पीएम मित्र काकतिया मेगा टेक्सटाइल पार्क से देश के टेक्सटाइल सेक्टर को मिलेगी नई रफ्तार, 10 मई को पीएम मोदी करेंगे उद्घाटन: जी. किशन रेड्डी
नई दिल्ली, 2 मई (आईएएनएस)। तेलंगाना के वारंगल स्थित पीएम मित्र मेगा टेक्सटाइल पार्क भारत के वस्त्र उद्योग को गति प्रदान करने के लिए तैयार है। वारंगल में बन रहा पीएम मित्र काकतिया मेगा टेक्सटाइल पार्क (केएमटीपी) भारत के टेक्सटाइल उद्योग को नई गति देने वाला साबित होगा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 10 मई 2026 को हैदराबाद से वर्चुअली इस मेगा टेक्सटाइल पार्क का उद्घाटन करेंगे। यह जानकारी केंद्रीय कोयला एवं खान मंत्री जी किशन रेड्डी ने शनिवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट शेयर करते हुए दी।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि यह पार्क एक विश्वस्तरीय इंटीग्रेटेड टेक्सटाइल हब के रूप में विकसित किया जा रहा है, जिससे मैन्युफैक्चरिंग, रोजगार और निर्यात को बड़ा बढ़ावा मिलेगा।
मंत्री ने आगे बताया कि काकतिया मेगा टेक्सटाइल पार्क की कुल परियोजना लागत करीब 1,695.54 करोड़ रुपए है। इस प्रोजेक्ट में 6,000 करोड़ रुपए से ज्यादा के निवेश की संभावना है, जिसमें से अब तक 3,800 करोड़ रुपए का निवेश हो चुका है।
रेड्डी ने कहा कि करीब 1,327 एकड़ में फैला यह पार्क देश के सबसे बड़े टेक्सटाइल पार्कों में से एक है। इसे पीएम मित्र (प्रधानमंत्री मेगा इंटीग्रेटेड टेक्सटाइल रीजन एंड अपैरल) योजना के तहत ब्राउनफील्ड मेगा टेक्सटाइल पार्क के रूप में चुना गया है। यह प्रधानमंत्री की 5एफ विजन—खेत से रेशा, रेशा से कारखाना, कारखाने से फैशन और फैशन से विदेश—को साकार करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
केंद्रीय मंत्री ने इस बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि इस टेक्सटाइल पार्क में 62 प्रतिशत क्षेत्र पहले ही एंकर निवेशकों को आवंटित किया जा चुका है। वहीं, पार्क के अंदर सड़क, पानी और स्ट्रीट लाइट जैसी बुनियादी सुविधाएं लगभग पूरी हो चुकी हैं।
इसके अलावा 232/132/33 केवी पावर सबस्टेशन और 220 केवी ट्रांसमिशन लाइन का काम अंतिम चरण में है। 12 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रतिदिन) जल आपूर्ति प्रणाली भी तेजी से तैयार हो रही है। पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए 5 एमएलडी सीईटीपी (कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट) का पहला चरण जीरो लिक्विड डिस्चार्ज के साथ ट्रायल रन में है।
इस प्रोजेक्ट के पूरी तरह चालू होने पर करीब 24,400 से ज्यादा रोजगार के अवसर पैदा होने की उम्मीद है, जबकि अब तक लगभग 2,000 लोगों को रोजगार मिल चुका है। इससे न केवल स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ेगा, बल्कि आसपास के क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां भी तेज होंगी।
