नागरिक ग्रिड पर निर्भरता घटाएगा Pentagon, US सैन्य अड्डों की सुरक्षा को FORTRESS पहल
अमेरिका एक ऐसी स्थिति के लिए तैयारी कर रहा है, जिसमें किसी बड़े सैन्य संघर्ष के दौरान उसके सशस्त्र बलों को न केवल विदेशों में दुश्मन सेनाओं से लड़ना पड़ सकता है, बल्कि अपने देश में महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे (critical infrastructure) के ठप होने की समस्या से भी निपटना पड़ सकता है। खबरों के अनुसार, पेंटागन एक ऐसी योजना पर काम कर रहा है, जिससे सैन्य अड्डों को बाहरी मदद के बिना कम से कम 90 दिनों तक चालू रखा जा सके। इसमें बिजली, ईंधन की आपूर्ति, संचार और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में आने वाली रुकावटों को ध्यान में रखा गया है। 'फोर्ट्रेस' (FORTRESS) नाम की यह पहल दर्शाती है कि वाशिंगटन इस बात पर अधिक जोर दे रहा है कि लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष के दौरान, अगर आम नागरिकों के लिए जरूरी सेवाएं भी ठप हो जाएं, तब भी उसकी सेना अपना काम जारी रख सके। ये तैयारियां केवल पावर बैकअप और आपातकालीन ईंधन स्टॉक तक ही सीमित नहीं हैं। अमेरिकी रक्षा विभाग महत्वपूर्ण सैन्य सामग्रियों को सुरक्षित करने, रक्षा उत्पादन के लिए नागरिक विनिर्माण सुविधाओं को जुटाने और ऐसी तकनीकें विकसित करने पर भी काम कर रहा है, जो संभावित दुश्मनों की सैन्य क्षमताओं को कमजोर कर सकें। 'फोर्ट्रेस' के साथ-साथ 'प्रोजेक्ट मेरिडियन' जैसी पहल और एक अत्यंत गुप्त तकनीकी एजेंसी बनाने की खबरें, भविष्य के संघर्षों में अमेरिका की सैन्य श्रेष्ठता बनाए रखने के व्यापक प्रयासों की ओर इशारा करती हैं।
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'फोर्ट्रेस' का मुख्य उद्देश्य अमेरिकी सैन्य ठिकानों को नागरिक बुनियादी ढांचे (सिविलियन इंफ्रास्ट्रक्चर) पर कम निर्भर बनाना है। पेंटागन चाहता है कि किसी बड़े युद्ध के दौरान, अगर बिजली ग्रिड फेल हो जाए, पानी की आपूर्ति रुक जाए, या पारंपरिक सप्लाई रूट भरोसेमंद न रहें, तब भी ये सैन्य ठिकाने अपने जरूरी कामकाज जारी रख सकें। फॉक्स न्यूज डिजिटल से बात करते हुए, पेंटागन के मुख्य प्रवक्ता शॉन पार्नेल ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए नागरिक बुनियादी ढांचे पर निर्भर रहना एक ऐसा जोखिम है जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने आधुनिक युद्ध में बिजली के बढ़ते महत्व पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि अगर लंबे समय तक बिजली गुल रहती है, तो इससे संचार, पानी की आपूर्ति, लॉजिस्टिक्स, विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) और सैन्य कमांड सिस्टम - सब पर बुरा असर पड़ सकता है। इस पहल को फॉक्स न्यूज ने "प्रलय के दिन का प्लान" (डूम्सडे प्लान) बताया है। इसमें पोर्टेबल परमाणु रिएक्टर, बड़े पैमाने पर बैटरी स्टोरेज और माइक्रो-ग्रिड का इस्तेमाल शामिल है। इन प्रणालियों की मदद से सैन्य ठिकाने नागरिक बिजली नेटवर्क से अलग हो सकेंगे और लंबी रुकावटों के दौरान भी अपना काम जारी रख सकेंगे। यह रणनीति दर्शाती है कि अब ऊर्जा सुरक्षा को सैन्य तैयारियों का एक अहम हिस्सा माना जा रहा है। आधुनिक सैन्य अभियानों में संचार, डेटा प्रोसेसिंग, निगरानी और लॉजिस्टिक समन्वय के लिए भरोसेमंद बिजली की जरूरत होती है। इसलिए, अगर बिजली के बुनियादी ढांचे में कोई खराबी आती है, तो इसके परिणाम सिर्फ बिजली जाने तक ही सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि इसके और भी गंभीर नतीजे हो सकते हैं।
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युद्ध के दौरान सैन्य आपूर्ति की सुरक्षा के लिए रणनीतिक भंडार
'फोर्ट्रेस' (FORTRESS) एक और बड़ी कमजोरी को दूर करने का प्रयास करता है: इस बात की संभावना कि कोई वैश्विक संघर्ष जरूरी सैन्य उपकरणों और सामग्रियों की आपूर्ति को बाधित कर सकता है। पेंटागन गोला-बारूद, ईंधन, महत्वपूर्ण खनिजों, इलेक्ट्रॉनिक पुर्जों, स्पेयर पार्ट्स और चिकित्सा सामग्री का रणनीतिक भंडार बनाने की योजना बना रहा है। यदि अंतरराष्ट्रीय परिवहन नेटवर्क बाधित हो जाते हैं या विदेशी आपूर्तिकर्ताओं तक पहुंच नहीं हो पाती है, तो इस तरह का भंडार सशस्त्र बलों को अपना कामकाज जारी रखने में मदद करेगा। इस पहल में कुछ चुनिंदा निर्माताओं और आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता कम करने का प्रस्ताव भी शामिल है। इस योजना के तहत, रक्षा संबंधी महत्वपूर्ण जरूरतों के लिए कम से कम दो योग्य आपूर्ति या उत्पादन स्रोत होंगे। इससे यह जोखिम कम हो जाएगा कि किसी एक आपूर्तिकर्ता के विफल होने से सैन्य अभियान बाधित हो जाएं। खबरों के अनुसार, पेंटागन केवल भंडार बनाने से आगे बढ़कर, आपात स्थिति के दौरान जरूरी उपकरणों के निर्माण की क्षमता विकसित करने पर भी विचार कर रहा है।
27 अक्टूबर की चुनावी तारीख से पहले ईरान पर हमला चाहते थे नेतन्याहू, ट्रंप ने कहा- बिल्कुल नहीं!
