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Mahashivratri 2026: महाशिवरात्रि पर शिव आराधना से होते हैं सभी भय दूर

आज महा शिवरात्रि है, यह भगवान भोलेनाथ की अराधना का सबसे बड़ा दिन होता है, इस दिन देवों के देव महादेव की उपासना की जाती है। यह शिव और पार्वती के मिलन का प्रतीक है और प्रभु की पूजा से भक्त सभी प्रकार के भय से मुक्त होते हैं तो आइए हम आपको महा शिवरात्रि व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं। 

जानें महा शिवरात्रि के बारे में 

हिंदू धर्म में महाशिवरात्रि का पावन पर्व महत्वपूर्ण माना जाता है। यह त्योहार फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है, इसलिए इस तिथि पर पूजा-अर्चना करने का विशेष महत्व होता है। शास्त्रों के अनुसार महाशिवरात्रि पर की गई शिव उपासना से साधक का भाग्योदय होता है और मन से सभी तरह का डर भय भी दूर होते हैं। महाशिवरात्रि के शुभ अवसर पर दान का भी विशेष महत्व माना गया है और इसके प्रभाव से पापों का नाश और दुर्भाग्य दूर होता है। इस वर्ष महाशिवरात्रि पर सर्वार्थ सिद्धि योग का संयोग बना हुआ है, यह सबसे शुभ और सफलता का प्रतीक है। इस समय किए गए दान-पुण्य का फल साधक को अवश्य मिलता है। महा शिवरात्रि पर्व पर ये बात लागू नहीं होती क्योंकि इस पर्व में रात्रि की पूजा का महत्व होता है। ऐसे में जिस दिन शिवरात्रि की चतुर्दशी तिथि रात के समय मौजूद होती है उसी दिन शिवरात्रि पर्व मनाना ज्यादा उचित माना जाता है।

महा शिवरात्रि का शुभ मुहूर्त

हिन्दू पंचांग के अनुसार महा शिवरात्रि की पावन तिथि 15 फरवरी 2026 की शाम 05:04 बजे से शुरू होकर 16 फरवरी 2026 की शाम 05:34 बजे तक रहेगी। चूंकि 15 फरवरी 2026 की रात में चतुर्दशी तिथि मौजूद रहेगी इसलिए महा शिवरात्रि का पावन पर्व 15 फरवरी 2026, रविवार को मनाया जाएगा।

इसे भी पढ़ें: Mahashivratri 2026: जानें महादेव की पूजा के Special Rules और रात्रि जागरण का महत्व

महा शिवरात्रि पर इस मुहूर्त में करें पूजा, होगा लाभ

महा शिवरात्रि की पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त 15 फरवरी 2026 की देर रात 12 बजकर 9 मिनट से रात 1 बजकर 1 मिनट तक रहेगा। ये निशिता काल है जो शिवरात्रि पूजन के लिए सबसे शुभ समय माना जाता है। इसके अलावा कई लोग रात्रि के चारों प्रहर में शिव पूजा करते हैं। 

महा शिवरात्रि पूजा में शामिल करें ये सामग्री 

पंडितों के अनुसार महा शिवरात्रि की पूजा में बेलपत्र, अक्षत, गाय का दूध, पान के पत्ते, सुपारी, जनेऊ, चावल, शक्कर, सफेद बूरा, शहद, इलाइची, लौंग, गंगाजल, मदार के फूल, धतूरा, भांग, सफेद फूल, पांच प्रकार के मौसमी फल, फूल, माला, शमी के पत्ते, केसर, इत्र, सफेद चंदन, गन्ने का रस, मिठाई या चूरमा का भोग अवश्य शामिल करें। 

महाशिवरात्रि पर ऐसे करें पूजा, होंगे लाभन्वित 

शास्त्रों के अनुसार महा शिवरात्रि के दिन सुबह जल्दी उठकर व्रत का संकल्प लें। पूजा के लिए एक चौकी की स्थापना करें और उस पर पीला या लाल रंग का साफ कपड़ा बिछाएं। फिर इस चौकी पर थोड़े चावल रखें और भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित करें। एक मिट्टी या तांबे का कलश लेकर उस पर स्वास्तिक बनाएं और उसमें थोड़ा गंगाजल और शुद्ध जल मिला लें। साथ ही इसमें सुपारी, सिक्का और हल्दी की गांठ डालें। शिव जी के समक्ष गाय के घी का दीपक जलाएं और साथ ही एक छोटा शिवलिंग स्थापित करें। अगर घर में शिवलिंग नहीं है तो मिट्टी से इसे तैयार कर लें। शिवलिंग का जल, दूध या पंचामृत से अभिषेक करें। मन ही मन ओम नम: शिवाय मंत्र का जाप करते रहें। इसके बाद शिवलिंग को साफ कपड़े से पोंछकर उस पर बेलपत्र, धतूरा, भांग, शमी के फूल और फल-फूल आदि चढ़ाएं।  फिर महा शिवरात्री की कथा पढ़ें और कपूर से भगवान शिव की आरती करें। इसके बाद मिठाई, खीर और फल का भोग लगाएं। पूजा संपन्न होने के बाद सभी में प्रसाद बांट दें।

