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विपक्ष की एकजुटता ने बिगाड़ा 'नंबर गेम': 20 घंटे की महा-बहस के बाद 54 वोटों से लोकसभा में गिरा 'महिला आरक्षण संशोधन बिल'
भारतीय राजनीति में 17 अप्रैल का दिन एक बड़े उलटफेर का गवाह बना। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 'अंतरात्मा की आवाज' पर वोट करने की भावुक अपील और करीब 20 घंटे की मैराथन चर्चा के बावजूद, मोदी सरकार लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़ा 131वां संविधान संशोधन विधेयक पास कराने में विफल रही।
दो-तिहाई बहुमत का जादुई आंकड़ा न जुटा पाने के कारण यह बिल 54 वोटों के अंतर से गिर गया। बिल गिरने के साथ ही सदन में विपक्ष ने जोरदार नारेबाजी की, जिसे गृह मंत्री अमित शाह ने 'निंदनीय' करार दिया है।
संविधान संशोधन बिल को पारित कराने के लिए सदन में मौजूद सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता थी, जिसे जुटाने में सरकार नाकाम रही:
जरूरी आंकड़ा: बिल पास कराने के लिए सरकार को 352 वोटों की जरूरत थी।
पक्ष में वोट: सरकार के पक्ष में केवल 298 वोट ही पड़े।
विपक्ष में वोट: कुल 230 सांसदों ने बिल के खिलाफ मतदान किया।
हार का अंतर: सरकार निर्धारित लक्ष्य से 54 वोट पीछे रह गई, जिसके चलते विधेयक को निरस्त घोषित कर दिया गया।
वोटिंग से ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर पोस्ट कर सांसदों से अपील की थी कि वे राजनीति से ऊपर उठकर अपनी "अंतरात्मा की आवाज" पर इस ऐतिहासिक बदलाव के लिए वोट करें।
पीएम ने विपक्ष को 'क्रेडिट का ब्लैंक चेक' देने तक का वादा किया था, लेकिन विपक्ष की एकजुटता के आगे यह अपील बेअसर साबित हुई। विपक्षी दलों ने परिसीमन के मुद्दे को आधार बनाकर बिल का कड़ा विरोध किया।
बिल गिरने के बाद सदन से लेकर सोशल मीडिया तक घमासान शुरू हो गया है।
गृह मंत्री अमित शाह ने इसके लिए सीधे तौर पर कांग्रेस, टीएमसी और अन्य विपक्षी दलों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि बिल गिरने पर विपक्ष का जश्न मनाना उनके महिला विरोधी चेहरे को दर्शाता है।
बिल गिरने के तुरंत बाद बीजेपी की महिला सांसदों ने संसद के 'मकर द्वार' पर विरोध प्रदर्शन किया। पार्टी ने अब इस मुद्दे को लेकर 18 अप्रैल से देशव्यापी विरोध प्रदर्शन का बड़ा ऐलान कर दिया है।
विपक्षी सांसदों ने चर्चा के दौरान स्पष्ट किया कि वे महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि सरकार द्वारा इसे 'परिसीमन' से जोड़ने के विरोध में हैं।
विपक्ष का आरोप है कि 850 सीटों वाली नई लोकसभा का खाका खींचकर सरकार दक्षिण भारत के राज्यों की राजनीतिक ताकत को कम करना चाहती है। इसी 'परिसीमन कार्ड' ने विपक्षी दलों को एक मंच पर ला खड़ा किया, जिसका नतीजा बिल के गिरने के रूप में सामने आया।
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