Explainer: क्या कांग्रेस के भरोसे चलेगी दीदी , संकट के वक्त कौन चट्टान की तरह ममता के साथ? जानिए क्यों मुश्किल दिख रही वापसी
Explainer: पश्चिम बंगाल की राजनीति में लंबे समय तक अजेय मानी जाने वाली ममता बनर्जी आज अपने राजनीतिक करियर के सबसे कठिन दौर से गुजरती दिखाई दे रही हैं. एक समय ऐसा था जब तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) राज्य की राजनीति पर पूरी तरह हावी थी और विपक्ष लगभग अप्रासंगिक हो चुका था. लेकिन हालिया विधानसभा चुनाव में मिली हार और उसके बाद पार्टी के भीतर शुरू हुई बगावत ने टीएमसी को गंभीर संकट में डाल दिया है.
अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या ममता बनर्जी की राजनीति को नया सहारा कांग्रेस से मिलेगा? या फिर टीएमसी के सामने अस्तित्व बचाने की चुनौती खड़ी हो चुकी है?
आखिर टीएमसी में बगावत क्यों शुरू हुई?
किसी भी राजनीतिक दल में असंतोष अचानक पैदा नहीं होता. इसके पीछे लंबे समय से जमा हो रही नाराजगी और नेतृत्व को लेकर सवाल होते हैं.
टीएमसी के कई नेताओं का आरोप है कि पार्टी के भीतर संवाद की कमी बढ़ती गई. चुनावी हार के कारणों की गंभीर समीक्षा नहीं हुई और संगठन में कुछ चुनिंदा नेताओं का प्रभाव लगातार बढ़ता गया. कई नेताओं को लगा कि जमीनी कार्यकर्ताओं की आवाज शीर्ष नेतृत्व तक नहीं पहुंच रही.
यही वजह है कि चुनाव के बाद कई विधायक, सांसद और स्थानीय स्तर के नेता खुलकर नेतृत्व के खिलाफ बोलने लगे. कुछ नेताओं ने तो सार्वजनिक रूप से यह तक कहा कि पार्टी को आत्ममंथन की जरूरत है.
शताब्दी रॉय के बयान ने क्यों बढ़ाई चिंता?
बीरभूम से सांसद शताब्दी रॉय का हालिया बयान टीएमसी के लिए बड़ा संकेत माना जा रहा है. उन्होंने पार्टी संगठन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए और कहा कि चुनावी हार को केवल विपक्ष की ताकत से नहीं समझा जा सकता.
उनके मुताबिक संगठन के भीतर शिकायतों को नजरअंदाज किया गया, भ्रष्टाचार के आरोपों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया और अति-आत्मविश्वास ने भी पार्टी को नुकसान पहुंचाया.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब किसी दल के वरिष्ठ नेता सार्वजनिक रूप से ऐसी बातें कहने लगें तो यह आंतरिक संकट की गंभीरता को दर्शाता है.
58 विधायक और 20 सांसदों की बगावत का क्या मतलब?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि टीएमसी के बड़ी संख्या में विधायक और सांसद नेतृत्व से असंतुष्ट हैं. यदि वास्तव में इतनी बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि अलग रुख अपनाते हैं तो यह केवल संगठनात्मक समस्या नहीं बल्कि नेतृत्व की चुनौती बन जाती है.
बागी गुट खुद को "असली टीएमसी" बताने की कोशिश कर रहा है. उनका दावा है कि पार्टी की मूल विचारधारा और कार्यशैली को बचाने की जरूरत है. हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि अभी अलग-अलग स्तरों पर होती रही है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि टीएमसी के भीतर एक बड़ा राजनीतिक संघर्ष चल रहा है.
कौन हैं ममता के सबसे भरोसेमंद सांसद?