महाशिवरात्रि के दिन इन चीजों का करें दान 

शास्त्रों के अनुसार महाशिवरात्रि पर सफेद वस्तुओं का दान करना बेहद शुभ होता है। इससे मन को शांति मिलती है। साथ ही महादेव प्रसन्न होते हैं। इस दिन आप काले तिल का दान कर सकते हैं। यह सभी तरह के ग्रह दोषों को शांत करता है। काली दाल का दान करने से शनि और राहु से जुड़े दोष दूर होते हैं। वस्त्र दान सदैव श्रेष्ठ कर्म माना गया है। इसके प्रभाव से जीवन में शांति और संतोष बढ़ता है। आप महाशिवरात्रि के दिन घी और गुड़ का दान भी कर सकते हैं। इससे भाग्योदय होता है। इस दिन पर सुहागिन महिलाओं को श्रृंगार सामग्री का दान करना पुण्यदायी होता है। चावल का दान करने से घर में अन्न-धन बढ़ता है।

महाशिवरात्रि के दिन ये करें, शिव जी होंगे प्रसन्न 

पंडितों के अनुसार व्रत रखने वालों को त्रयोदशी तिथि से ही नियमों का ख्याल रखना चाहिए। इस दिन केवल सात्विक भोजन करना चाहिए। और अगले दिन सुबह स्नानादि करके व्रत का संकल्प अवश्य करना चाहिए। महाशिवरात्रि के दिन चार पहर की पूजा का विशेष महत्व होता है। ऐसे में व्रती को इस दिन चार पहर की पूजा अवश्य करनी चाहिए। साथ ही शिव जी के मंत्रों का जाप भी करें। व्रती को रात्रि के समय शिवजी की विशेष पूजा अर्चना करनी चाहिए। इस दिन निशीथ काल तक भगवान शिव के भजन करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। महाशिवरात्रि का व्रत फलाहार करके रखना चाहिए। साथ ही, इस दिन शिवजी का अभिषेक भी अवश्य करें और उन्हें बेलपत्र, धतूरा आदि अर्पित करें। महिलाओं को शिवरात्रि के दिन माता पार्वती को सुहाग की सामग्री अर्पित करनी चाहिए। ऐसा करने से दांपत्य जीवन सुखद बना रहता है। महाशिवरात्रि व्रत के दिन शाम के समय सात्विक भोजन किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए साधारण नमक की बजाए सेंधा नमक का प्रयोग करना चाहिए।

महाशिवरात्रि व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा भी है खास

अग्निपुराण समेत कई शास्त्रों में महाशिवरात्रि व्रत कथा का उल्लेख है। कथा अनुसार, चिरकाल में निषादों के राजा सुंदरसेन ने अनजाने में फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर भगवान शिव की पूजा की। इस समय उनका अभिषेक किया और रात्रि जागरण कर शिव शक्ति की साधना की। इस व्रत के पुण्य-प्रताप से निषादों के राजा सुंदरसेन को मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति हुई। साथ ही यमलोक में उन्हें उच्च स्थान मिला। इस व्रत को करने से व्यक्ति विशेष को यम यातना से भी मुक्ति मिलती है।

महाशिवरात्रि व्रत पर ऐसे करें पारण 

पंडितों के अनुसार रविवार 15 फरवरी को व्रत रख अपनी सुविधा अनुसार समय पर शिव शक्ति की पूजा करें। वहीं, महाशिवरात्रि व्रत का पारण 16 फरवरी को सुबह 06 बजकर 53 मिनट से लेकर दोपहर 03 बजकर 16 मिनट के मध्य कर सकते हैं। इस समय स्नान-ध्यान के बाद विधिवत शिव-शक्ति की पूजा करें। वहीं, पूजा के बाद अन्न-धन का दान कर पारण करें।

- प्रज्ञा पाण्डेय

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Mahashivratri 2026: जानें महादेव की पूजा के Special Rules और रात्रि जागरण का महत्व

महाशिवरात्रि का व्रत फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को किया जाता है। सृष्टि के प्रारम्भ में इसी दिन मध्य रात्रि भगवान शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था। भगवान शिव और उनका नाम समस्त मंगलों का मूल है। वे कल्याण की जन्मभूमि तथा परम कल्याणमय हैं। समस्त विद्याओं के मूल स्थान भी भगवान शिव ही हैं। ज्ञान, बल, इच्छा और क्रिया शक्ति में भगवान शिव के जैसा कोई नहीं है। वे सभी के मूल कारण, रक्षक, पालक तथा नियन्ता होने के कारण महेश्वर कहे जाते हैं। उनका आदि और अंत न होने से वे अनंत हैं। वे शीघ्र प्रसन्न होकर अपने भक्तों के सम्पूर्ण दोषों को क्षमा कर देते हैं तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, ज्ञान, विज्ञान के साथ अपने आपको भी दे देते हैं। देवों के देव महादेव के इस व्रत का विशेष महत्व है। इस व्रत को हर कोई कर सकता है। 

