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डीएचएस कर्मचारियों के समर्थन में उतरे मार्कवेन मुलिन, बोले- 30 दिन बिना वेतन काम करना समर्पण की मिसाल

वाशिंगटन, 25 मार्च (आईएएनएस)। अमेरिका में फंडिंग को लेकर जारी राजनीतिक गतिरोध के बीच नए होमलैंड सिक्योरिटी सचिव मार्कवेन मुलिन ने विभाग के कर्मचारियों का खुलकर समर्थन किया। उन्होंने कहा कि बिना वेतन 30 दिनों तक काम करने वाले डीएचएस (डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी) के कर्मचारियों ने अपनी प्रतिबद्धता साबित कर दी है, और वे खुद 365 दिन उनके साथ खड़े रहेंगे।

मार्कवेन मुलिन ने ये बयान उस समय दिया जब उन्होंने ओवल ऑफिस में अटॉर्नी जनरल पाम बॉन्डी के सामने शपथ लेकर पदभार संभाला। ऐसे समय में उन्होंने जिम्मेदारी ली है, जब अमेरिकी कांग्रेस में फंडिंग को लेकर राजनीतिक टकराव जारी है।

डीएचएस सचिव मुलिन ने कर्मचारियों से मुलाकात का जिक्र करते हुए कहा, मुझे डीएचएस के कई कर्मचारियों से मिलने का मौका मिला। ये लोग पिछले 30 दिनों से बिना वेतन के काम कर रहे हैं।

उन्होंने इसे देश की सुरक्षा के प्रति उनकी गहरी निष्ठा का प्रतीक बताते हुए कहा, अगर आपको उनकी प्रतिबद्धता समझनी है, तो देखिए कि वे बिना वेतन के भी देश की सुरक्षा में जुटे हैं। ये सिर्फ राजनीति की वजह से हो रहा है।

उन्होंने कर्मचारियों को भरोसा दिलाते हुए कहा, आप 365 दिन लड़ रहे हैं, तो समझिए मैं भी 365 दिन आपके साथ खड़ा हूं।

अपने काम करने के तरीके पर मार्कवेन मुलिन ने साफ कहा, कोई भी मुझसे ज्यादा मेहनत नहीं करेगा, और मैं किसी को खुद से आगे नहीं निकलने दूंगा। राष्ट्रपति ने मुझे यह जिम्मेदारी दी है, और असफलता कोई विकल्प नहीं है।

डीएचएस सचिव मुलिन ने यह भी स्पष्ट किया कि उनका काम पूरी तरह गैर-राजनीतिक रहेगा। उन्होंने कहा, मुझे फर्क नहीं पड़ता कि आपका राज्य रेड है या ब्लू। मेरा काम है हर अमेरिकी की बराबर सुरक्षा करना।

इस मौके पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मुलिन की तारीफ करते हुए उन्हें महान देशभक्त बताया और कहा कि वे मजबूती और निष्पक्षता के साथ विभाग का नेतृत्व करेंगे।

राष्ट्रपति ट्रंप ने इस दौरान डेमोक्रेट्स पर भी निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस में फंडिंग रोकने की वजह से डीएचएस बंद हो गया है। ट्रंप ने इस विवाद को इमिग्रेशन नीति से जोड़ते हुए कहा कि डेमोक्रेट्स अवैध आप्रवासी अपराधियों और गैंग सदस्यों को बचाने की कोशिश कर रहे हैं।

राष्ट्रपति ने कहा कि प्रशासन ऐसे लोगों को देश से बाहर करने के अपने अभियान को जारी रखेगा। उन्होंने कहा, जिस भी अवैध प्रवासी का आपराधिक रिकॉर्ड है, उसे तुरंत डिपोर्ट किया जाना चाहिए।

उन्होंने अपनी सरकार के कार्यकाल में सीमा सुरक्षा को लेकर भी दावा किया कि अमेरिका ने इतिहास की सबसे सुरक्षित सीमा बनाई है और अवैध आप्रवासन में अब तक की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की है।

बता दें कि 9/11 हमलों के बाद बनाए गए डीएचएस की जिम्मेदारी सीमा सुरक्षा, इमिग्रेशन, ट्रांसपोर्ट सुरक्षा और आपदा प्रबंधन जैसे अहम क्षेत्रों की है। मार्कवेन मुलिन, जो एक दशक से ज्यादा समय तक कांग्रेस में रहे हैं, ट्रंप के करीबी सहयोगी माने जाते हैं और सख्त इमिग्रेशन नीतियों के समर्थक हैं।

--आईएएनएस

वीकेयू/एएस

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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अमेरिका ने मध्य पूर्व के लिए 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के सैनिकों को किया तैयार

वॉशिंगटन, 25 मार्च (आईएएनएस)। पेंटागन अमेरिकी सेना की 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के हजारों सैनिकों को मध्य पूर्व में तैनात करने की तैयारी कर रहा है, जो ईरान संघर्ष में संभावित बढ़ोतरी का संकेत देता है। हालांकि वॉशिंगटन अभी भी कूटनीतिक विकल्पों की तलाश कर रहा है।

