हफ्तों तक चले धुआंधार प्रचार, रैलियों और वार-पलटवार के बाद आज भारत के दो महत्वपूर्ण राज्यों—पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु—में भविष्य की दिशा तय करने के लिए मतदान हो रहा है। जहाँ बंगाल में सत्ता की चाबी पाने के लिए भाजपा और तृणमूल के बीच 'आर-पार' की जंग है, वहीं तमिलनाडु में दशकों पुराने द्रविड़ वर्चस्व को चुनौती देने के लिए एक नया 'सुपरस्टार' मैदान में है। पश्चिम बंगाल की 294 सीटों में से 152 सीटों पर पहले चरण का मतदान सुबह 7 बजे शुरू हुआ, जहाँ सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस का सीधा मुकाबला BJP से है। तमिलनाडु में, सभी 234 सीटों पर एक ही दिन में मतदान हो रहा है, जहाँ सत्ताधारी DMK, AIADMK-BJP के नेतृत्व वाले NDA और विजय की TVK के बीच त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिल रहा है।
पश्चिम बंगाल के कई मतदान केंद्रों पर वोटिंग शुरू होने के शुरुआती घंटों में ही लंबी कतारें देखने को मिलीं, क्योंकि पहले चरण में लगभग 3.6 करोड़ मतदाता अपने वोट डालने के लिए तैयार हैं। तमिलनाडु में भी मतदाताओं का अच्छा रुझान देखने को मिल रहा है, जहाँ लगभग 5.67 करोड़ योग्य मतदाता हैं। दोनों राज्यों में मतदाताओं की भारी भागीदारी की उम्मीद है।
बंगाल में, मुकाबला ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) और BJP के बीच सीधा और ज़ोरदार है; BJP की चुनावी मुहिम का नेतृत्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने किया।
BJP ने एक आक्रामक और राष्ट्रवादी चुनावी मुहिम चलाई है, जिसमें हिंदुत्व के संदेश को भ्रष्टाचार, बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ और शासन की विफलताओं के आरोपों के साथ मिलाया गया है।
हालाँकि, TMC को राज्य में विवादास्पद 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न' (SIR) को लेकर BJP पर हमला बोलने के बाद थोड़ी बढ़त मिली है। उसने BJP पर भारत निर्वाचन आयोग के साथ मिलीभगत करने का आरोप लगाया और इस लड़ाई को अदालतों तक भी ले गई। बंगाल की मतदाता सूचियों से 91 लाख से ज़्यादा नाम हटा दिए गए, और दो चरणों में होने वाले इन चुनावों में लगभग 62 लाख मतदाताओं का भविष्य अधर में लटका हुआ है।
ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी 'लक्ष्मी भंडार' जैसी कल्याणकारी योजनाओं पर भी बहुत ज़्यादा भरोसा कर रही है। इसके साथ ही, वह बंगाली पहचान पर केंद्रित एक चुनावी मुहिम भी चला रही है, जिसमें वह खुद को BJP की शाकाहारी सोच के मुकाबले बंगाल की मांसाहारी संस्कृति के रक्षक के तौर पर पेश कर रही है।
दोनों ही पार्टियों ने बड़े पैमाने पर महिलाओं से संपर्क साधा है। BJP ने महिलाओं को हर महीने 3,000 रुपये का भत्ता देने का वादा किया है, जो TMC के 2,000 रुपये के वादे से ज़्यादा है। राज्य में महिला मतदाताओं की संख्या अब 3.76 करोड़ से ज़्यादा हो गई है, जो पिछले लोकसभा चुनावों के मुकाबले बढ़ी है। इस बीच, एक फिर से मज़बूत हो रहा लेफ्ट फ्रंट वापसी की कोशिश कर रहा है, खासकर उत्तरी बंगाल और जंगल महल में। कुल 252 सीटों पर चुनाव लड़ते हुए, यह चाय बागान वाले इलाकों और युवा वोटरों पर ध्यान दे रहा है। ये इलाके कूच बिहार, अलीपुरद्वार, कलिम्पोंग और जलपाईगुड़ी जैसे ज़िलों में हैं, जहाँ हाल के सालों में BJP ने अपनी पकड़ मज़बूत की है।
जिन अहम चुनावी लड़ाइयों पर सबकी नज़र रहेगी, उनमें नंदीग्राम सबसे ऊपर है। यहाँ शुभेंदु अधिकारी उस प्रतिष्ठित सीट को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे उन्होंने 2021 में ममता बनर्जी को हराकर जीता था। बहरामपुर में, कांग्रेस के दिग्गज नेता अधीर रंजन चौधरी दशकों बाद विधानसभा की राजनीति में वापसी कर रहे हैं। माथाभांगा में, BJP के निशीथ प्रमाणिक पार्टी के जनाधार को और मज़बूत करने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं।
तमिलनाडु में मुकाबला ज़्यादा पेचीदा और त्रिकोणीय है। यहाँ की पुरानी द्रविड़ पार्टियाँ—सत्ताधारी DMK (जिसका नेतृत्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन कर रहे हैं) और AIADMK (जिसका नेतृत्व एडप्पादी के. पलानीस्वामी कर रहे हैं)—एक नए प्रतिद्वंद्वी का सामना कर रही हैं। यह नया प्रतिद्वंद्वी अभिनेता-राजनेता विजय की पार्टी TVK है।
