इस साल मानसून में 6% कम बारिश संभव:जून सामान्य, अगस्त से ज्यादा कमी; MP, पंजाब, हरियाणा-राजस्थान में सामान्य से कम बारिश की संभावना
इस साल मानसून की बारिश सामान्य से कम रह सकती है। निजी मौसम एजेंसी स्काईमेट वेदर ने इस साल के मानसून का पूर्वानुमान जारी किया है। इसके अनुसार, बारिश सामान्य से 6% कम रह सकती है। जून से सितंबर तक मानसून के 4 महीनों में देश में बारिश का सामान्य औसत 868.6 mm है। सामान्य से कम मानसून का मतलब है कि बारिश 90% से 95% के बीच रहेगी। एजेंसी ने 94% बारिश का अनुमान दिया है। जून में सामान्य बारिश होगी, लेकिन जुलाई से गिरावट शुरू होकर अगस्त और सितंबर में मानसून कमजोर पड़ेगा। खासकर अगस्त-सितंबर में बारिश की कमी ज्यादा रहने के संकेत हैं। मध्य और पश्चिम भारत के मुख्य क्षेत्रों में बारिश कम रहने के आसार हैं। अगस्त-सितंबर में मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में सामान्य से कम बारिश की आशंका है। जुलाई से बारिश में कमी होने का अनुमान क्या होता है लॉन्ग पीरियड एवरेज यानी LPA इसका मतलब है कि मौसम विभाग ने 1971-2020 की अवधि के आधार पर दक्षिण-पश्चिम मानसून के लिए लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) को 87 सेमी (870 मिमी) निर्धारित किया है। अगर किसी साल की बारिश 87 सेमी से ज्यादा होती है, तो उसे सामान्य से अधिक माना जाता है। अगर कम हो तो कमजोर मानसून माना जाता है। मानसून की शुरुआत के समय अल-नीनो बनने की संभावना स्काईमेट वेदर से जुड़े जतिन सिंह ने कहा कि मानसून की शुरुआत के समय अल-नीनो बनने की संभावना है। इससे मानसून कमजोर पड़ सकता है। हिंद महासागर द्विध्रुव (आईओडी) मजबूत हो तो अल-नीनो का असर कुछ कम होता है। अभी आईओडी सामान्य या थोड़ा अधिक रहने की उम्मीद है। इससे मानसून की शुरुआत ठीक होगी, लेकिन सीजन के दूसरे हिस्से में बारिश कमजोर पड़ने का खतरा रहेगा। अल नीनो और ला नीना क्लाइमेट (जलवायु) के दो पैटर्न होते हैं- अल नीनो: इसमें समुद्र का तापमान 3 से 4 डिग्री बढ़ जाता है। इसका प्रभाव 10 साल में दो बार होता है। इसके प्रभाव से ज्यादा बारिश वाले क्षेत्र में कम और कम बारिश वाले क्षेत्र में ज्यादा बारिश होती है। ला नीना: इसमें समुद्र का पानी तेजी से ठंडा होता है। इसका दुनियाभर के मौसम पर असर पड़ता है। आसमान में बादल छाते हैं और अच्छी बारिश होती है। साल 2025: तय समय से 8 दिन पहले केरल पहुंचा था मानसून पिछले साल दक्षिण-पश्चिम मानसून तय समय से 8 दिन पहले 24 मई को केरल पहुंचा था। ऐसा 16 साल बाद हुआ था। 2009 में 23 मई को केरल पहुंचा था। मुंबई में बारिश लाने वाला सिस्टम 16 दिन पहले ही एक्टिव हो गया था जो 1950 के बाद से सबसे जल्दी था। आमतौर पर दक्षिण-पश्चिम मानसून 1 जून तक केरल पहुंचता है। 11 जून तक मुंबई और 8 जुलाई तक पूरे देश में फैल जाता है। इसकी वापसी उत्तर-पश्चिम भारत से 17 सितंबर को शुरू होती है और यह पूरी तरह 15 अक्टूबर तक लौट जाता है। भारत में पिछले साल मानसून जल्दी पहुंचने की मुख्य वजह अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में बढ़ी हुई नमी थी। समुद्र का तापमान सामान्य से ज्यादा रहा, जिससे मानसूनी हवाएं तेजी से सक्रिय हुईं थीं। पश्चिमी हवाओं और चक्रवातों की हलचल ने भी मानसून को आगे बढ़ने में मदद की थी। इसके अलावा जलवायु परिवर्तन भी मौसम के पैटर्न में बदलाव की एक बड़ी वजह बना था।
दिवाली से पहले एमपी में यूसीसी लागू करने की तैयारी:सीएम ने कैबिनेट बैठक में दिए संकेत; गोवा-उत्तराखंड मॉडल की स्टडी करेंगे
डॉ. मोहन यादव सरकार मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने की तैयारी कर रही है। मंगलवार को कैबिनेट बैठक में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मंत्रियों से कहा कि यूसीसी का अध्ययन करें, इसे राज्य में लागू करना है। इस संकेत के बाद गृह विभाग में प्रक्रिया तेज हो गई है, क्योंकि यूसीसी बिल तैयार करने की जिम्मेदारी इसी विभाग की है। सूत्रों के अनुसार, जल्द ही राज्य स्तर पर एक उच्चस्तरीय कमेटी बनाई जाएगी। इसी साल दिवाली से पहले प्रदेश में यूसीसी लागू किया जा सकता है। सूत्र बताते हैं कि समान नागरिक संहिता का ड्राफ्ट तैयार करने से पहले गोवा और उत्तराखंड में कुछ समय पहले लागू किए गए यूसीसी का अध्ययन किया जा रहा है। जिससे मध्य प्रदेश के लिए व्यावहारिक और संतुलित मॉडल तैयार किया जा सके। ड्राफ्ट तैयार होते ही इसे कैबिनेट में पेश किया जाएगा। सरकार इसे राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से संवेदनशील मानते हुए सही समय पर कैबिनेट में लाने की रणनीति बना रही है। राज्य स्तरीय कमेटी बनने के बाद आगे की प्रक्रिया और ड्राफ्ट को कैबिनेट में पेश करने की टाइमलाइन तय की जाएगी। यूसीसी लागू करने में सामाजिक संतुलन चुनौती जानकारों का कहना है कि एमपी में अलग प्रकार की सामाजिक व्यवस्था है, इसमें आदिवासी समुदायों की परंपराएं भी शामिल हैं। यही यूसीसी को लागू कराने में बड़ी चुनौती बन सकती हैं। 230 विधानसभा सीटों वाले एमपी में 47 सीटें अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित हैं। ऐसे में सरकार हर वर्ग को ध्यान में रखकर आगे बढ़ना चाहती है। यूसीसी वाले राज्यों के मॉडल भी समझ लीजिए देश में उत्तराखंड पहला राज्य है, जहां यूसीसी लागू किया गया। उत्तराखंड में फरवरी 2024 में बिल पास हुआ और 27 जनवरी 2025 से कानून लागू हुआ। वहां शादी और तलाक का पंजीयन कराना जरूरी हो गया है। लिव इन रिलेशनशिप का भी 30 दिन में रजिस्ट्रेशन जरूरी है। नियमों का पालन न करने पर तीन महीने की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। गुजरात में मार्च 2026 में बिल पास हुआ, जल्द ही लागू हो जाएगा। इसके बाद पैतृक संपत्ति में बेटा, बेटी को बराबरी का हक मिलेगा। हालांकि, एसटी वर्ग को इस कानून से बाहर रखा गया है। धोखा देकर, दबाव डालकर या पहचान छिपाकर शादी करना अपराध हो जाएगा। ऐसा करने पर 7 साल तक की जेल हो सकती है। 60 दिन में लिव इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी होगा। असम में बहुविवाह को अपराध माना गया है। छठीं अनुसूची क्षेत्र और एसटी वर्ग कानून से बाहर रखे गए हैं। हालांकि, यहां यूसीसी कानून पूरी तरह से लागू नहीं हो पाया है। यूसीसी लागू हुआ तो ये बदलाव हो सकते हैं यदि कैबिनेट से मंजूरी मिलती है और आगे की प्रक्रिया पूरी होती है, तो सभी धर्मों के लिए विवाह और तलाक के समान नियम लागू हो सकते हैं। बहुविवाह पर रोक लग सकती है। महिलाओं को समान अधिकार मिल सकते हैं। संपत्ति और उत्तराधिकार में एकरूपता जैसे बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। जानिए, यूसीसी लागू होने पर क्या-क्या बदलेगा… यूसीसी लागू होने पर मूल बदलाव क्या होगा? सभी धर्मों के लिए शादी, तलाक, विरासत और गोद लेने के नियम एक समान हो जाएंगे। अलग-अलग पर्सनल लॉ खत्म हो जाएंगे। शादी और तलाक के नियम कैसे बदलेंगे? अभी हर धर्म के अपने नियम हैं। यूसीसी के बाद विवाह पंजीकरण अनिवार्य होगा। न्यूनतम आयु समान होगी, तलाक के कानूनी आधार सभी के लिए एक होंगे। बहुविवाह और विरासत के नियमों पर क्या असर पड़ेगा? कई पर्सनल लॉ में एक से अधिक विवाह की अनुमति या गुंजाइश है। यूसीसी लागू होते ही यह पूरी तरह प्रतिबंधित हो जाएगा। बेटियों को पिता की संपत्ति में बेटों के बराबर अधिकार मिलेगा। यह नियम सभी धर्मों पर समान लागू होगा। एमपी में यूसीसी लागू करने में सबसे बड़ी चुनौती क्या मानी जा रही है? मध्य प्रदेश में बड़ी संख्या में जनजातीय और विशेष पिछड़ी जनजातियां हैं, जहां पारंपरिक विवाह पद्धतियां प्रचलित हैं। इन परंपराओं को यूसीसी में शामिल करना या अलग प्रावधान चुनौती होगी। जैसे- दापा प्रथा में वधु मूल्य देना। भगेली/लम्सना विवाह में युवक-युवती भागकर शादी करते हैं, बाद में समाज मान्यता देता है। सेवा विवाह में वधु मूल्य न देने पर लड़का ससुराल में रहकर सेवा करता है। नातरा प्रथा में विधवा पुनर्विवाह या साथी बदलने की अनुमति है। ये खबर भी पढ़ें… सुप्रीम कोर्ट बोला- UCC लागू करने का समय आ गया सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने का समय आ गया है। इस पर फैसला करना कोर्ट के बजाय संसद का काम है। कोर्ट शरियत कानून 1937 की कुछ धाराओं को रद्द करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा था। इन धाराओं से मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव का आरोप था। पढ़ें पूरी खबर…
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