अफगानिस्तान में बाढ़ से तबाही, बेघर हुए हजारों परिवार : आईओएम
काबुल, 11 मई (आईएएनएस)। इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन फॉर माइग्रेशन (आईओएम) ने बताया कि अफगानिस्तान के नंगरहार प्रांत में आई बाढ़ से लगभग दो हजार परिवार हाल ही में प्रभावित हुए हैं।
अफगानिस्तान की प्रमुख समाचार एजेंसी खामा प्रेस की जानकारी के अनुसार, आईओएम ने कहा कि प्रभावित परिवारों को आपातकालीन राहत सामग्री दी गई है, जबकि मानवीय टीमें अभी भी बाढ़ से प्रभावित लोगों की जरूरतों का आकलन कर रही हैं।
एजेंसी के अनुसार, नंगरहार में बाढ़ के बाद कई लोगों ने घर, खेती की जमीन और घरेलू सामान खो दिए हैं, जिससे पहले से ही मुश्किल हालात में रह रहे कमजोर परिवारों की समस्याएं बढ़ गई हैं।
आईओएम ने बताया कि नंगरहार में कम से कम 250 और परिवारों को अतिरिक्त मानवीय सहायता देने की योजना है, जबकि प्रभावित इलाकों में राहत और पुनर्वास का काम चल रहा है।
संगठन के मुताबिक, इसी तरह की राहत गतिविधियां लघमान और कुनार प्रांतों में भी चल रही हैं। यहां भी हाल ही में आई बाढ़ ने लोगों और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाया है।
खामा प्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, मानवीय सहायता एजेंसियों ने कहा कि हाल के वर्षों में बाढ़, कड़ाके की ठंड और सूखे जैसी चरम मौसमी स्थितियों ने अफगानिस्तान को प्रभावित किया है, जिससे गरीबी और विस्थापन से पहले से ही जूझ रहे लाखों लोगों पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है।
इससे पहले संयुक्त राष्ट्र ने बताया था कि हाल की बाढ़ से अफगानिस्तान में लगभग 73,000 लोग प्रभावित हुए हैं। इस कारण हजारों परिवारों को आश्रय, भोजन और इलाज की जरूरत है।
पिछले महीने अफगान आपदा प्राधिकरणों ने कहा था कि भारी बारिश, अचानक आई बाढ़, भूस्खलन, भूकंप और बिजली गिरने की घटनाओं में देश के कई हिस्सों में कम से कम 148 लोगों की मौत हुई और 216 लोग घायल हुए।
अधिकारियों के अनुसार, नंगरहार में 24 लोगों की मौत और 33 लोग घायल हुए, जिनमें कई मौतें घरों के ढहने, बाढ़ के पानी और तूफान से जुड़ी थीं। करीब 1,149 घर पूरी तरह नष्ट हो गए, जबकि सड़कें, खेती की जमीन और स्थानीय ढांचा बुरी तरह प्रभावित हुआ।
7,500 से ज्यादा परिवार प्रभावित हुए, जिससे पता चलता है कि ग्रामीण और कम सुरक्षित इलाकों में मौसमी तूफान कितनी बड़ी मानवीय आपदा बन जाते हैं। कई मुख्य सड़कें भी टूट गईं, जिससे काबुल और कई प्रांतों के बीच संपर्क बाधित हो गया। कुछ इलाकों में फंसे लोगों को हेलीकॉप्टर से निकाला गया, क्योंकि बाढ़ का पानी गांवों और शहरों में तेजी से फैल गया था।
--आईएएनएस
एवाई/एबीएम
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नेपाल के प्रधानमंत्री की कूटनीति और नीति पर छिड़ी बहस, जानें क्या है मामला?
