यूरोपियन यूनियन (ईयू) को समझने के लिए सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि इसका मूल “दांव” क्या था। दरअसल, EU ने देशों से उनकी राष्ट्रीय संप्रभुता यानी पूरी आर्थिक और राजनीतिक स्वतंत्रता का एक हिस्सा लेकर बदले में collective economic power, peace और जियोपॉलिटिकल इंफ्यूएंस देने का वादा किया। अगर कुल मिलाकर देखा जाए, तो यह दांव काफी हद तक सफल रहा है। ईयू का सबसे बड़ा लक्ष्य यूरोप में बड़े देशों के बीच दोबारा युद्ध रोकना। पूरी तरह हासिल हुआ। इसके अलावा सिंगल मार्केट (जहां goods, services, capital और people की free movement होती है) ने यूरोप को दुनिया के सबसे समृद्ध क्षेत्रों में शामिल कर दिया, जहां high living standards और strong social security systems मौजूद हैं। हालांकि, इस सफलता के साथ कुछ बड़ी कमजोरियां भी सामने आईं। खासतौर पर यूरो (single currency) को अपनाना, लेकिन उसके साथ common fiscal policy (shared tax system या treasury) का अभाव, EU की सबसे बड़ी स्ट्रक्चल कमजोरी बन गया। 2008 के फाइनेंशियल क्राइसिस के दौरान कई देशों के पास अपनी करेंसी डीवैल्यू करने का विकल्प नहीं था, जिससे कई अर्थव्यवस्थाएं लंबे समय तक stagnation में फंस गईं। इसके अलावा, EU की हेवी रेगुलेशन के कारण वह अमेरिका और चीन के मुकाबले टेक्नोलॉजी और इनोवेशन में पीछे रह गया।
संघर्ष कर रहे ये देश
इटली, ग्रीस, स्पेन, पुर्तगाल इन देशों को यूरोज़ोन संकट के दौरान सबसे ज्यादा नुकसान हुआ। अपनी मुद्रा और ब्याज दरों पर नियंत्रण न होने के कारण इन्हें कड़े खर्च कटौती उपाय (मितव्ययिता नीतियां) अपनानी पड़ीं, जिससे अर्थव्यवस्थाओं पर भारी दबाव पड़ा। ग्रीस की अर्थव्यवस्था तो लगभग 25% तक गिर गई थी, जबकि इटली आज भी धीमी आर्थिक वृद्धि और ऊंचे कर्ज से जूझ रहा है।
फ्रांस (मध्य स्थिति)
फ्रांस यूरोपीय संघ में राजनीतिक रूप से मजबूत स्थिति में है और जर्मनी के साथ मिलकर नीतियां तय करता है। लेकिन आर्थिक रूप से यह मिला-जुला प्रदर्शन दिखाता है—यहां उच्च सरकारी खर्च, बेरोजगारी और बढ़ता कर्ज जैसी समस्याएं बनी हुई हैं।
विन-विन सिचुएशन में कौन
जर्मनी और नीदरलैंड, ऑस्ट्रिया, स्वीडन, डेनमार्क
जर्मनी को यूरोपीय संघ और यूरोज़ोन का सबसे बड़ा आर्थिक लाभार्थी माना जाता है। यूरो की कीमत सभी सदस्य देशों के औसत पर आधारित होती है, जिससे यह जर्मनी के लिए अपेक्षाकृत कम आंकी गई रहती है। इसका फायदा यह होता है कि जर्मनी के निर्यात वैश्विक बाजार में सस्ते पड़ते हैं, जिससे उसे लगातार व्यापार अधिशेष मिलता है। 2004 के बाद यूरोपीय संघ में शामिल हुए इन देशों को सबसे ज्यादा फायदा संरचनात्मक फंड (विकास के लिए दी जाने वाली आर्थिक सहायता) से मिला। इन पैसों से बुनियादी ढांचे का विकास हुआ और अर्थव्यवस्थाएं तेजी से बढ़ीं। पोलैंड इसका बड़ा उदाहरण है, जहां आर्थिक वृद्धि दर तेजी से पश्चिमी यूरोप के करीब पहुंची।
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इंग्लिश में NATO और हिंदी में नॉटो बोले या फिर नाटो भी कह सकते हैं। लेकिन इसका फुल फॉर्म जरूर याद कर लीजिए शायद किसी परीक्षा में पूछ लिया जाए। नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन हिंदी में कहे तो उत्तरी अटलांटिक सन्धि संगठन। क्या है नाटो जिससे रूस को इतनी नफरत है। कहानी की शुरुआत इतिहास से करते हैं। साल 1945 की बात है दूसरा विश्व युद्ध खत्म हो चुका था। सोवियत संघ और