शामिल होती है. ऐसे में ऑडियंस को अक्सर कुछ लोगों के नाम ही देखने के लिए मिलेत हैं. जबकि पर्दे के पीछे कई लोगों ने काम किया होता है.
एग्रीमेंट और क्रेडिट को लड़ाई
फिल्म इंडस्ट्री में ज्यादातर काम एग्रीमेंट पर होता है. इन एग्रीमेंट में साफ लिखा होता है कि किसका क्या रोल होगा. उसे कितने पैसे दिए जाएंगे और उसका क्रेडिट किसे मिलेगा. ऐसे में कई बार भ्रम पैदा होता है कि जिसने काम किया, उसी को क्रेडिट मिलना चाहिए. लेकिन ये सब एग्रीमेंट के हिसाब से तय होता है. इसीलिए किसी भी क्रेडिट विवाद को समझने के लिए एग्रीमेंट को भी समझना जरूरी होता है.
क्रेडिट को लेकर कई बार देखने को मिले विवाद
इंडियन फिल्म इंडस्ट्री में समय-समय पर कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां फिल्म की राइटिंग और डायरेक्शन को लेकर विवाद देखने को मिला.कई मामलों में कलाकारों, राइटर और डायरेक्टर ने खुलकर अपनी बात रखी, जबकि कई विवाद आपस में सुलझा लिए गए. हालांकि, इन विवादों से एक सवाल जरूर खड़ा होता है कि क्या फिल्म बनाने वाले सभी लोगों को क्रेडिट मिलना चाहिए या नहीं? बहरहाल हर मामले की सच्चाई अलग-अलग होती है और कई विवादों में दोनों पक्षों की अलग राय होती है, लेकिन इन चर्चाओं ने क्रेडिट सिस्टम को लेकर अवेयरनेस जरूर बढ़ाई है.
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क्या ओटीटी और नई जनरेशन बदल रही है तस्वीर?
पिछले कुछ सालों में ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और डिजिटल कंटेंट की वजह से लोगों के लिए नए अवसर पैदा हुए हैं. अब राइटिंग, डायरेक्शन और टैनिशियन को पहले की तुलना में ज्यादा मौके मिल रहे हैं.वेब सीरीज और डिजिटल फिल्मों में अक्सर राइटर्स और क्रिएटिव टीम को पहचान मिल रही है. इससे दर्शकों का ध्यान केवल स्टार कलाकारों से हटकर कंटेंट बनाने वाले लोगों पर भी जाने लगा है. इसके अलावा सोशल मीडिया ने भी क्रिटिव लोगों को अपनी बात सीधे लोगों तक पहुंचाने का मंच दिया है. अब किसी राइटर, डायरेक्टर या क्रिटिव लोगों का काम पर्दे के पीछे पूरी तरह छिपा नहीं रहता है.
क्या वाकई यह बॉलीवुड का बड़ा मुद्दा है?
इस सवाल का सीधा जवाब देना आसान नहीं है. फिल्म इंडस्ट्री में टीमवर्क हमेशा से मौजूद रहा है और ज्यादातर प्रोजेक्ट्स में कई लोगों की मेहनत होती है. वहीं दूसरी ओर, क्रेडिट और पहचान को लेकर समय-समय पर उठने वाली बहसें यह इशारा भी दिया है कि क्रिएटिविटी का मुद्दा आज भी विचार करने वाला है. इस मामले में कई एक्सपर्ट का मानना है कि ट्रांसपेरेंस क्रेडिट सिस्टम, मजबूत पेशेवर संगठनों और एग्रीमेंट से इस तरह की बहसों को कम किया जा सकता है.
'घोस्ट डायरेक्टर' और 'क्रेडिट डिस्प्यूट' जैसे शब्द बॉलीवुड के उस हिस्से की ओर इशारा करते हैं, जिसे आम लोग शायद ही कभी देख पाते हैं. फिल्में केवल एक स्टार, डायरेक्टर या प्रोड्यूसर की मेहनत का नतीजा नहीं होता, बल्कि इसके पीछे सैकड़ों की क्रिएटिविटी होती है. यही वजह है कि आज फिल्म इंडस्ट्री में ट्रांसपेरेंसी,सही क्रेडिट और क्रिएटिविटी की पहचान को लेकर चर्चा पहले से ज्यादा जरूरी हो गई है. आखिरकार, सिनेमा सिर्फ स्क्रीन पर दिखने वाले चेहरों का नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे काम करने वाले उन अनगिनत लोगों का भी होता है, जिनकी मेहनत से एक फिल्म बनकर तैयार होती है.
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