ईरान के साथ बढ़ते सैन्य संघर्ष और वैश्विक तेल बाजार में मची उथल-पुथल के बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आम जनता को राहत देने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। राष्ट्रपति ट्रंप ने घोषणा की है कि उनका प्रशासन पेट्रोल की आसमान छूती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए अमेरिका के 'स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व' (SPR) यानी रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का इस्तेमाल करेगा।
सिनसिनाटी में स्थानीय चैनल ‘डब्ल्यूकेआरसी लोकल-12’ को बुधवार को दिए साक्षात्कार में ट्रंप से जब भंडार के उपयोग के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, ‘‘ हम ऐसा करेंगे और फिर बाद में इसे फिर से भर देंगे।’’
उन्होंने कहा, ‘‘ अभी हम इसे थोड़ा कम करेंगे और इससे कीमतें नीचे आएंगी।’’
राष्ट्रपति ने हालांकि यह नहीं बताया कि अमेरिका अपने भंडार से कितने बैरल तेल जारी करेगा।
गौरतलब है कि ट्रंप ने पहले कई मौकों पर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन के प्रशासन की पेट्रोल की कीमतें कम करने के लिए इस भंडार का उपयोग करने को लेकर आलोचना की है।
‘स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व’, कच्चे तेल का वह आपातकालीन भंडार है, जिसे सरकार किसी बड़े भू-राजनीतिक संकट, युद्ध या आपूर्ति रुकने की स्थिति में इस्तेमाल के लिए भूमिगत गुफाओं में जमा करती है।
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संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने खाड़ी देशों और जॉर्डन पर ईरान के हमलों की निंदा करते हुए एक मसौदा प्रस्ताव पारित किया और तेहरान से तत्काल शत्रुता रोकने की मांग की। खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) द्वारा प्रायोजित और 135 अन्य संयुक्त राष्ट्र सदस्य देशों द्वारा सह-प्रायोजित इस प्रस्ताव के पक्ष में यूएनएससी के 15 सदस्यों में से 13 ने मतदान किया। किसी भी देश ने मसौदे के खिलाफ मतदान नहीं किया। यह एकतरफा फैसला था। परिषद में 13 मत पक्ष में पड़े, दो मत अनुपस्थित रहे। प्रस्ताव में ईरान से सभी हमलों को तुरंत रोकने की मांग की गई है और होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की उसकी धमकियों की आलोचना की। भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में प्रस्ताव को स्पॉन्सर किया है।
वोटिंग और प्रस्ताव का समर्थन
अमेरिका की अध्यक्षता वाली 15 सदस्यीय सुरक्षा परिषद ने 13 मतों के साथ इस प्रस्ताव को बुधवार को पारित किया। इसके खिलाफ कोई मत नहीं पड़ा जबकि वीटो अधिकार वाले स्थायी सदस्यों चीन और रूस ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। भारत ने 130 से अधिक देशों के साथ मिलकर बहरीन के नेतृत्व वाले इस प्रस्ताव का सह-प्रायोजन किया। इस प्रस्ताव को प्रायोजित करने वाले देशों में ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया, बांग्लादेश, भूटान, कनाडा, मिस्र, फ्रांस, जर्मनी, यूनान, इटली, जापान, कुवैत, मलेशिया, मालदीव, म्यांमा, न्यूजीलैंड, नॉर्वे, ओमान, पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब, सिंगापुर, स्पेन, यूक्रेन, संयुक्त अरब अमीरात, ब्रिटेन, अमेरिका, यमन और जाम्बिया शामिल हैं। इस प्रस्ताव के कुल 135 सह-प्रायोजक थे। इसमें बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और जॉर्डन की क्षेत्रीय अखंडता, संप्रभुता एवं राजनीतिक स्वतंत्रता के प्रति मजबूत समर्थन को दोहराया गया है। इसमें बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और जॉर्डन के क्षेत्रों पर ईरान के भीषण हमलों की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए कहा गया है कि इस प्रकार के कृत्य अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन हैं तथा अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हैं।
क्या मांग रखी गई
