राष्ट्रीय स्तर पर समान नागरिक संहिता को लागू करने की दिशा में कदम तेजी से बढ़ रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी शासित असम देश का तीसरा ऐसा राज्य बन गया है जहां समान नागरिक संहिता लागू करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ा दिया गया है। इससे पहले उत्तराखंड और गुजरात इस दिशा में पहल कर चुके हैं। हम आपको बता दें कि भाजपा लंबे समय से समान नागरिक संहिता को अपने प्रमुख वैचारिक संकल्प के रूप में प्रस्तुत करती रही है। अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण और अनुच्छेद 370 हटाने के बाद अब समान नागरिक संहिता को लागू करना भाजपा के तीसरे बड़े वैचारिक वादे को पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
असम सरकार ने आज राज्य विधानसभा में समान नागरिक संहिता विधेयक प्रस्तुत किया। राज्य के मंत्री अतुल बोरा ने सदन में यह विधेयक पेश किया। इस पर चर्चा और मतदान विधानसभा सत्र के अंतिम दिन होने की संभावना है। हम आपको याद दिला दें कि असम विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में राज्य में समान नागरिक संहिता लागू करने का वादा किया था और सरकार बनने के बाद 13 मई को हुई मंत्रिमंडल की पहली बैठक में इस विधेयक को मंजूरी दे दी गई थी।
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों में रहने वाले सभी आदिवासी समुदायों को इस कानून के दायरे से बाहर रखा जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि धार्मिक परंपराएं, रीति रिवाज और सांस्कृतिक मान्यताएं भी इससे प्रभावित नहीं होंगी। असम सरकार का कहना है कि समान नागरिक संहिता का उद्देश्य न्यूनतम विवाह आयु तय करना, महिलाओं को पारिवारिक संपत्ति में अधिकार दिलाना, बहुविवाह पर रोक लगाना, विवाह और तलाक का अनिवार्य पंजीकरण सुनिश्चित करना तथा साथ रहने वाले संबंधों को कानूनी मान्यता देना है।
इसी संदर्भ में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक दिन पहले नई दिल्ली में आयोजित जनजातीय सांस्कृतिक समागम में आदिवासी समाज को महत्वपूर्ण आश्वासन दिया। उन्होंने कहा कि सरकार ने समान नागरिक संहिता के दायरे से सभी आदिवासी समुदायों को बाहर रखने के लिए विशेष प्रावधान किए हैं और उनके अधिकार पूरी तरह सुरक्षित रहेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस कानून से आदिवासियों के भूमि, जंगल और सांस्कृतिक अधिकारों पर कोई आंच नहीं आएगी। अमित शाह ने भगवान बिरसा मुंडा के संघर्ष को याद करते हुए कहा कि आदिवासी समाज अपनी जमीन और जंगल का वास्तविक मालिक है और कोई भी उनके अधिकारों पर कब्जा नहीं कर सकता।
केंद्रीय गृह मंत्री का यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि समान नागरिक संहिता को लेकर अक्सर आदिवासी समाज के बीच भ्रम फैलाने की कोशिश की जाती है। कई राजनीतिक दल और संगठन यह प्रचार करते रहे हैं कि इस कानून से आदिवासियों की परंपराएं और सामाजिक व्यवस्था प्रभावित होंगी। लेकिन केंद्र और भाजपा शासित राज्य लगातार यह स्पष्ट कर रहे हैं कि आदिवासी समुदायों की सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं को पूरी सुरक्षा दी जाएगी।
हम आपको यह भी याद दिला दें कि हाल ही में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी समान नागरिक संहिता को लेकर स्पष्ट रुख सामने रखा था। उन्होंने कहा था कि तुष्टीकरण की राजनीति समाप्त करने के लिए पश्चिम बंगाल में समान नागरिक संहिता लागू की जाएगी। बंगाल चुनावों के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी कोलकाता में भाजपा का घोषणा पत्र जारी करते हुए कहा था कि यदि राज्य में भाजपा की सरकार बनती है तो छह महीने के भीतर समान नागरिक संहिता लागू कर दी जाएगी। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री का यह बयान बताता है कि भाजपा इस मुद्दे को केवल वैचारिक बहस तक सीमित नहीं रखना चाहती बल्कि राज्यों में चरणबद्ध तरीके से यूसीसी को लागू करने की रणनीति पर काम कर रही है।
साथ ही समान नागरिक संहिता को लेकर उच्चतम न्यायालय की हालिया टिप्पणी ने भी इस बहस को नई दिशा दी है। मुस्लिम महिलाओं के उत्तराधिकार अधिकारों से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा था कि उत्तराधिकार कानूनों से जुड़ी समस्याओं का समाधान समान नागरिक संहिता ही है। न्यायालय ने माना कि अलग अलग व्यक्तिगत कानूनों के कारण महिलाओं को बराबरी के अधिकार नहीं मिल पा रहे हैं और सुधार के लिए व्यापक कानून की आवश्यकता है। न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने भी कहा कि इस विषय को विधायिका के विवेक पर छोड़ना बेहतर होगा ताकि समान नागरिक संहिता जैसा कानून बनाया जा सके।
दरअसल समान नागरिक संहिता का मूल उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे मामलों में समान कानून लागू करना है। वर्तमान में अलग अलग समुदायों के लिए अलग व्यक्तिगत कानून लागू हैं, जिससे कई बार महिलाओं और कमजोर वर्गों के अधिकार प्रभावित होते हैं। उच्चतम न्यायालय ने भी कई अवसरों पर समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर बल दिया है। संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में शामिल अनुच्छेद 44 भी राज्य को समान नागरिक संहिता लागू करने का निर्देश देता है।
