कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के चलते सोने-चांदी की कीमतों में आई भारी गिरावट
नई दिल्ली, 4 मई (आईएएनएस)। अमेरिका-ईरान युद्ध में जारी तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि के चलते सोमवार के सत्र में सोने और चांदी की कीमतों में भारी गिरावट देखने को मिली, और उच्च मुद्रास्फीति और ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना को लेकर बनी चिंताओं ने सुरक्षित निवेश विकल्पों के आकर्षण को कम कर दिया।
सप्ताह के पहले कारोबारी दिन सोमवार को मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर जून डिलीवरी वाले सोने का वायदा भाव 1,239 रुपए यानी 0.82 प्रतिशत गिरकर 1,50,113 रुपए प्रति 10 ग्राम हो गया। वहीं, जुलाई डिलीवरी वाली चांदी 4,863 रुपए यानी 1.94 प्रतिशत गिरकर 2,46,074 रुपए प्रति किलोग्राम हो गई।
इंडिया बुलियन एंड ज्वैलर्स एसोसिएशन (आईबीजेए) के आंकड़ों के अनुसार, 999 प्यूरिटी वाले सोने का भाव सोमवार को 1,48,100 रुपए प्रति 10 ग्राम रहा, जो पिछले गुरुवार (30 अप्रैल) के 1,50,263 रुपए से 2,163 रुपए की गिरावट को दर्शाता है। वहीं 999 प्यूरिटी वाली चांदी की कीमत सोमवार को 2,40,120 रुपए प्रति किलोग्राम रही, जो पिछले गुरुवार के 2,40,331 रुपए से 211 रुपए कम है।
वैश्विक बाजारों में भी सोने-चांदी की कीमतों पर दबाव बना रहा। भारतीय समयानुसार शाम 7.47 बजे तक कॉमेक्स पर सोने की कीमत करीब 4,569 डॉलर प्रति औंस के आसपास थी, जिसमें लगभग 1.62 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसी तरह, कॉमेक्स चांदी के भाव में करीब 3 प्रतिशत की गिरावट आई और यह लगभग 74.28 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गई।
अमेरिकी मौद्रिक नीति और भू-राजनीतिक घटनाक्रमों को लेकर अनिश्चितता के बीच निवेशकों का रुख सतर्क बना रहा। बाजार होर्मुज जलडमरूमध्य से विदेशी जहाजों को सुरक्षित निकालने की अमेरिकी योजनाओं के साथ-साथ अमेरिका-ईरान शांति वार्ता में हो रही प्रगति के संकेतों पर भी बारीकी से नजर रख रहे हैं।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से महंगाई पर दबाव बढ़ने की आशंका है, जिससे केंद्रीय बैंक ब्याज दरों को लंबे समय तक उच्च स्तर पर बनाए रखने के लिए बाध्य हो सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप, आमतौर पर सोने पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, क्योंकि इससे कोई प्रतिफल नहीं मिलता।
गौरतलब है कि अमेरिका-ईरान युद्ध की शुरुआत के बाद से सोने की कीमतों में करीब 12 प्रतिशत की गिरावट आई है।
--आईएएनएस
डीबीपी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
दक्षिण अफ्रीकी राष्ट्रपति बोले, 'दास प्रथा की क्षतिपूर्ति होनी चाहिए, सदियों तक हुई लूटपाट ने हमें कर्जदार बनाया'
जोहान्सबर्ग, 4 मई (आईएएनएस)। दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा ने अफ्रीका माह के अवसर पर दास प्रथा के लिए क्षतिपूर्ति (रिपेरेशन्स) की मांग को दोहराते हुए कहा है कि सदियों के शोषण और अफ्रीकी संसाधनों की व्यवस्थित लूट का असर आज भी महाद्वीप की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ा हुआ है।
सोमवार को अपने साप्ताहिक न्यूजलेटर में राष्ट्रपति ने कहा कि क्षतिपूर्ति केवल आर्थिक मुआवजे तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसमें प्रभावित अफ्रीकी देशों के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) में वृद्धि और बाजारों तक बेहतर पहुंच भी शामिल होनी चाहिए।
सिन्हुआ न्यूज एजेंसी के अनुसार, रामाफोसा ने प्रौद्योगिकी और कौशल हस्तांतरण के साथ-साथ सदियों पहले लूटे गए सांस्कृतिक धरोहरों की बिना शर्त वापसी की भी मांग की।
उन्होंने कहा कि क्षतिपूर्ति अफ्रीकी देशों के विकास लक्ष्यों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है और बढ़ते कर्ज के बोझ को कम करने में मदद कर सकती है। उनके अनुसार यह कर्ज बोझ भी दास प्रथा और औपनिवेशिक शोषण की ऐतिहासिक विरासत से जुड़ा हुआ है।
रामाफोसा ने कहा, “न केवल लाखों अफ्रीकियों को गुलाम बनाया गया, बल्कि औपनिवेशिक शक्तियां अफ्रीकी भूमि पर कब्जा और संसाधनों के दोहन से समृद्ध हुईं।”
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि दास प्रथा केवल लोगों की गुलामी तक सीमित नहीं था, बल्कि यह एक ऐसी व्यवस्था थी जिससे पूर्व दास मालिकों ने अमानवीय तरीकों से भारी संपत्ति अर्जित की। यह संपत्ति सांस्कृतिक वस्तुओं की लूट से भी बढ़ी, जिनमें से कई आज भी यूरोप के संग्रहालयों में प्रदर्शित हैं।
राष्ट्रपति की यह टिप्पणी मार्च में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा पारित उस प्रस्ताव के बाद आई है, जिसमें दास प्रथा को “मानवता के खिलाफ सबसे गंभीर अपराध” माना गया। इस प्रस्ताव का अधिकांश देशों ने समर्थन किया, जबकि अमेरिका, इजरायल और अर्जेंटीना ने इसका विरोध किया तथा यूरोपीय संघ के सदस्य देशों ने मतदान से परहेज किया।
रामाफोसा ने कहा, “स्लेव ट्रेड बर्बरता का सबसे चरम रूप था, जिसे यूरोपीय साम्राज्य- सहारा और उत्तर अफ्रीका के स्लेव ट्रेड नेटवर्क संग मिलकर अंतरमहाद्वीपीय दास व्यापार को अंजाम देते थे ।”
उन्होंने कहा कि एक सदी से अधिक समय तक लाखों अफ्रीकी पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को शिकार बनाकर पकड़ा गया और उन्हें इंसान नहीं, बल्कि वस्तु के रूप में खरीदा-बेचा गया।
--आईएएनएस
केआर/
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