भाजपा सांसद कंगना रनौत ने बुधवार को लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी पर तीखा हमला बोला और आरोप लगाया कि उनका व्यवहार महिलाओं को असहज करता है और उनमें शिष्टाचार की कमी है। संसद में राहुल गांधी के आचरण की आलोचना के बारे में सवालों का जवाब देते हुए, रानौत ने कहा कि हम महिलाओं को बहुत ज्यादा उन्हें देखकर असहज महसूस होता है, क्योंकि एकदम जैसे टपोरी की तरह वो आते हैं और किसी को भी 'ऐ तू' ऐसे करके, 'तू तड़ाक' करके बात करते हैं। अनियंत्रित तरीके से, 'टपोरी' की तरह, आक्रामक तरीके से बोलना और दूसरों को बीच में रोकना। जिस तरह से वह खुद को संचालित करते हैं वह बहुत असहज है। उन्हें अपनी बहन को देखना चाहिए - लेकिन राहुल गांधी ऐसे नहीं हैं।
राहुल गांधी के संसद परिसर में कथित आचरण को लेकर बढ़ते विवाद के बीच उनकी ये टिप्पणियां आई हैं। मंगलवार को 200 से अधिक पूर्व नौकरशाहों, राजनयिकों और सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों ने एक खुला पत्र लिखकर उनके व्यवहार पर चिंता व्यक्त की। पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों ने संसद परिसर में आयोजित विरोध प्रदर्शनों, जिनमें सीढ़ियों पर प्रदर्शन और अनौपचारिक सभाएं शामिल हैं, की आलोचना करते हुए उन्हें अनुचित और स्थापित मानदंडों के विरुद्ध बताया।
पत्र में इस बात पर जोर दिया गया कि संसद भारत का सर्वोच्च संवैधानिक मंच है, जहां जनता की सामूहिक इच्छा व्यक्त की जाती है और कानून बनाए जाते हैं। इसमें कहा गया कि संसद परिसर में मर्यादा बनाए रखना केवल परंपरा की बात नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की संवैधानिक भावना का एक अनिवार्य हिस्सा है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने तर्क दिया कि विचाराधीन आचरण स्पीकर द्वारा जारी निर्देशों का उल्लंघन है और उन्होंने राहुल गांधी से सार्वजनिक माफी की मांग की।
इस घटनाक्रम ने एक राजनीतिक बहस छेड़ दी है, जिसमें सत्ताधारी पार्टी संस्थागत मर्यादा को लेकर कांग्रेस नेता पर निशाना साध रही है, जबकि विपक्षी नेता अक्सर इस विरोध को लोकतांत्रिक अधिकार बताकर इसका बचाव कर रहे हैं।
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अवैध प्रवासियों को लेकर अमेरिका की नई नीति ने पूरी दुनिया में बहस की आग भड़का दी है। हम आपको बता दें कि अमेरिका के गृह सुरक्षा विभाग ने एक ऐसा कदम उठाया है जिसने जहां एक तरफ सियासी हलकों में हलचल मचा दी है, वहीं आम लोगों के बीच भी तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। अमेरिका के गृह सुरक्षा विभाग ने घोषणा की है कि जो अवैध प्रवासी स्वेच्छा से अपने देश लौटना चाहते हैं, उन्हें मुफ्त हवाई यात्रा के साथ करीब दो हजार छह सौ डॉलर की नकद सहायता भी दी जाएगी। इस योजना में भारत के लोग भी शामिल हैं और प्रचार के लिए ताजमहल जैसी प्रतीकात्मक तस्वीरों का इस्तेमाल किया गया है।
इस पूरी पहल को प्रोजेक्ट होमकमिंग नाम दिया गया है, जिसकी शुरुआत पिछले साल मई में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के आरंभ के बाद की गई थी। यह योजना दरअसल उन लाखों अवैध प्रवासियों को लक्ष्य बनाकर तैयार की गई है जो अमेरिका में बिना वैध दस्तावेजों के रह रहे हैं। विभाग का दावा है कि यह योजना उन्हें डर और दबाव के बजाय एक सम्मानजनक विकल्प देती है।