बहरहाल, यूसीसी संबंधी असम सरकार का निर्णय देशहित में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे महिलाओं को समान अधिकार मिलेंगे, विवाह और तलाक से जुड़ी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता आएगी तथा बहुविवाह जैसी कुप्रथाओं पर रोक लगेगी। साथ ही आदिवासी समुदायों को दायरे से बाहर रखकर सरकार ने यह संदेश भी दिया है कि सांस्कृतिक विविधता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के साथ सुधार की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकती है। उत्तराखंड और गुजरात के बाद असम का यह कदम संकेत देता है कि आने वाले समय में समान नागरिक संहिता राष्ट्रीय राजनीति और सामाजिक सुधार का प्रमुख विषय बनने वाला है।
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उत्तराखंड और गुजरात के बाद अब असम देश का तीसरा ऐसा राज्य बनने की राह पर है जो समान नागरिक संहिता लागू करने जा रहा है। असम सरकार ने सोमवार (25 मई) को विधानसभा में 'यूनिफॉर्म सिविल कोड, असम, 2026 बिल' पेश कर दिया है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की ओर से संसदीय कार्य मंत्री अतुल बोरा ने इस ऐतिहासिक विधेयक को सदन के पटल पर रखा। इस बिल का मुख्य उद्देश्य राज्य में शादी, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े कानूनों को एक समान और सरल बनाना है।
बिल का मकसद शादी और तलाक से जुड़े कानूनों को नियंत्रित करना है
बिल में दिए गए 'उद्देश्य और कारणों के विवरण' में सरमा ने कहा, "इस बिल का मकसद शादी, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े कानूनों को एक साथ लाना और उन्हें आसान बनाना है।" उन्होंने आगे कहा कि शादी के लिए, यह बिल पुरुषों और महिलाओं के लिए न्यूनतम उम्र क्रमशः 21 साल और 18 साल तय करता है, और बहुविवाह पर रोक लगाता है।
मुख्यमंत्री ने बिल में कहा, "पहली बार, यह बिल लिव-इन रिलेशनशिप के लिए एक कानूनी ढांचा मुहैया कराता है। रजिस्ट्रेशन अनिवार्य करके, यह कानून यह सुनिश्चित करता है कि पार्टनर्स के अधिकार -- और ऐसे संबंधों से पैदा होने वाले किसी भी बच्चे के अधिकार -- को औपचारिक रूप से मान्यता मिले और उनकी सुरक्षा हो।" हालांकि, बिल में यह भी कहा गया है कि यह असम में रहने वाले किसी भी अनुसूचित जनजाति पर लागू नहीं होगा। इससे पहले CM सरमा ने UCC बिल लाने की घोषणा की थी।
इससे पहले 13 मई को, गुवाहाटी के कोइनाधारा में नंबर 1 स्टेट गेस्ट हाउस में CM सरमा के दूसरे कार्यकाल की पहली कैबिनेट बैठक के बाद, यह घोषणा की गई थी कि राज्य सरकार 21 से 26 मई तक चलने वाले विधानसभा सत्र के दौरान यह कानून पेश करेगी।
कैबिनेट बैठक के फैसलों की घोषणा करते हुए CM सरमा ने कहा था कि - "राज्य कैबिनेट ने यूनिफॉर्म सिविल कोड के ड्राफ़्ट बिल को मंज़ूरी दे दी है, जिसे असम विधानसभा सत्र के आखिरी दिन पेश किया जाएगा। अनुसूचित जनजातियाँ (पहाड़ी) और अनुसूचित जनजातियाँ (मैदानी) UCC के दायरे से बाहर रहेंगी, साथ ही 'पारंपरिक धार्मिक रीति-रिवाज, प्रथाएँ और अनुष्ठान' भी इससे मुक्त रहेंगे।
UCC में मुख्य रूप से चार विषय शामिल होंगे
मुख्यमंत्री ने कहा था, "यूनिफॉर्म सिविल कोड में मुख्य रूप से ये चार विषय शामिल होंगे - शादी की न्यूनतम उम्र, बहुविवाह पर रोक, माता-पिता की संपत्ति में बेटियों को समान अधिकार, और लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े मामले।"
असम कैबिनेट ने मौजूदा सरकार के तहत असम विधानसभा का पहला सत्र 21, 22, 25 और 26 मई को बुलाने को मंज़ूरी दे दी। अगर यह बिल पास हो जाता है, तो असम, उत्तराखंड और गुजरात के बाद, UCC बिल पास करने वाला देश का तीसरा राज्य बन जाएगा। उत्तराखंड ने 2024 में UCC बिल पेश किया था, और संविधान में दिए गए राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के अनुरूप ऐसा कानून लाने वाला भारत का पहला राज्य बन गया था।
संविधान के अनुच्छेद 44 के अनुसार, राज्य भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा। इससे पहले जनवरी में, राज्य में UCC लागू होने का एक साल पूरा होने पर, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा था कि इस कानून ने महिलाओं को सशक्त बनाया है, और ज़ोर देकर कहा था कि उनकी सुरक्षा बढ़ी है। "UCC को लेकर लोगों के मन में जो भी शंकाएं, सवाल और आशंकाएं थीं, वे सभी दूर हो गई हैं। अफवाहें भी खत्म हो गई हैं, और पांच लाख से ज़्यादा मामलों में, निजता के उल्लंघन का एक भी मामला सामने नहीं आया है। CM धामी ने कहा, 'UCC लागू होने के बाद, खासकर महिलाओं को सशक्त बनाया गया है और उनकी सुरक्षा बढ़ी है, साथ ही दूसरों की सुरक्षा भी बढ़ी है।'
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