आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर ग्लोबल सहमति बनाना बहुत जरूरी है: वैसिलियोस मिखाइल
नई दिल्ली, 19 फरवरी (आईएएनएस)। इंडिया-एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में शामिल होने के लिए दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से लोग भारत पहुंच रहे हैं। अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञ इस समिट में आकर एआई से संबंधित अपना अनुभव साझा कर रहे हैं। ग्लोबल साउथ में पहली बार इस समिट का आयोजन किया जा रहा है।
इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 को लेकर डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन की डिलीवरी यूनिट के हेड मोहम्मद डियाबी ने कहा, एआई एक ग्लोबल पहल है जिसमें अफ्रीकी देशों को शामिल होने की जरूरत है और मुझे लगता है कि यह सब इम्पैक्ट के बारे में भी है, तो हम अपने देश के कई सेक्टर, जैसे कृषि, स्वास्थ्य और दूसरे सेक्टर में चुनौतियों का सामना करने के लिए एआई का फायदा कैसे उठा सकते हैं? इसलिए हम यहां यह देखने आए हैं कि इस डोमेन के बड़े इनोवेशन क्या हैं और हम सभी स्टेकहोल्डर्स, इंस्टीट्यूशन्स और टेक्निकल पार्टनर्स के साथ पार्टनरशिप कैसे कर सकते हैं।
क्रोएशिया गणराज्य के दूतावास में पॉलिटिकल काउंसलर और डीसीएम ब्रानिमिर फार्कस ने कहा, इस समिट में प्रधानमंत्री मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने कुछ बहुत जरूरी बातें कही हैं। यह इस बारे में है कि हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल कैसे करते हैं, कि इसे हमारी सभ्यता के रास्ते में होना चाहिए।
इसके अलावा ग्रीस के डिजिटल गवर्नेंस मिनिस्ट्री के वैसिलियोस मिखाइल करकात्जूनिस ने समिट को लेकर कहा, यह इवेंट बहुत जरूरी है और यह बहुत अच्छा है कि भारत ने इसे आयोजित किया है। जैसा कि राष्ट्रपति मैक्रों ने कहा कि यह एक बहुत जरूरी पहल है। उन्होंने ग्रीस का भी साफ तौर पर जिक्र किया। हमें यहां आकर बहुत गर्व और खुशी हो रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर ग्लोबल सहमति बनाना बहुत जरूरी है। हमें किन नियमों की जरूरत है और हम इसे इंसानों के आसपास कैसे बनाना चाहते हैं? इंसानों को समर्थन देना चाहते हैं। जाहिर है उन्हें रिप्लेस नहीं करना चाहते और उस दिशा में एक्टिव कदम उठाना बहुत जरूरी है।
ग्रीस के प्रधानमंत्री के ऑफिस में डिजिटल पॉलिसी और एआई सलाहकार वासिलिस कौटसौम्पास ने कहा, हम ग्रीक डेलीगेशन को रिप्रेजेंट कर रहे हैं और मुझे लगता है कि हमने इनक्लूसिव एआई के लिए जबरदस्त समर्थन देखा है, जिसका मतलब है कि किसी को पीछे नहीं रहना चाहिए। इसका मतलब है कि टेक डिविडेंड, जो तकनीक से मिलने वाले सामाजिक और आर्थिक फायदे हैं, को हर जगह फैलाना होगा। मुझे लगता है कि यही वह पॉइंट है जिस पर प्रधानमंत्री मोदी ने जोर दिया, जिस पर प्रेसिडेंट मैक्रों ने जोर दिया और वही पॉइंट जिस पर हमारे प्रधानमंत्री किरियाकोस मित्सोटाकिस जोर दे रहे हैं।
नई दिल्ली में इटली दूतावास में मिनिस्टर काउंसलर और डिप्टी हेड ऑफ मिशन, ऑरोरा रूसी ने कहा, इटली इस समिट के भारत के आयोजन का स्वागत करता है। हम भारत के साथ बहुत सारे मूल्य शेयर करते हैं, उनमें से एक यह भी है कि इंसान सेंटर में होना चाहिए, तो यह सबसे बड़ी एक्स्ट्रा वैल्यू है जो हम सभी को इस समिट से मिल सकती है।
