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क्या Sheikh Hasina ने नहीं दिया था इस्तीफ़ा? Bangladesh के President Shahabuddin का सनसनीखेज दावा

पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश की राजनीति आजकल किसी सस्पेंस थ्रिलर फिल्म जैसी हो गई है। शेख हसीना के देश छोड़ने के महीनों बाद भी 'इस्तीफे के लेटर' और 'असंवैधानिक सरकार' जैसे शब्दों को लेकर वहां जबरदस्त घमासान मचा हुआ है। ताजा मामला राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन और कट्टरपंथी पार्टी जमात-ए-इस्लामी के बीच ठन जाने का है।

हाल ही में राष्ट्रपति शहाबुद्दीन ने एक इंटरव्यू में मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार पर तीखे हमले किए। उन्होंने कुछ ऐसे खुलासे किए जिसने ढाका से लेकर दिल्ली तक सबको चौंका दिया। राष्ट्रपति ने यूनुस सरकार के कई फैसलों को संविधान के खिलाफ बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें एक तरह से 'हाउस अरेस्ट' (नजरबंद) कर दिया गया था, उन्हें इलाज के लिए विदेश जाने से रोका गया और कई बार राष्ट्रपति पद से हटाने की कोशिश भी की गई।

उन्होंने अमेरिका और यूनुस सरकार के बीच सीक्रेट डील होने का भी दावा किया। उन्होंने कहा कि यूनुस सरकार ने अमेरिका के साथ एक 'गुपचुप' व्यापार  समझौता किया, जिसके बारे में उन्हें (देश के राष्ट्रपति को) अंधेरे में रखा गया। राष्ट्रपति के इन बयानों पर अब जमात-ए-इस्लामी के चीफ शफीकुर रहमान भड़क गए हैं। उन्होंने फेसबुक पर एक लंबी पोस्ट लिखकर राष्ट्रपति को ही कटघरे में खड़ा कर दिया।
 

गायब इस्तीफे की मिस्ट्री

रहमान का कहना है कि 5 अगस्त (जिस दिन हसीना ने देश छोड़ा) को राष्ट्रपति ने देश से कहा था कि उन्हें इस्तीफा मिल गया है, लेकिन अब वह कह रहे हैं कि उनके पास इस्तीफे का कोई सबूत ही नहीं है। जमात चीफ ने सवाल उठाया कि राष्ट्रपति उस दिन कुछ और कह रहे थे और आज सुर क्यों बदल रहे हैं?

इस पूरी लड़ाई की जड़ वह 'रेजिग्नेशन लेटर' है, जिसका अता-पता किसी को नहीं है।

  • अगस्त 2024: राष्ट्रपति ने टीवी पर कहा, "हसीना ने इस्तीफा दे दिया है और मुझे मिल गया है।"
  • अक्टूबर 2024: राष्ट्रपति ने कहा, "मैंने बहुत ढूंढा पर इस्तीफा नहीं मिला, शायद हसीना को साइन करने का वक्त ही नहीं मिला।"
यही वो पॉइंट है जहाँ यूनुस सरकार और इस्लामी संगठन राष्ट्रपति को घेर रहे हैं, क्योंकि अगर इस्तीफा नहीं है, तो वर्तमान सरकार की कानूनी वैधता पर सवाल उठते हैं।

यूनुस और कट्टरपंथियों का 'नेक्सस'?

बांग्लादेश की गलियों में यह चर्चा आम है कि शेख हसीना को हटाने के पीछे जमात-ए-इस्लामी और उसके छात्र संगठन 'छात्र शिविर' का बड़ा हाथ था। 2026 के चुनावों से पहले यह साफ दिख रहा है कि आंदोलन चलाने वाले छात्र नेता अब जमात के करीब जा रहे हैं।

दिलचस्प बात यह है कि इनमें से कई छात्र नेता अब यूनुस की कैबिनेट में मंत्री बनकर बैठे हैं। ऐसे में राष्ट्रपति का यह कहना कि वह सिर्फ सेना और विपक्षी पार्टी BNP के समर्थन से टिके हुए हैं, वहां के सत्ता संघर्ष की एक डरावनी तस्वीर पेश करता है।

बांग्लादेश में फिलहाल 'संविधान' और 'हकीकत' के बीच की जंग चल रही है। एक तरफ वो सरकार है जो आंदोलन से निकली है, और दूसरी तरफ वो राष्ट्रपति हैं जिन्हें शेख हसीना ने नियुक्त किया था। देखना होगा कि 2026 के चुनाव तक यह ऊंट किस करवट बैठता है।

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Indian Poultry की Saudi Arabia में 'No Entry', Food Safety पर उठे सवाल, Export Business संकट में

भारत के पोल्ट्री बिजनेस के लिए खाड़ी देशों से एक बुरी खबर आई है। सऊदी अरब ने भारत से आने वाले चिकन (Poultry) और अंडों के आयात पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी है। इस फैसले ने न केवल भारतीय निर्यातकों की नींद उड़ा दी है, बल्कि पोल्ट्री फार्म चलाने वाले किसानों के माथे पर भी चिंता की लकीरें खींच दी हैं।

सऊदी अरब के अधिकारियों ने इस कड़े कदम के पीछे मुख्य रूप से हेल्थ और सेफ्टी का हवाला दिया है। वहां की सरकार को डर है कि एवियन इन्फ्लूएंजा (बर्ड फ्लू) के चलते संक्रमण फैल सकता है। साथ ही सऊदी अरब अपने खाद्य सुरक्षा मानकों को लेकर काफी सख्त हो गया है, और फिलहाल भारतीय पोल्ट्री उत्पाद उन पैमानों पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं।

किसानों और कारोबारियों पर क्या होगा असर?

सऊदी अरब भारत के लिए एक बहुत बड़ा मार्केट था। इस अचानक लगे ब्रेक के कई गहरे असर होने वाले हैं कि जो किसान एक्सपोर्ट के भरोसे अपनी आय बढ़ाने का सपना देख रहे थे, उन्हें भारी वित्तीय नुकसान झेलना पड़ सकता है। साथ ही जब माल बाहर नहीं जाएगा, तो वह देश के भीतर ही बिकेगा। इससे घरेलू बाजार में चिकन और अंडों की भरमार हो जाएगी, जिससे इनकी कीमतें काफी नीचे गिर सकती हैं। आम जनता के लिए तो यह अच्छी खबर हो सकती है, लेकिन पोल्ट्री फार्मर्स के लिए यह घाटे का सौदा होगा। इस कारण अब एक्सपोर्टर्स को मजबूरी में नए देशों के दरवाजे खटखटाने होंगे, लेकिन रातों-रात लॉजिस्टिक्स और मार्केटिंग स्ट्रैटेजी बदलना इतना आसान नहीं होता।

ग्लोबल ट्रेड का 'पेचीदा' खेल

सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई और देश भी इस समय आंशिक प्रतिबंधों का सामना कर रहे हैं। इससे इंटरनेशनल मार्केट में पोल्ट्री ट्रेड का पूरा ढांचा ही हिल गया है। यह स्थिति हमें याद दिलाती है कि ग्लोबल ट्रेड कितना नाजुक है—एक छोटी सी बीमारी या हेल्थ अलर्ट पूरे बिजनेस को चौपट कर सकता है।

अब गेंद भारत के पॉलिसी मेकर्स और एक्सपोर्टर्स के पाले में है। उन्हें न केवल अपने सेफ्टी स्टैंडर्ड्स सुधारने होंगे, बल्कि किसानों को इस आर्थिक झटके से उबारने के लिए ठोस कदम भी उठाने होंगे।

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