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ममता बनर्जी के मंच पर SIR का विरोध करने वाला ‘साधु’ निकला फर्जी, रामकृष्ण सारदा मिशन ने किया खुलासा: कहा- मिनाखान में हमारी कोई शाखा नहीं

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 6 मार्च को कोलकाता में चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) अभियान के तहत मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने के दावों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। उस दिन कार्यक्रम में भगवा वस्त्र पहने एक व्यक्ति को मिनाखान स्थित रामकृष्ण सारदा […]

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Prabhasakshi NewsRoom: Jaishankar ने बताया, कैसे भारतीय जहाजों के लिए Iran से समुद्री रास्ता खुलवाया

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने होरमुज जलडमरूमध्य संकट के बीच भारत की कूटनीतिक पहल को लेकर स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ईरान के साथ उनकी बातचीत से ठोस परिणाम मिले हैं। उन्होंने कहा कि संवाद का रास्ता अपनाने से भारतीय जहाजों को इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से गुजरने की अनुमति मिल सकी है। जयशंकर का यह बयान ऐसे समय आया है जब पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है।

हम आपको बता दें कि होरमुज जलडमरूमध्य को दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्गों में गिना जाता है। वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। हाल के दिनों में ईरान द्वारा इस मार्ग पर कड़ी निगरानी और प्रतिबंध के कारण अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में भारी उथल पुथल देखने को मिली है। कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़कर सौ डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गईं।

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ऐसे संवेदनशील समय में जहां कई देश सैन्य विकल्पों पर विचार कर रहे हैं, वहीं भारत ने एक बार फिर साबित कर दिया कि मजबूत कूटनीति किसी भी टकराव से अधिक प्रभावी हो सकती है। हम आपको बता दें कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन, फ्रांस और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों से अपील की है कि वह इस समुद्री मार्ग की सुरक्षा के लिए युद्धपोत तैनात करें। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह का सैन्य कदम पश्चिम एशिया के पहले से जटिल संघर्ष को और भड़का सकता है। ऐसे माहौल में भारत की संवाद आधारित नीति कहीं अधिक व्यावहारिक और जिम्मेदार मानी जा रही है।

विदेश मंत्री जयशंकर ने ईरान के नेतृत्व के साथ सीधे संवाद स्थापित किया और इसके परिणामस्वरूप दो भारतीय गैस टैंकर सुरक्षित रूप से होरमुज जलडमरूमध्य से गुजर सके। देखा जाये तो यह घटना केवल दो जहाजों के गुजरने की अनुमति भर नहीं है, बल्कि यह भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा और प्रभाव का भी संकेत है। जब कई शक्तिशाली देश इस संकट के समाधान को लेकर दुविधा में नजर आए, तब भारत ने बातचीत के जरिए रास्ता निकालकर यह दिखा दिया कि कूटनीतिक क्षमता के मामले में वह अब वैश्विक मंच पर एक मजबूत शक्ति बन चुका है।

जयशंकर ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत का दृष्टिकोण टकराव की बजाय समाधान खोजने का है। उन्होंने कहा कि यदि देश आपसी समझ और समन्वय से समस्या का हल निकालते हैं तो इससे पूरी दुनिया को फायदा होगा। उनका यह संदेश अप्रत्यक्ष रूप से उन देशों के लिए भी संकेत माना जा रहा है जो इस संकट के समाधान के लिए सैन्य विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। जयशंकर ने यह भी कहा कि हर देश के संबंध अलग होते हैं, इसलिए सभी देशों के लिए एक ही तरीका काम करे यह जरूरी नहीं है। फिर भी यदि भारत का संवाद आधारित तरीका दूसरे देशों को बातचीत के लिए प्रेरित करता है तो यह वैश्विक स्थिरता के लिए अच्छा होगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान के साथ भारत की कोई स्थायी या व्यापक व्यवस्था नहीं बनी है। प्रत्येक जहाज की आवाजाही अलग परिस्थितियों में तय हो रही है। भारत और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे संबंधों के आधार पर यह बातचीत आगे बढ़ रही है।