अमेरिकी दुनिया की दो महाशक्तियों के बीच प्रभुत्व की लड़ाई जिसके बारे में आपने पढ़ा भी होगा और हम भी आपको कई दफा बता चुके हैं। फुल्टन भाषण व टू्रमैन सिद्धांत के तहत जब साम्यवादी प्रसार को रोकने की बात कही गई तो प्रत्युत्तर में सोवियत संघ ने अंतर्राष्ट्रीय संधियों का उल्लंघन कर 1948 में बर्लिन की नाकेबंदी करते हुए और स्टालिन की रेड आर्मी ने बर्लिन में झंडा फहरा दिया था। अमेरिका को डर लगा कि स्टालिन के साम्यवाद की ये लहर ऐसी ही चली तो ये पश्चिमी यूरोप में भी पहुंच जाएगी। 1948 में बर्लिन की नाकेबंदी की घटना ने अमेरिका के डर को और भी पुख्ता कर दिया। उसे लगा कि सोवियत संघ से निपटने के लिए एकजुट होने का वक्त आ गया है। इसी क्रम में यह विचार किया जाने लगा कि एक ऐसा संगठन बनाया जाए जिसकी संयुक्त सेनाएं अपने सदस्य देशों की रक्षा कर सके। 4 अप्रैल 1949 को ब्रिटेन, फ्रांस, बेल्जियम, नीदरलैण्ड तथा लक्सेमबर्ग ने बूसेल्स की संधि पर हस्ताक्षर किए। इसका उद्देश्य सामूहिक सैनिक सहायता व सामाजिक-आर्थिक सहयोग था। ये पूंजीवादी देशों की सोवियत विस्तार को चुनौती देने के लिए बना सैन्य संगठन था। इन देशों ने एक दूसरे को एक वादा किया है। कैसा वादा- एक दूसरे को खतरे की स्थिति में सहायता देने का वादा यानी सामूहिक सुरक्षा का वादा। किसी एक देश पर हमला तो माना जाएगा सबके सब देशों पर हमला।
उत्तर अटलांटिक संधि पर 12 देशों ने हस्ताक्षर किए
संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर के अनुच्छेद 15 में क्षेत्रीय संगठनों के प्रावधानों के अधीन उत्तर अटलांटिक संधि पर 12 देशों ने हस्ताक्षर किए थे। ये देश थे- फ्रांस, बेल्जियम, लक्जमर्ग, ब्रिटेन, नीदरलैंड, कनाडा, डेनमार्क, आइसलैण्ड, इटली, नार्वे, पुर्तगाल और संयुक्त राज्य अमेरिका। शीत युद्ध की समाप्ति से पूर्व यूनान, टर्की, पश्चिम जर्मनी, स्पेन भी सदस्य बने और शीत युद्ध के बाद भी नाटों की सदस्य संख्या का विस्तार हो रहा। इस गुट में अमेरिका सबसे ताकतवर था इसलिए उसे इसका मुखिया मान लिया गया। 18 फरवरी 1952 और 6 मई 1955 के बीच तीन और देशों को नाटो में शामिल किया गया। इनमें पश्चिम जर्मनी भी शामिल था। इससे सोवियत यूनियन की चिंता और बढ़ी, क्योंकि पूर्वी जर्मनी सोवियत समर्थक था।
नाटो के 30 सदस्य देशों की सूची:
अलबानिया, बेल्जियम, बुल्गारिया, कनाडा, क्रोएशिया, चेक गणराज्य, डेनमार्क, एस्तोनिया, फ़्रान्स, जर्मनी, यूनान, हंगरी, आइसलैण्ड, इटली, लातविया, लिथुआनिया, लक्ज़मबर्ग, नीदरलैंड, नॉर्वे, पोलैंड, पुर्तगाल, रोमानिया, स्लोवाकिया, स्लोवेनिया, स्पेन, तुर्की, यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त राज्य अमेरिका, मॉन्टिनीग्रो
नाटो और रूस की ताकत
आंकड़ों से पता चलता है कि रूस की सेना अमेरिका के बाद दूसरी बड़ी सेना है। सशस्त्र बलों के आंकड़े बताते हैं कि देश में लगभग 1,154,000 सक्रिय सैनिक हैं। सेना को रिजर्व में रखे गए लगभग 250,000 और सैनिकों का समर्थन प्राप्त है। रूस के पास लगभग 6,400 वॉरहेड की आपूर्ति के साथ, परमाणु हथियारों का दुनिया का सबसे विशाल संग्रह है। नाटो सदस्यों के पास लगभग 1,346,400 कर्मियों की सेना है। उनमें से मोटे तौर पर 165000 सैनिक तैनात हैं, जबकि 799,500 रिजर्व सैनिक हैं। नाटो 30 देशों का एक ग्रुप है। लेकिन जो सैनिक सक्रिय हैं, वही युद्ध की स्थिति में सबसे पहले उतारे जाएंगे।
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