संकट के इस दौर में भी कुछ नेता पूरी मजबूती से ममता बनर्जी के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं. इनमें कल्याण बनर्जी, महुआ मोइत्रा, सुदीप बंदोपाध्याय, प्रसून बनर्जी, सजदा अहमद, सौगत रॉय, प्रतिमा मंडल, अभिषेक बनर्जी और कीर्ति आजाद जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं.
विशेष रूप से अभिषेक बनर्जी को टीएमसी का भविष्य माना जाता है. पार्टी के भीतर उनका प्रभाव लगातार बढ़ा है और वे संगठन को संभालने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या कुछ वफादार नेताओं के सहारे इतने बड़े राजनीतिक संकट को टाला जा सकता है?
सुष्मिता देव का इस्तीफा क्यों महत्वपूर्ण है?
टीएमसी की राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव का इस्तीफा पार्टी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. वह केवल सांसद ही नहीं थीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी का एक प्रमुख चेहरा भी थीं.
कांग्रेस छोड़कर टीएमसी में शामिल हुई सुष्मिता देव का पार्टी से अलग होना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि असंतोष केवल राज्य स्तर तक सीमित नहीं है. उनके इस्तीफे ने यह बहस भी तेज कर दी है कि क्या आने वाले समय में और बड़े नेता भी अलग रास्ता चुन सकते हैं.
क्या कांग्रेस बन सकती है ममता का सहारा?
राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए यह सवाल बार-बार उठ रहा है कि क्या टीएमसी और कांग्रेस के बीच किसी प्रकार की नजदीकी बढ़ सकती है. हालांकि दोनों दलों के बीच लंबे समय से प्रतिस्पर्धा और राजनीतिक मतभेद रहे हैं, लेकिन बदलते समीकरणों में राजनीति अक्सर नए गठबंधन पैदा करती है.
यदि टीएमसी को अपने संगठन को बचाने और राष्ट्रीय राजनीति में प्रासंगिक बने रहने के लिए सहयोग की जरूरत पड़ती है तो कांग्रेस एक संभावित विकल्प हो सकती है. हालांकि अभी तक दोनों पक्षों की ओर से ऐसा कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिला है.
ममता बनर्जी की वापसी क्यों मुश्किल दिख रही है?
ममता बनर्जी का राजनीतिक सफर संघर्ष और वापसी की कहानियों से भरा रहा है. उन्होंने वाम मोर्चे जैसी मजबूत राजनीतिक ताकत को सत्ता से बाहर कर इतिहास रचा था. लेकिन इस बार चुनौती अलग है. अब लड़ाई किसी बाहरी विपक्ष से ज्यादा पार्टी के भीतर की असंतुष्टि से है. संगठन में टूट, नेताओं का पलायन, चुनावी हार और नेतृत्व को लेकर उठते सवाल उनकी राह को कठिन बना रहे हैं.
इसके अलावा भाजपा लगातार बंगाल में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है. कांग्रेस और वाम दल भी नए समीकरण बनाने में जुटे हैं. ऐसे में टीएमसी के सामने राजनीतिक स्पेस बचाए रखने की चुनौती भी है.
सबकुछ असंतुष्टों पर निर्भर
आने वाले कुछ महीने पश्चिम बंगाल की राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं. यदि टीएमसी नेतृत्व असंतुष्ट नेताओं को मनाने और संगठन में विश्वास बहाल करने में सफल रहता है तो पार्टी फिर से मजबूती हासिल कर सकती है.
लेकिन यदि बगावत का दायरा बढ़ता है और सांसदों-विधायकों का पलायन जारी रहता है तो ममता बनर्जी के लिए स्थिति और कठिन हो सकती है.
फिलहाल इतना तय है कि बंगाल की राजनीति एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है. कभी अजेय दिखने वाली टीएमसी आज अपने सबसे बड़े राजनीतिक इम्तिहान का सामना कर रही है और आने वाला समय तय करेगा कि ममता बनर्जी इस संकट से उबर पाती हैं या नहीं.
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