DMK ने इस चुनाव को अपने शासन, जन-कल्याणकारी कार्यों और संघीय अधिकारों पर एक जनमत-संग्रह के तौर पर पेश किया है। वहीं, AIADMK राजनीतिक वापसी की कोशिश में जुटी है; पार्टी ने अंदरूनी उथल-पुथल और BJP के साथ गठबंधन में आए बदलावों के बाद अपनी रणनीति को नए सिरे से तैयार किया है। बेहद लोकप्रिय स्टार विजय के नेतृत्व वाली TVK ने युवा और शहरी वोटरों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। यह पार्टी खुद को तमिलनाडु की पुरानी और स्थापित द्रविड़ राजनीति के एक विकल्प के तौर पर पेश कर रही है।
जिन अहम विधानसभा सीटों पर सबकी नज़र रहेगी, उनमें कोलाथुर शामिल है—जहाँ एम.के. स्टालिन दोबारा चुनाव लड़ रहे हैं—और चेपॉक-तिरुवल्लिकेनी, जहाँ से उनके बेटे उदयनिधि स्टालिन चुनाव लड़ रहे हैं। विजय दो सीटों—तिरुचिरापल्ली पूर्व और पेरम्बूर—से अपने चुनावी सफर की शुरुआत करेंगे। EPS अपने गृह क्षेत्र एडप्पादी से चुनाव लड़ रहे हैं। उनके कट्टर प्रतिद्वंद्वी ओ. पन्नीरसेल्वम—जिन्होंने चुनाव से ठीक पहले AIADMK छोड़कर DMK का दामन थाम लिया था—बोदिनायक्कनूर से चुनाव लड़ेंगे।
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पश्चिम एशिया में लगातार बढ़ते तनाव के बीच अब भारत की भूमिका को लेकर भी नई चर्चा शुरू हो गई है। जिस समय अमेरिका और ईरान के बीच टकराव कम होने के बजाय और जटिल होता दिखाई दे रहा है। उसी बीच जर्मनी से भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का एक अहम बयान सामने आया है। रक्षा मंत्री ने साफ शब्दों में कहा है कि फिलहाल भारत सीधे तौर पर मध्यस्थता की भूमिका में नहीं है। लेकिन आने वाले समय में परिस्थितियां बदल सकती हैं। तो भारत इस दिशा में अपनी भूमिका निभा सकता है। उनके इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भारत की संभवित भूमिका को लेकर नई बहस छेड़ दी है। जर्मनी में बातचीत के दौरान राजनाथ सिंह ने कहा है कि भारत ने अपनी ओर से शांति की कोशिशें पहले भी की है। उन्होंने बताया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोनों पक्षों से युद्ध समाप्त करने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की है।
उन्होंने आगे कहा कि हर अंतरराष्ट्रीय संकट में हस्तक्षेप का एक सही समय होता है और फिलहाल भारत स्थिति पर नजर बनाए हुए है। उनका यह भी कहना है कि संभव है कि भविष्य में ऐसा समय आए जब भारत को सक्रिय भूमिका निभानी पड़े और भारत उस भूमिका में सफल भी हो सकता है। रक्षा मंत्री का यह बयान ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत कराने की कोशिशें अपेक्षित नतीजे नहीं दे सकी। पाकिस्तान ने दोनों देशों के बीच संवाद की कोशिश जरूर की, लेकिन अभी तक कोई ठोस समाधान सामने नहीं आया। ऐसे में अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या भारत एक ऐसे देश के रूप में सामने आ सकता है जिस पर दोनों पक्ष भरोसा कर सके। राजनाथ सिंह ने यह भी स्पष्ट किया है कि भारत का रुख शुरू से संतुलित रहा है। उन्होंने आगे कहा कि भारत किसी एक पक्ष के साथ खड़े होने के बजाय हमेशा शांति, संवाद और स्थिति की बात करता है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति का आधार टकराव नहीं बल्कि बातचीत है और भारत यही चाहता है कि युद्ध जल्द समाप्त हो और क्षेत्र में स्थाई शांति स्थापित हो सके। रक्षा मंत्री ने हॉर्मोज स्ट्रेट की स्थिति पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से पूरा होता है और ऐसे में उस क्षेत्र में पैदा होने वाला कोई भी संकट भारत पर सीधा असर डाल सकता है। उन्होंने आगे कहा आज दुनिया इतनी जुड़ी हुई है कि किसी भी क्षेत्रीय संकट को सिर्फ उसी इलाके तक सीमित नहीं माना जा सकता। पश्चिम एशिया का तनाव सिर्फ एक तेल की कमियां तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि इसका असर वैश्विक आर्थिक स्थिति, खाद्य सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ सकता है।
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