रणनीतिक लोकेशन, प्लग-एंड-प्ले सुविधाएं और मजबूत इंटीग्रेटेड इकोसिस्टम के साथ यह पार्क भारत के टेक्सटाइल सेक्टर को नई ऊंचाइयों पर ले जाने में अहम भूमिका निभाएगा।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में केंद्र सरकार देश के औद्योगिक इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने और भारत को वैश्विक टेक्सटाइल हब बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। यह मेगा टेक्सटाइल पार्क उसी दिशा में एक बड़ा और निर्णायक कदम है।
--आईएएनएस
डीबीपी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
पृथ्वी ही नहीं अन्य ग्रहों पर भी है ज्वालामुखी, जानें कैसे बनते और क्यों है खतरनाक
नई दिल्ली, 2 मई (आईएएनएस)। ज्वालामुखी प्रकृति के सर्वाधिक शक्तिशाली और विनाशकारी स्वरूपों में से एक है। भू-वैज्ञानिक दृष्टि से, यह पृथ्वी या किसी ग्रह की सतह पर स्थित वह मुख या द्वार होता है, जिससे आंतरिक भाग में मौजूद लावा बाहर निकलता है। जब यह तप्त मैग्मा और गैसें तीव्र दबाव के साथ धरातल पर आती हैं, तो इस प्रक्रिया को ज्वालामुखी विस्फोट कहा जाता है।
यह विस्फोट कभी जोरदार होता है तो कभी शांत। ज्वालामुखी वाले क्षेत्र आमतौर पर पहाड़ का रूप ले लेते हैं। ये चट्टानों, राख और दूसरे पदार्थों की कई परतों से बनते हैं। ज्वालामुखी तीन प्रकार के होते हैं- सक्रिय, सुप्त और विलुप्त। सक्रिय ज्वालामुखी हाल ही में फटे होते हैं या जल्दी फटने की आशंका रहती है। सुप्त ज्वालामुखी अभी शांत हैं लेकिन भविष्य में फट सकते हैं। विलुप्त ज्वालामुखी फिर कभी फटने की संभावना नहीं रखते।
पृथ्वी पर ज्वालामुखी मुख्य रूप से तीन कारणों से बनते हैं। पहला कारण टेक्टोनिक प्लेट्स का आपस में अलग होना है। जब प्लेट्स दूर जाती हैं तो उनके बीच खाली जगह बनती है, जिसमें मैग्मा या जमीन के अंदर का गर्म तरल पदार्थ ऊपर आ जाता है। इससे अक्सर समुद्र के अंदर ज्वालामुखी बनते हैं। दूसरा कारण प्लेट्स का आपस में टकराना है। जब एक प्लेट दूसरी के नीचे दब जाती है तो भारी गर्मी और दबाव से चट्टानें पिघलकर मैग्मा बन जाती हैं और ऊपर की ओर बढ़ती हैं।
तीसरा कारण हॉट स्पॉट है। पृथ्वी के अंदर कुछ जगहें बहुत गर्म होती हैं। ये गर्मी मैग्मा को हल्का बनाकर ऊपर धकेलती है। जब मैग्मा पृथ्वी की सतह पर पहुंचता है तो उसे लावा कहते हैं। विस्फोट के साथ राख, गैस और पत्थर भी बाहर निकलते हैं। कभी-कभी यह इतना जोरदार होता है कि राख आसमान में बहुत ऊंचाई तक जाती है।
ज्वालामुखी सिर्फ पृथ्वी तक सीमित नहीं हैं। हमारे सौर मंडल में दूसरे ग्रहों और चंद्रमाओं पर भी ज्वालामुखी मौजूद हैं। शुक्र और मंगल ग्रह पुराने ज्वालामुखियों से भरे पड़े हैं। बृहस्पति, शनि और नेपच्यून के कुछ चंद्रमाओं पर अभी भी सक्रिय ज्वालामुखी फट रहे हैं।
अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के अंतरिक्ष यानों ने इनकी तस्वीरें भी खींची हैं। ज्वालामुखी विस्फोट बेहद खतरनाक होते हैं। ये आसपास के इलाकों को राख से ढक देते हैं, फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं और कई बार जान-माल की हानि का कारण बनते हैं। लेकिन इसके फायदे भी हैं। ज्वालामुखी की राख से मिट्टी उपजाऊ बनती है और नए भू-भाग बनते हैं। वैज्ञानिक लगातार ज्वालामुखियों पर नजर रखते हैं ताकि समय रहते खतरे की चेतावनी दी जा सके।
--आईएएनएस
एमटी/एएस
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