Binance से 6.3 अरब डॉलर की क्रिप्टो चोरी में उत्तर कोरियाई हैकर्स का हाथ, FBI का दावा
न्यूयॉर्क, एक नवंबर (एपी) अमेरिकी जांच एजेंसी फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (एफबीआई) ने कहा है कि दुनिया की सबसे बड़ी क्रिप्टोकरेंसी चोरी की घटना को उत्तर कोरिया के हैकर्स ने अंजाम दिया जिसमें कुछ ही मिनट के भीतर बाइनेंस से अरबों डॉलर की डिजिटल मुद्रा चोरी कर ली गई। एफबीआई ने शनिवार को जारी एक बयान में कहा कि इस सप्ताह हुआ साइबर हमला ट्रेडरट्रेटर नामक समूह की दुर्भावनापूर्ण साइबर गतिविधियों से जुड़ा है। उसने कहा कि इसी समूह ने पिछले साल बायबिट पर 1.5 अरब अमेरिकी डॉलर की साइबर चोरी को भी अंजाम दिया था।
एफबीआई ने क्रिप्टो एक्सचेंज, ब्लॉकचेन विश्लेषण कंपनियों और अन्य संबंधित पक्षों से विभिन्न डिजिटल वॉलेट पतों से जुड़े लेनदेन रोकने का आग्रह किया है, ताकि चोरी की गई रकम को उसके स्रोत को छिपाने के लिए अवैध रूप से इधर-उधर न किया जा सके। एजेंसी ने कहा कि उसकी जांच में पता चला है कि ट्रेडरट्रेटर चोरी की गई डिजिटल संपत्तियों को मुख्य रूप से इथेरियम नामक क्रिप्टोकरेंसी में बदल रहा है। एफबीआई को आशंका है कि हैकर अब विकेंद्रीकृत वित्त (डीफाई) मंचों और इंस्टेंट स्वैप सर्विसेज के जरिये इन संपत्तियों को दूसरी क्रिप्टोकरेंसी में बदलने का प्रयास करेंगे।
हालांकि, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार रात फ्लोरिडा स्थित अपने मार-ए-लागो आवास में आयोजित हैलोवीन पार्टी के दौरान पत्रकारों से बातचीत में उत्तर कोरिया की संलिप्तता को लेकर अनिश्चितता जताई। ट्रंप ने इस मामले के बारे में पूछे जाने पर कहा, मैं चिंतित नहीं हूं। हम इस बारे में जानकारी जुटा रहे हैं।
हमें नहीं पता कि इसमें उत्तर कोरिया शामिल है या नहीं। हालांकि, उन्होंने कहा कि जांच में आगे इसकी पुष्टि हो सकती है। क्रिप्टो विशेषज्ञ एरी रेडबोर्ड ने कहा कि उन्हें आशंका है कि हैकर चोरी की गई डिजिटल संपत्तियों को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर और निगरानी से बचने के लिए छोटे एक्सचेंज के माध्यम से उनका लेनदेन कर सकते हैं।
यह प्रक्रिया कई महीनों तक चल सकती है। बृहस्पतिवार को दुनिया के सबसे बड़े क्रिप्टोकरेंसी एक्सचेंज बाइनेंस से बिटकॉइन और अन्य डिजिटल मुद्राओं के रूप में 6.3 अरब अमेरिकी डॉलर की चोरी हुई थी। कई क्रिप्टो विशेषज्ञों ने कहा था कि इस हमले में उत्तर कोरियाई हैकर की संलिप्तता के संकेत मिलते हैं।
पेट्रोल के एक्सपोर्ट पर टैक्स जीरो, डीजल और ATF पर बढ़ी एक्साइज ड्यूटी, सरकार का बड़ा फैसला
केंद्र सरकार ने दिवाली से पहले पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात शुल्क में बड़ा बदलाव किया है. वित्त मंत्रालय की ओर से 31 अक्टूबर को जारी अधिसूचना के मुताबिक, पेट्रोल के निर्यात पर लगने वाली एक्सपोर्ट ड्यूटी को घटाकर शून्य कर दिया गया है. वहीं, डीजल और हवाई ईंधन यानी एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) के निर्यात पर टैक्स बढ़ा दिया गया है. सरकार का यह फैसला ऐसे समय आया है, जब पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव बना हुआ है. नए टैक्स की दरें 31 अक्टूबर से लागू हो गई हैं और फिलहाल अगले दो सप्ताह तक प्रभावी रहेंगी.