दो अमेरिकी अधिकारियों और एक इजरायली सुरक्षा सूत्र का हवाला देते हुए बताया गया है कि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर जोर डाला था कि वे 27 अक्टूबर को होने वाले इजरायली चुनावों से पहले ईरान पर एक संयुक्त हमले का समर्थन करें। हालांकि, वाशिंगटन ने उनसे तब तक इंतजार करने को कहा, जब तक कि वे सैन्य कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार न हो जाएं। इजरायली सूत्र ने सीएनएन को बताया नेतन्याहू वास्तव में चाहते थे और उन्होंने चुनावों से पहले ईरान पर संयुक्त हमले के लिए ट्रंप को मनाने की कोशिश भी की, लेकिन ट्रंप ने इसके लिए हरी झंडी नहीं दी। इस मामले की जानकारी रखने वाले एक अन्य सूत्र ने बताया कि पिछले एक हफ्ते से इज़राइल, अमेरिका पर ज़ोर डाल रहा था कि वह ईरान पर इज़राइल के हमलों का समर्थन करे और संभवतः उनमें शामिल भी हो जाए। सूत्र के अनुसार, ट्रम्प और अमेरिका के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने इज़राइल से अभी रुकने के लिए कहा, साथ ही यह भी संकेत दिया कि वाशिंगटन जल्द ही संयुक्त अभियानों के लिए सहमत हो सकता है। हालाँकि, नेतन्याहू के कार्यालय ने इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया और इसे फर्जी खबर बताया, लेकिन इस बारे में कोई और जानकारी नहीं दी।
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क्या ईरान का हमला इज़राइल के चुनावों को प्रभावित कर सकता है?
सैन्य कार्रवाई के लिए यह दबाव ऐसे समय में सामने आया है, जब 27 अक्टूबर को इज़राइल में चुनाव होने वाले हैं। CNN द्वारा बताए गए इज़राइली सूत्रों के अनुसार, ट्रम्प ने तुरंत हमला करने की मंजूरी इसलिए नहीं दी, क्योंकि इज़राइल डिफेंस फोर्सेज (IDF) के चीफ ऑफ स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल इयाल ज़मीर ने चेतावनी दी थी कि हमले की वजह से 'नेसेट' (इज़राइली संसद) के चुनाव टल सकते हैं। इज़राइल ने भी वाशिंगटन के आग्रह पर कुछ समय इंतजार करने पर सहमति जताई। ऐसा मिसाइल डिफेंस को लेकर चिंताओं और इस जरूरत के कारण किया गया कि अगर ईरान - या यमन के हूथी विद्रोही - इज़राइल पर मिसाइल दागते हैं, तो उसे अमेरिकी समर्थन की आवश्यकता पड़ सकती है। इसके अलावा, सोमवार को इजरायली ब्रॉडकास्टर 'चैनल 12' ने खबर दी कि प्रधानमंत्री नेतन्याहू और ज़मीर के बीच हाल ही में एक सैन्य कार्रवाई के निर्देश को लेकर टकराव हुआ था। बताया जा रहा है कि रक्षा अधिकारियों को डर था कि इस कदम से चुनाव से ठीक पहले ईरान के साथ तेजी से टकराव शुरू हो सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, नेतन्याहू ने इस बात से इनकार किया है।
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ईरान को ट्रंप की नई चेतावनी
ये घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आए हैं जब ट्रंप ने तेहरान पर दबाव बढ़ा दिया है कि वह कोई समझौता कर ले, वरना उसे अमेरिका की नई सैन्य कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा। अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान को एक अल्टीमेटम दिया। उन्होंने एक समझौते की मांग की और चेतावनी दी कि अगर कोई समझौता नहीं हुआ, तो फिर से सैन्य कार्रवाई की जाएगी। हालांकि, रविवार को ट्रम्प ने कहा कि उन्होंने तुरंत हमला करने की संभावना को खारिज कर दिया है। इस बयान के बावजूद, अधिकारियों ने संकेत दिया है कि आदेश मिलने के 96 घंटों के भीतर बड़े सैन्य अभियान शुरू किए जा सकते हैं। संभावित संयुक्त अभियान में देरी की खबरों का मतलब यह नहीं है कि भविष्य में कोई सैन्य कार्रवाई नहीं होगी। CNN के सूत्रों के अनुसार, वाशिंगटन का रुख यह था कि इज़राइल को तब तक इंतज़ार करना चाहिए जब तक कि अमेरिका तैयार न हो जाए। अमेरिकी वरिष्ठ अधिकारियों ने संकेत दिया है कि जल्द ही संयुक्त अभियान हो सकते हैं।
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