इस प्रस्ताव में मांग की गई है कि ईरान जीसीसी देशों एवं जॉर्डन के खिलाफ सभी हमलों को तत्काल रोके और पड़ोसी देशों के खिलाफ छद्म समूहों के इस्तेमाल समेत किसी भी उकसावे वाली या धमकाने वाली कार्रवाई को ‘‘तुरंत और बिना शर्त’’ रोके। इसमें दोहराया गया कि व्यापारिक एवं वाणिज्यिक पोतों के नौवहन अधिकारों और स्वतंत्रता का विशेष रूप से महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों के आसपास अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप सम्मान किया जाना चाहिए। इस प्रस्ताव में सदस्य देशों के उस अधिकार को संज्ञान में लिया गया है जिसके तहत वे ‘‘हमलों और उकसावों से अपने पोतों की रक्षा कर सकते हैं।’’ इस प्रस्ताव में ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय नौवहन को बंद करने, बाधित करने या किसी भी तरह से हस्तक्षेप करने या बाब अल मंदाब में समुद्री सुरक्षा को खतरे में डालने के उद्देश्य से की गई हर प्रकार की कार्रवाई या धमकी की निंदा की गई। इस प्रस्ताव में कहा गया कि रिहायशी इलाकों पर हमला किया गया, असैन्य साजो सामानों को निशाना बनाया गया और इन हमलों में आम नागरिक हताहत हुए तथा असैन्य इमारतों को नुकसान पहुंचा। प्रस्ताव में उन देशों और लोगों के साथ एकजुटता जताई गई जो हमलों का शिकार हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के प्रतिनिधि राजदूत माइक वाल्ट्ज ने कहा कि इस प्रस्ताव को अपनाया जाना ‘‘ईरानी शासन की क्रूरता की निंदा करने वाला खाड़ी देशों का सीधा और स्पष्ट बयान है।
अमेरिका ने क्या कहा
ईरानी शासन की आम नागरिकों और असैन्य अवसंरचना को निशाना बनाने की प्रवृत्ति निंदनीय है।’’ वाल्ट्ज ने कहा कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी टीम ने कूटनीतिक बातचीत की हर कोशिश की। वाल्ट्ज ने कहा, ‘‘उन्होंने शांति की कोशिश की और 47 वर्षों की शत्रुता एवं हमलों को खत्म करने का प्रयास किया लेकिन ईरान ने केवल और अधिक मिसाइल, और अधिक ड्रोन तथा परमाणु प्रलय की ओर अग्रसर होने का रास्ता खोजा। राष्ट्रपति ट्रंप ने लक्ष्मण रेखा खींच दी है। ईरान ने इसे एक बार फिर पार किया और अब दुनिया इसके परिणामों का सामना कर रही है।’’ वाल्ट्ज ने प्रस्ताव का सह-प्रायोजन करने वाले 135 देशों के प्रति आभार जताया। संयुक्त राष्ट्र में ईरान के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत अमीर सईद इरावानी ने परिषद की इस कार्रवाई को अन्यायपूर्ण और अवैध बताते हुए कहा कि यह संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप नहीं है तथा यह ऐसी कार्रवाई है जो आक्रामकता एवं शांति भंग करने के कृत्यों को नियंत्रित करने वाले स्थापित सिद्धांतों की पूर्णतय: अवहेलना करती है। उन्होंने कहा कि कोई भूल न करे: आज ईरान है; कल कोई और संप्रभु देश हो सकता है। इरावानी ने कहा कि 28 फरवरी को संघर्ष शुरू होने के बाद से अमेरिका और इजराइल के लगातार सैन्य हमलों में महिलाओं और बच्चों सहित 1,348 से अधिक आम नागरिक मारे गए हैं, 17,000 से अधिक आम नागरिक घायल हुए हैं और 19,734 असैन्य स्थलों को नष्ट या क्षतिग्रस्त किया गया है। ईरानी दूत ने कहा, ‘‘इन हमलों का पैमाना और उनका व्यवस्थित स्वरूप युद्ध अपराध और मानवता के खिलाफ स्पष्ट रूप से अपराध है।’’ इरावानी ने कहा कि ईरान फारस की खाड़ी क्षेत्र के देशों के साथ पारस्परिक सम्मान, अच्छे पड़ोसी होने के सिद्धांत और एक-दूसरे की संप्रभुता एवं क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान पर आधारित मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखने के लिए ‘‘प्रतिबद्ध’’ है। उन्होंने कहा, ‘‘क्षेत्र में अमेरिका के सैन्य अड्डों और प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने की ईरान की रक्षात्मक कार्रवाई किसी भी तरह से क्षेत्रीय देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के खिलाफ नहीं है।
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