पेट्रोल के निर्यात पर अब नहीं लगेगी ड्यूटी
वित्त मंत्रालय के नए आदेश के तहत पेट्रोल के निर्यात पर लगने वाली विंडफॉल टैक्स की दर 2.50 रुपये प्रति लीटर से घटाकर शून्य कर दी गई है. यानी अब पेट्रोल का निर्यात करने वाली कंपनियों को इस मद में कोई शुल्क नहीं देना होगा. हालांकि, सरकार ने डीजल और ATF के मामले में राहत देने के बजाय टैक्स बढ़ाने का फैसला किया है. इन दोनों ईंधनों पर बढ़ी हुई दरें अगले दो सप्ताह तक लागू रहेंगी. इसके बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति को देखते हुए सरकार दोबारा समीक्षा कर सकती है.
डीजल और हवाई ईंधन पर कितना बढ़ा टैक्स?
सरकार की ओर से जारी अधिसूचना के मुताबिक, डीजल के निर्यात पर लगने वाले स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी (SAED) और रोड एंड इंफ्रास्ट्रक्चर सेस को मिलाकर कुल शुल्क 8.50 रुपये से बढ़ाकर 11.50 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है. इस तरह डीजल के निर्यात पर प्रति लीटर 3 रुपये की बढ़ोतरी हुई है. वहीं, हवाई ईंधन यानी ATF के निर्यात पर लगने वाली स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी को 10.50 रुपये से बढ़ाकर 11 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है. इसमें 50 पैसे प्रति लीटर का इजाफा किया गया है.
आम लोगों को पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर राहत या असर?
वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि टैक्स में किए गए इन बदलावों का असर घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर नहीं पड़ेगा. घरेलू इस्तेमाल के लिए इन दोनों ईंधनों पर लागू मौजूदा शुल्क में कोई बदलाव नहीं किया गया है. इसका मतलब है कि सरकार का ताजा फैसला केवल निर्यात किए जाने वाले पेट्रोलियम उत्पादों पर लागू होगा. आम उपभोक्ताओं के लिए देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर इस फैसले का सीधा असर नहीं पड़ेगा.
क्या होता है विंडफॉल टैक्स?
विंडफॉल टैक्स वह अतिरिक्त कर है, जिसे सरकार कंपनियों की असाधारण कमाई पर लगाती है. जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल या पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं, तो रिफाइनरी कंपनियों को विदेशों में ईंधन बेचकर सामान्य से ज्यादा मुनाफा हो सकता है. ऐसी स्थिति में सरकार निर्यात पर अतिरिक्त शुल्क लगाकर इस कमाई का कुछ हिस्सा हासिल करती है. इसके अलावा, इस टैक्स के जरिए कंपनियों को विदेशों में ज्यादा बिक्री करने के बजाय घरेलू बाजार में ईंधन की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता है.
2022 में पहली बार लगाया गया था विंडफॉल टैक्स
भारत में पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात पर पहली बार जुलाई 2022 में विंडफॉल टैक्स लगाया गया था. करीब दो साल बाद दिसंबर 2024 में इसे हटा लिया गया. हालांकि, मार्च 2026 में अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में अस्थिरता और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के बीच सरकार ने इसे दोबारा लागू कर दिया. तब से सरकार बाजार की परिस्थितियों के मुताबिक इसकी दरों में बदलाव कर रही है. हर दो सप्ताह में टैक्स की समीक्षा की जाती है। इस दौरान अंतरराष्ट्रीय ईंधन कीमतों और घरेलू रिफाइनरी कंपनियों को निर्यात से होने वाले मुनाफे को ध्यान में रखा जाता है.
ये भी पढ़ें: INDIA Bloc Ramlila Maidan Rally Live: रामलीला मैदान में आज विपक्ष की महारैली, दिल्ली के निकल पड़े कार्यकर्ता
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
prabhasakshi
News Nation