सरकार ने इस योजना को प्रचारित करने के लिए सोशल मीडिया मंचों पर जोरदार अभियान चलाया है। पोस्ट में ताजमहल के साथ कोलंबिया और चीन के प्रमुख स्थलों की तस्वीरें लगाई गईं और संदेश दिया गया कि अब घर लौटने का मौका है, वह भी एक नई शुरुआत के साथ। विभाग ने साफ कहा कि जो लोग खुद से वापस लौटेंगे उन्हें न तो गिरफ्तार किया जाएगा, न हिरासत में रखा जाएगा और न ही किसी तरह की बेड़ियों में बांधा जाएगा।
इस प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए सीमा शुल्क और सीमा सुरक्षा विभाग का एक विशेष एप भी तैयार किया गया है। इसके जरिये प्रवासी अपने लौटने की इच्छा दर्ज कर सकते हैं, अपनी जानकारी दे सकते हैं और यात्रा तथा आर्थिक सहायता से जुड़ी पूरी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। आंकड़े बताते हैं कि जनवरी 2025 से अब तक करीब 22 लाख से ज्यादा अवैध प्रवासी इस योजना का लाभ उठा चुके हैं, जो इस पहल के व्यापक प्रभाव को दर्शाता है।
सबसे चौंकाने वाली बात इस योजना के पीछे का आर्थिक गणित है। अमेरिका में किसी एक व्यक्ति को जबरन निर्वासित करने पर करीब 18 हजार दो सौ पैंतालीस डॉलर का खर्च आता है। इसके मुकाबले स्वेच्छा से लौटने वाले व्यक्ति पर कुल खर्च लगभग पांच हजार एक सौ डॉलर तक सीमित रह जाता है। यानी हर व्यक्ति पर तेरह हजार डॉलर से ज्यादा की बचत। सरकार इसे करदाताओं के पैसे की सुरक्षा के रूप में पेश कर रही है।
हालांकि यह योजना पूरी तरह विवादों से घिरी हुई है। जब इसे शुरू किया गया था तब सहायता राशि एक हजार डॉलर थी, जिसे बाद में बढ़ाकर तीन हजार डॉलर तक कर दिया गया। फिर जनवरी में इसे दो हजार छह सौ डॉलर कर दिया गया। यह उतार चढ़ाव खुद इस बात की ओर इशारा करता है कि सरकार इस योजना को लगातार बदलते हालात के हिसाब से ढाल रही है।
इस बीच, सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रिया बेहद तीखी और व्यंग्य से भरी रही। कई लोगों ने सवाल उठाया कि क्या यह करदाताओं के पैसे का सही इस्तेमाल है? एक व्यक्ति ने लिखा कि क्या अमेरिकी नागरिकों को भी दो हजार छह सौ डॉलर मिल सकते हैं। दूसरे ने तंज कसा कि यह करदाताओं के पैसे का अद्भुत उपयोग है। किसी ने पूछा कि क्या कानून का पालन करने वाले और मेहनत करने वाले नागरिकों को भी कोई इनाम मिलेगा? वहीं कुछ लोगों ने इसे सरकारी तंत्र की विफलता और मजाक तक बता दिया।
स्पष्ट है कि यह योजना केवल एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बन चुकी है। जहां सरकार इसे व्यवस्थित और सस्ता समाधान बता रही है, वहीं जनता का एक बड़ा वर्ग इसे नीतिगत विफलता और संसाधनों की बर्बादी के रूप में देख रहा है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह योजना वास्तव में कितनी सफल होती है और क्या यह अमेरिका की आव्रजन नीति को एक नई दिशा दे पाएगी या फिर यह केवल एक और विवादित प्रयोग बनकर रह जाएगी।
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