इसके अलावा, ग्रीक डिप्लोमैट एलेक्जेंड्रोस बौडौरिस ने कहा, मुझे प्रधानमंत्री मोदी की बातचीत बहुत दिलचस्प लगी। मैं तीन साल दिल्ली में रहा हूं। मुझे पीएम मोदी और प्रेसिडेंट मैक्रों से ये सारी अच्छी बातें सुनकर बहुत खुशी हुई। एआई के असर को लेकर ये सारी अच्छी बातें सिर्फ एक्शन के लिए ही नहीं, बल्कि इंसानियत पर इसके असर के लिए भी हैं। भारत में अपने तीन साल के समय से, मैं जानता हूँ कि भारत एक बहुत ही इंसानी सभ्यता है और मुझे लगता है कि समस्याओं को हल करने के लिए यह सबसे अच्छी जगह है।
--आईएएनएस
केके/वीसी
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दिल्ली में सरकार का एक साल पूरा, अब लोगों को “याद आ रहे केजरीवाल” के पोस्टर
दिल्ली की सियासत एक साल में काफी बदल चुकी है. यह अब दिखने लगा है. हाल ही में दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि वह सिर्फ राजनीतिक बयान नहीं था, बल्कि राजधानी की जमीनी हकीकत की तरफ इशारा था कि दिल्ली को एक साल में ही केजरीवाल याद आ रहे हैं. सौरभ भारद्वाज ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि यह वही दिल्ली है, जिसने 2025 से पहले आम आदमी पार्टी की सरकार के दौरान शिक्षा, स्वास्थ्य और बिजली-पानी के क्षेत्र में बदलाव का मॉडल देखा था. मोहल्ला क्लीनिक गरीब और मध्यम वर्ग के लिए सहारा थे. सरकारी स्कूलों के रिजल्ट और इंफ्रास्ट्रक्चर की चर्चा देश-विदेश तक होती थी. बिजली के बिल कम आए, पानी की सप्लाई बेहतर हुई. आम आदमी को लगा कि सरकार उसके दरवाजे तक आई है.
सीधे जनता की भावना से जुड़ता है
अब एक वर्ष में हालात बदल गए हैं. शहर में होर्डिंग लगे, “एक साल, दिल्ली बेहाल, याद आ रहे केजरीवाल” तो उनमें किसी का फोटो नहीं था, न ही पीएम नरेंद्र मोदी का. सिर्फ एक संदेश था, जो सीधे जनता की भावना से जुड़ता है. सवाल यह है कि अगर सब कुछ ठीक है तो फिर नाम से डर कैसा?
शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं
आज दिल्ली की गलियों में लोग पूछ रहे हैं, मोहल्ला क्लीनिक क्यों बंद या सुस्त पड़े हैं? सरकारी अस्पतालों में लाइनें लंबी क्यों हो गईं? स्कूलों में वही ऊर्जा और सुधार क्यों नहीं दिख रहा? सड़कों पर जाम अब सामान्य बात बन चुका है. प्रदूषण का स्तर कम होने के बजाय कई बार और बढ़ जाता है. कई इलाकों से पानी न आने और सफाई व्यवस्था ढीली होने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं.
फरवरी 2025 से पहले की सरकार में अरविंद केजरीवाल का नाम हर घर में एक ऐसे नेता के रूप में लिया जाता था, जिसने राजनीति की भाषा बदली. उन्होंने “वोट” के बदले “काम” की बात की. स्कूल ठीक हुए, क्लीनिक खुले, बिजली-पानी में राहत मिली. यही वजह है कि आज जब शहर में परेशानी बढ़ती दिखती है, तो लोगों को पुराना दौर याद आता है.
सड़क पर घंटों जाम में फंसे रहना पड़ता है
दिल्ली की जनता भावनाओं से ज्यादा अपने रोज़मर्रा के अनुभव से फैसला करती है. अगर सुबह घर में पानी नहीं आता, बच्चा सरकारी स्कूल में पहले जैसा माहौल नहीं पाता, क्लीनिक में डॉक्टर नहीं मिलता, सड़क पर घंटों जाम में फंसे रहना पड़ता है, तो नाराजगी स्वाभाविक है. यही नाराजगी अब होर्डिंग्स और चर्चाओं में झलक रही है. एक साल के शासन का मतलब सिर्फ सत्ता में बने रहना नहीं होता, बल्कि यह साबित करना होता है कि जनता का जीवन बेहतर हुआ. अगर राजधानी की तस्वीर में सुधार के बजाय अव्यवस्था दिखे, तो सवाल उठेंगे ही. और जब सवाल उठते हैं, तो तुलना भी होती है, उस दौर से, जब लोगों को लगता था कि सरकार उनके लिए काम कर रही है.
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