कई मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी सेना की 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के लगभग 3,000 सैनिकों को मध्य पूर्व में तैनात करने की तैयारी की जा रही है, जिससे पहले से ही क्षेत्र की ओर जा रहे हजारों मरीन सैनिकों की संख्या में इजाफा होगा।

अधिकारियों ने कहा कि अमेरिकी सैनिकों को ईरान में प्रवेश करने का कोई निर्णय नहीं लिया गया है। हालांकि, सैन्य जमावड़ा इस संभावना को बढ़ाता है कि अमेरिकी बल इस संघर्ष में और गहराई तक शामिल हो सकते हैं।

सीबीएस न्यूज की एक अलग रिपोर्ट में कहा गया है कि 82वीं एयरबोर्न के कुछ हिस्सों जिसमें कमांड इकाइयां और जमीनी बल शामिल हैं, को तैनात किए जाने की उम्मीद है। एक अमेरिकी अधिकारी ने संकेत दिया कि शुरुआती दल 1,500 से कम सैनिकों का हो सकता है।

82वीं एयरबोर्न अमेरिकी सेना की प्रमुख त्वरित-प्रतिक्रिया इकाइयों में से एक है। यह कुछ ही घंटों में दुनियाभर में तैनात हो सकती है। द न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, इसकी “इमीडिएट रिस्पॉन्स फोर्स” 18 घंटों के भीतर मूव कर सकती है, जिससे व्हाइट हाउस को लचीले सैन्य विकल्प मिलते हैं।

यह सैनिकों की तैनाती ऐसे समय हो रही है जब युद्ध अपने चौथे सप्ताह में प्रवेश कर चुका है। अब तक अमेरिका ने मुख्य रूप से लड़ाकू विमानों, बमवर्षकों और ड्रोन का उपयोग करते हुए हवाई अभियान पर निर्भर किया है।

अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार, फरवरी के अंत से ईरान के भीतर 9,000 से अधिक सैन्य ठिकानों पर हमले किए जा चुके हैं। इनमें मिसाइल लॉन्चर, नौसैनिक संसाधन और रक्षा औद्योगिक सुविधाएं शामिल हैं।

क्षेत्र में लड़ाई जारी है। ईरान ने इज़राइल और अन्य देशों पर ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल हमले किए हैं जबकि वॉशिंगटन बातचीत के लिए खुलापन दिखा रहा है।

होर्मुज जलडमरूमध्य एक महत्वपूर्ण तनाव बिंदु बना हुआ है। ईरानी कार्रवाइयों ने इस जलमार्ग तक पहुंच को प्रभावित किया है, जिसके जरिए दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा तेल गुजरता है, जिससे वैश्विक ऊर्जा कीमतों में वृद्धि हुई है।

अमेरिका के पास पहले से ही मध्य पूर्व में लगभग 50,000 सैनिक हैं। अतिरिक्त तैनाती यह संकेत देती है कि व्यापक सैन्य भूमिका पर विचार किया जा सकता है, जिसमें शिपिंग लेनों की सुरक्षा से जुड़े संभावित अभियान शामिल हैं।

द न्यूयार्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक सैन्य योजनाकार ऐसे परिदृश्यों पर विचार कर रहे हैं, जिनमें पैराट्रूपर्स को ईरान की मारक दूरी के भीतर तैनात किया जा सकता है। मरीन सैनिकों का उपयोग महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा या रणनीतिक तेल मार्गों के आसपास अभियानों के समर्थन के लिए भी किया जा सकता है।

इसी बीच, डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि ईरान के साथ बातचीत जारी है। सीबीएस न्यूज के अनुसार, उन्होंने संकेत दिया कि उनके प्रशासन के सदस्य वार्ता में शामिल हैं और तेहरान “समझौता करना चाहता है।”

ईरान ने सार्वजनिक रूप से किसी भी प्रत्यक्ष बातचीत से इनकार किया है और ऐसी रिपोर्टों को “फेक न्यूज” बताया है।

वर्तमान संघर्ष 28 फरवरी को अमेरिकी और इज़राइली हमलों के साथ शुरू हुआ था, जो ईरानी सैन्य ठिकानों को निशाना बना रहे थे। तब से यह मिसाइल हमलों, ड्रोन हमलों और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर खतरे के साथ एक व्यापक क्षेत्रीय टकराव में बदल गया है।

होर्मुज जलडमरूमध्य इस संकट का केंद्र बना हुआ है। किसी भी लंबी बाधा का वैश्विक तेल बाजारों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है, जिसमें भारत भी शामिल है, जो इस क्षेत्र से आने वाले ऊर्जा आयात पर काफी निर्भर है।

--आईएएनएस

पीएम

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