विधान− त्रयोदशी को एक बार भोजन करके चतुर्दशी को दिन भर निराहार रहना पड़ता है। पत्र पुष्प तथा सुंदर वस्त्रों से मंडप तैयार करके वेदी पर कलश की स्थापना करके गौरी शंकर की स्वर्ण मूर्ति तथा नंदी की चांदी की मूर्ति रखनी चाहिए। कलश को जल से भरकर रोली, मोली, चावल, पान, सुपारी, लौंग, इलाइची, चंदन, दूध, घी, शहद, कमलगट्टा, धतूरा, बेल पत्र आदि का प्रसाद शिव को अर्पित करके पूजा करनी चाहिए। रात को जागरण करके चार बार शिव आरती का विधान जरूरी है। दूसरे दिन प्रातः जौ, तिल, खीर तथा बेलपत्र का हवन करके ब्राह्मणों को भोजन करवाकर व्रत का पारण करना चाहिए।

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शिवरात्रि के प्रदोष काल में स्फटिक शिवलिंग को शुद्ध गंगा जल, दूध, दही, घी, शहद व शक्कर से स्नान करवाकर धूप−दीप जलाकर निम्न मंत्र का जाप करने से समस्त बाधाओं का अंत होता है। शिवरात्रि को एक मुखी रूद्राक्ष को गंगाजल से स्नान करवाकर धूप−दीप दिखा कर तख्ते पर स्वच्छ कपड़ा बिछाकर स्थापित करें। शिव रूप रूद्राक्ष के सामने बैठ कर सवा लाख मंत्र जप का संकल्प लेकर जाप आरंभ करने से काफी लाभ होता है। शिवरात्रि को रूद्राष्टक का पाठ करने से शत्रुओं से मुक्ति मिलती है तथा मुक़दमे में जीत व समस्त सुखों की प्राप्ति होती है।

भगवान शंकर पर चढ़ाया गया नैवेद्य को खाना निषिद्ध है। जो इस नैवेद्य को खाता है वह नरक को प्राप्त होता है। इस कष्ट के निवारण के लिए शिव की मूर्ति के पास शालिग्राम की मूर्ति रखते हैं। यदि शिव की मूर्ति के पास शालिग्राम की मूर्ति होगी तो नैवेद्य खाने पर कोई दोष नहीं रह जाता है।

शिव पूजा में केतकी पुष्प का निषेध है

एक बार ब्रह्मा−विष्णु में परस्पर विवाद हुआ कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है? उसी समय एक अखण्ड ज्योति लिंग के रूप में प्रकट हुई तथा आकाशवाणी हुई कि आप दोनों इस लिंग के ओर−छोर का पता लगायें। जो पहले पता लगायेगा, वही श्रेष्ठ होगा। विष्णु पाताल की ओर गये और ब्रह्मा ऊपर की ओर। विष्णु थककर वापस आ गये।

ब्रह्माजी शिव के मस्तक से गिरे हुये केतकी पुष्प को लेकर ऊपर से लौट आये और विष्णु से कहा कि यह केतकी पुष्प मैंने लिंग के मस्तक से प्राप्त किया है। केतकी पुष्प ने भी ब्रह्माजी के पक्ष में विष्णु को असत्य साक्ष्य दिया। इस पर भगवान शिव प्रकट हो गये और उन्होंने असत्यभाषिणी केतकी पर क्रुद्ध होकर उसे सदा के लिए त्याग दिया। तब ब्रह्माजी ने भी लज्जित होकर भगवान विष्णु को नमस्कार किया। उसी दिन से भगवान शंकर की पूजा में केतकी पुष्प के चढ़ाने का निषेध हो गया।

भगवान शिव और उनका नाम समस्त मंगलों का मूल है। वे कल्याण की जन्मभूमि तथा परम कल्याणमय हैं। समस्त विद्याओं के मूल स्थान भी भगवान शिव ही हैं। ज्ञान, बल, इच्छा और क्रिया शक्ति में भगवान शिव के जैसा कोई नहीं है। वे सभी के मूल कारण, रक्षक, पालक तथा नियन्ता होने के कारण महेश्वर कहे जाते हैं। उनका आदि और अंत न होने से वे अनंत हैं। वे सभी पवित्रकारी पदार्थों को भी पवित्र करने वाले हैं। वे शीघ्र प्रसन्न होकर अपने भक्तों के सम्पूर्ण दोषों को क्षमा कर देते हैं तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, ज्ञान, विज्ञान के साथ अपने आपको भी दे देते हैं।

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