जयशंकर ने इस बात से भी इंकार किया कि ईरान को इसके बदले में कोई विशेष लाभ दिया गया है। उन्होंने कहा कि यह किसी प्रकार का लेन देन नहीं है, बल्कि दोनों देशों के बीच भरोसे और संवाद का परिणाम है। उन्होंने कहा कि भारत इस पूरे संकट को दुर्भाग्यपूर्ण मानता है और चाहता है कि स्थिति जल्द सामान्य हो। विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि अभी यह प्रक्रिया शुरुआती दौर में है। होरमुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले भारतीय जहाजों की संख्या अधिक है और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना भारत की प्राथमिकता है। इसी कारण भारत और ईरान के बीच बातचीत लगातार जारी है।

इसके अलावा, भारत की ताकत केवल कूटनीति तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में देश ने ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भी मजबूत रणनीति तैयार की है। हम आपको बता दें कि आज भारत वैश्विक ऊर्जा बाजार में आने वाली बाधाओं से निपटने के लिए पहले की तुलना में कहीं अधिक तैयार है। पश्चिम एशिया में हालिया सैन्य तनाव शुरू होने से पहले भारत लगभग 55 प्रतिशत कच्चा तेल ऐसे मार्गों से आयात करता था जो होरमुज से होकर नहीं गुजरते थे। अब यह हिस्सा बढ़कर लगभग सत्तर प्रतिशत तक पहुंच चुका है। इसका मतलब यह है कि यदि होरमुज मार्ग में बाधा आती है तो भी भारत के पास वैकल्पिक आपूर्ति के रास्ते मौजूद हैं।

इसके अलावा, भारत ने प्राकृतिक गैस और रसोई गैस की आपूर्ति के लिए भी कई नए देशों से समझौते किए हैं। अब गैर-होरमुज मार्गों से ऊर्जा कार्गो भारत पहुंचने लगे हैं। हम आपको बता दें कि भारत अपनी प्राकृतिक गैस जरूरत का लगभग आधा हिस्सा और रसोई गैस का करीब साठ प्रतिशत हिस्सा आयात करता है, इसलिए आपूर्ति के स्रोतों का विस्तार देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। सरकारी अधिकारियों के मुताबिक केंद्र सरकार ने घरेलू उत्पादन बढ़ाने, नए ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने और आयात के स्रोतों को विविध बनाने की नीति अपनाकर देश को वैश्विक ऊर्जा संकट से काफी हद तक सुरक्षित कर दिया है।

साथ ही भारत की विदेश नीति भी इसमें अहम भूमिका निभा रही है। इस नीति के तहत भारत ने अलग अलग देशों के साथ संतुलित और मजबूत संबंध बनाए हैं। एक दशक पहले जहां भारत केवल 27 देशों से कच्चा तेल आयात करता था, वहीं आज यह संख्या बढ़कर चालीस से अधिक देशों तक पहुंच चुकी है। ऊर्जा निर्भरता कम करने में वैकल्पिक ईंधन कार्यक्रमों ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। देश में बीस प्रतिशत एथनॉल मिश्रण कार्यक्रम के कारण हर साल लगभग 44 मिलियन बैरल कच्चे तेल की खपत कम हो जाती है। इसके अलावा इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग को भी तेजी से बढ़ावा दिया गया है।

आंकड़ों के अनुसार 2023-24 में इलेक्ट्रिक वाहनों का पंजीकरण 2019-20 की तुलना में लगभग दस गुना बढ़ गया। 2025-26 में इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री 23 लाख इकाइयों तक पहुंच गई, जो कुल वाहन पंजीकरण का करीब आठ प्रतिशत है।

बहरहाल, होरमुज संकट के बीच भारत ने दुनिया को यह संदेश दिया है कि मजबूत कूटनीति किसी भी सैन्य दबाव से ज्यादा प्रभावी हो सकती है और दूरदर्शी ऊर्जा नीति देश को वैश्विक संकटों के बीच भी स्थिर बनाए रख सकती है। यही कारण है कि आज भारत न केवल अपने हितों की रक्षा कर रहा है बल्कि वैश्विक स्तर पर जिम्मेदार और निर्णायक शक्ति के रूप में भी उभर रहा है।

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