नई दिल्ली, 11 मई (आईएएनएस)। रिपोर्टों के अनुसार, नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने जानबूझकर अलग-अलग मौकों पर भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री और अमेरिका के दूत सर्जियो गोर से मिलने से इनकार किया। इसके बाद से काठमांडू में संप्रभुता, प्रोटोकॉल और बड़े साझेदारों के साथ रिश्तों पर असर को लेकर बहस शुरू हो गई है।
एक संपादकीय में द काठमांडू पोस्ट ने कहा कि प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह की विदेशी अधिकारियों से न मिलने की नीति में और अधिक बारीकी की जरूरत है।
संपादकीय में आगे कहा गया, “उन्हें हर विदेशी अधिकारी से मिलना जरूरी नहीं है, लेकिन पूरी तरह से मिलने से इनकार करना भी सही नीति नहीं हो सकती।”
यह टिप्पणी उन रिपोर्टों के संदर्भ में की गई है, जिनमें कहा गया था कि मिस्री की दो दिन की नेपाल यात्रा इसलिए टाल दी गई क्योंकि यह साफ हो गया था कि प्रधानमंत्री शाह उनसे मुलाकात नहीं करेंगे।
नेपाल के कुछ मीडिया हिस्सों में यह भी कहा गया कि प्रधानमंत्री का यह रुख उनकी उस नीति से जुड़ा है, जिसमें वे विदेशी अधिकारियों से, खासकर मंत्री स्तर से नीचे के लोगों से, एक-से-एक मुलाकात से बचते हैं। यह स्थिति लिपुलेख सीमा विवाद को लेकर बढ़े तनाव के बीच और भी चर्चा में आई है।
तिब्बत ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि बालेंद्र शाह का यह इनकार नेपाल के उस विरोध से जुड़ा है, जिसमें उसने भारत-चीन के कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग को लिपुलेख दर्रे से होकर जाने पर आपत्ति जताई है।
यह विवाद इस बात पर केंद्रित है कि नेपाल का दावा है कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा का इलाका 1816 की सुगौली संधि के तहत उसका हिस्सा है, जबकि भारत का कहना है कि यह क्षेत्र उत्तराखंड में आता है और ऐतिहासिक रूप से 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए इस्तेमाल होता रहा है।
एक ऑनलाइन रिपोर्ट में कहा गया कि बालेंद्र शाह की समान स्तर की कूटनीति एक सोची-समझी कूटनीतिक रणनीति है, जिसका मकसद बराबरी के आधार पर बातचीत करना है।
द काठमांडू पोस्ट के अनुसार, “हाल ही में भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री की नेपाल यात्रा इसी वजह से रद्द हो गई, क्योंकि प्रधानमंत्री से मिलने की उनकी कोशिशों पर कोई जवाब नहीं मिला।”
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि मिस्री भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से बालेंद्र शाह को भारत यात्रा का औपचारिक निमंत्रण देने आने वाले थे।
अखबार के अनुसार, “मिस्री और गोर दोनों मामलों में कैबिनेट के कुछ सदस्य जैसे स्वर्णिम वागले और शिशिर खनाल ने प्रधानमंत्री से अपना फैसला बदलने की सलाह दी थी, लेकिन बालेंद्र शाह अपने फैसले पर अड़े रहे।”
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि प्रधानमंत्री ने पहले एक अनौपचारिक निमंत्रण स्वीकार किया था और दोनों देशों में यात्रा की तैयारी चल रही थी, लेकिन बाद में कहा गया कि वे एक साल तक कोई भी विदेशी यात्रा नहीं करेंगे।
एक और रिपोर्ट में कहा गया कि शाह पहले अमेरिका के सहायक विदेश मंत्री समीर पॉल कपूर से भी नहीं मिले थे, जिससे उनकी नीति और स्पष्ट हो गई।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, बालेंद्र शाह ने गोर से मिलने से भी इनकार किया, हालांकि उनके कार्यालय ने इस बात की पुष्टि की। इसके बजाय गोर ने नेपाल के विदेश मंत्री और वित्त मंत्री से मुलाकात की।
काठमांडू के विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम एक नई कूटनीतिक परंपरा स्थापित करने की कोशिश है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि इससे विदेशी साझेदारों के साथ रिश्ते प्रभावित हो सकते हैं।
हालांकि, प्रधानमंत्री के प्रेस सहायक दीपक दहाल ने कहा कि प्रधानमंत्री का कार्यक्रम बहुत व्यस्त था।
--आईएएनएस
एवाई/डीकेपी
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