CEC के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव खारिज, 193 सांसदों ने किए थे हस्ताक्षर
CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को लेकर विपक्ष की ओर से लाया जाने वाला महाभियोग का प्रस्ताव खारिज हो गया है. राज्यसभा स्पीकर ने प्रस्ताव को खारिज किया है. स्पीकर ने प्रस्ताव अस्वीकार करने से पहले प्रस्ताव के सभी पहलुओं का निष्पक्ष रूप से मूल्यांकन किया और फिर न्यायाधीश (जांच) अधिनियम की शक्ति का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने प्रस्ताव को खारिज कर दिया. प्रस्ताव पर 193 सांसदों ने हस्ताक्षर किए थे.
राज्यसभा में पेश किए गए प्रस्ताव पर 12 मार्च को राज्यसभा के सभापति ने गंभीर विचार-विमर्श किया. उन्होंने सभी प्रांसगिक पहलुओं और मुद्दों की निष्पक्षता से जांच की. इसके बाद, न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की धारा 3 के तहत उन्होंने प्रस्ताव को स्वीकार करने से इनकार कर दिया.
वैश्विक प्रयास धीमे, नवजात मृत्युदर चिंता का विषय: यूएन रिपोर्ट
नई दिल्ली, 6 अप्रैल (आईएएनएस)। संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की एक हालिया रिपोर्ट नवजात मृत्युदर की दुखद तस्वीर पेश करती है। ये कहती है कि नवजात मौतों को कम करने की वैश्विक मुहिम अब धीमी पड़ती जा रही है, जिससे लाखों बच्चों की जान पर खतरा बना हुआ है। यह रिपोर्ट 17 मार्च 2026 को जारी की गई।
रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में करीब 23 लाख नवजातों की मौत हुई (एक अनुमान के अनुसार स्थिति अब भी बदली नहीं है)। ये वे बच्चे हैं जो मात्र 28 दिन या उससे कम के होते हैं। पिछले दो दशकों में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मौतों में कमी आई थी, लेकिन नवजातों के मामले में यह गिरावट उतनी तेज नहीं रही। यही वजह है कि अब कुल बाल मृत्यु दर में नवजातों की हिस्सेदारी बढ़ती जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि नवजात मृत्यु दर को कम करना एक जटिल चुनौती है, क्योंकि इसमें स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता, समय पर देखभाल और संसाधनों की उपलब्धता जैसे कई कारक शामिल होते हैं। खासकर निम्न और मध्यम आय वाले देशों में स्थिति ज्यादा गंभीर है, जहां स्वास्थ्य ढांचा पहले से ही कमजोर है।
अफ्रीकी देशों में हालात सबसे ज्यादा चिंताजनक हैं, जहां हर साल लगभग 11 लाख नवजात अपनी जान गंवा देते हैं। मौतों के पीछे प्रमुख कारणों में समय से पहले जन्म, प्रसव संबंधी जटिलताएं और संक्रमण शामिल हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इनमें से बड़ी संख्या में मौत रोकी जा सकती है, अगर गर्भावस्था और जन्म के समय उचित देखभाल सुनिश्चित की जाए।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय फंडिंग में कमी आई है। साथ ही कई देशों में राजनीतिक प्राथमिकताओं में बदलाव के चलते मातृ और शिशु स्वास्थ्य को उतना महत्व नहीं मिल पा रहा है। कोविड-19 महामारी और वैश्विक आर्थिक दबाव ने भी स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त असर डाला, जिससे प्रगति और धीमी हो गई।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, नवजातों की जान बचाने के लिए बड़े और जटिल उपायों की जरूरत नहीं है, बल्कि बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना ही सबसे प्रभावी कदम हो सकता है। इसमें प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की मौजूदगी में सुरक्षित प्रसव, जन्म के तुरंत बाद शिशु की देखभाल और संक्रमण से बचाव के उपाय शामिल हैं।
रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि अगर सरकारें और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं इस दिशा में तुरंत ठोस कदम नहीं उठातीं, तो 2030 तक शिशु मृत्यु दर घटाने के वैश्विक लक्ष्य हासिल करना मुश्किल हो सकता है।
--आईएएनएस
केआर/
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