जानिए क्यों है वज्रासन एकमात्र ऐसा आसन जिसे खाने के बाद किया जा सकता है?
नई दिल्ली, 5 मार्च (आईएएनएस)। आज की तेज रफ्तार जिंदगी में लोग अक्सर खाने-पीने और एक्सरसाइज के लिए समय नहीं निकाल पाते। ऐसी स्थिति में शरीर धीरे-धीरे कई तरह की शारीरिक समस्याओं का शिकार होने लगता है, लेकिन अगर सेहत का खास ख्याल रखने के लिए दिन के सिर्फ कुछ मिनट भी निकाल सकें, तो एक आसान सा योगासन आपकी सेहत को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। इस योगासन का नाम है वज्रासन।
वज्रासन एक ऐसा योगासन है, जो सरल और प्रभावी माना जाता है। इसकी खास बात ये है कि इसे करने के लिए किसी विशेष जगह या ज्यादा समय की जरूरत नहीं होती। आप इसे घर में, ऑफिस में, या खाना खाने के बाद भी आसानी से कर सकते हैं। यही वजह है कि योग विशेषज्ञ इसे रोजाना करने की सलाह देते हैं।
आयुष मंत्रालय ने इसे एक सरल और प्रभावी योगासन बताया है। उनके अनुसार, वज्रासन पाचन तंत्र को मजबूत करता है, जांघों और पिंडलियों को मजबूत करता है और मानसिक शांति दिलाता है। यह एकमात्र ऐसा योगासन है, जिसे भोजन के तुरंत बाद किया जा सकता है, जो पेट की समस्याओं जैसे कब्ज और एसिडिटी को दूर करता है।
इसके अलावा, इस योगासन के नियमित अभ्यास से हाई ब्लड प्रेशर की समस्या कम हो सकती है। यह आसन पैरों की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है और शरीर को ताकत देता है। वज्रासन में बैठकर अगर हम लंबी और गहरी सांसें लें, तो इससे फेफड़े भी मजबूत होते हैं।
जिन लोगों का पेट बाहर निकला हुआ होता है, वे अगर रोज वज्रासन करें तो कुछ ही दिनों में उनका पेट अंदर आना शुरू हो जाता है। यह आसन दिमाग को शांत करता है, एकाग्रता बढ़ाता है और मन की बेचैनी को दूर करता है। इसके साथ ही मानसिक तनाव भी कम होता है।
अगर किसी के पास आसन को करने के लिए ज्यादा समय नहीं है, तो इसे रोजाना बस खाना खाने के बाद 5-10 मिनट करना चाहिए। ऐसा करने से एसिडिटी और ब्लोटिंग से तुरंत आराम मिलता है। यह मांसपेशियों को मजबूत करता है और एकाग्रता बढ़ाता है।
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डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
कैसा होना चाहिए आपका भोजन? आयुर्वेद से जानें संतुलित स्वाद का महत्व
नई दिल्ली, 5 मार्च (आईएएनएस)। आयुर्वेद में भोजन केवल पेट भरने के लिए नहीं है, बल्कि यह शरीर को पोषण देने, ऊर्जा देने और शरीर के संतुलन को बनाए रखने का माध्यम भी माना गया है, इसलिए भोजन को महाभैषज्य (सर्वोत्तम औषधि) भी कहा जाता है। इसका मतलब यह है कि अगर हमारा आहार सही और संतुलित है, तो कई बीमारियों से हम अपने-आप ही बचे रह सकते हैं।
इसलिए हमें यह समझना जरूरी है कि हम क्या खा रहे हैं, कितना खा रहे हैं और किस तरह खा रहे हैं।
आयुर्वेद में कहा गया है कि हमारे रोज के भोजन में छह तरह के स्वाद यानी मधुर (मीठा), अम्ल (खट्टा), लवण (नमकीन), कटु (तीखा), तिक्त (कड़वा) और कषाय (कसैला) स्वाद उचित मात्रा में होने चाहिए। इसे षड्रस कहा जाता है। जब हम इन सभी स्वादों को संतुलित मात्रा में लेते हैं, तो शरीर के तीनों दोष (वात, पित्त और कफ) संतुलित रहते हैं।
उदाहरण के लिए, मीठा स्वाद शरीर को ताकत देता है और शरीर के ऊतकों को पोषण देता है। खट्टा स्वाद भूख बढ़ाता है और पाचन को बेहतर बनाता है। नमकीन स्वाद भोजन को स्वादिष्ट बनाता है और शरीर में तरलता बनाए रखता है। इसी तरह, तीखा स्वाद पाचन को तेज करता है और शरीर में जमा कफ को कम करता है। कड़वा स्वाद शरीर को साफ करने में मदद करता है और खून को शुद्ध करता है, जबकि कसैला स्वाद शरीर को ठंडक देता है और त्वचा से जुड़ी समस्याओं में लाभकारी माना जाता है।
आयुर्वेद यह भी कहता है कि किसी भी स्वाद का ज्यादा सेवन नुकसानदेह हो सकता है। जैसे अगर हम बहुत ज्यादा मीठा खाते हैं, तो मोटापा, सुस्ती और मधुमेह जैसी समस्याएं हो सकती हैं। बहुत ज्यादा नमक खाने से बाल जल्दी सफेद हो सकते हैं और शरीर में सूजन भी आ सकती है। इसी तरह बहुत ज्यादा तीखा या मसालेदार भोजन पित्त को बढ़ा सकता है और पेट से जुड़ी परेशानियां पैदा कर सकता है। इसलिए जरूरी है कि हम हर स्वाद को संतुलित मात्रा में लें।
आयुर्वेद भोजन की मात्रा पर भी खास जोर देता है। कहा जाता है कि पेट को तीन हिस्सों में बांटना चाहिए। दो हिस्से ठोस भोजन के लिए और एक हिस्सा तरल के लिए और एक हिस्सा खाली छोड़ना चाहिए ताकि भोजन आसानी से पच सके। अगर हम जरूरत से ज्यादा खा लेते हैं, तो पाचन तंत्र पर दबाव पड़ता है और गैस, एसिडिटी और अपच जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
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