मार्क जुकरबर्ग से माफी मांग रही सरकार, महुआ मोइत्रा बोलीं- ब्लैकमेल से डरना मत, कोई पहाड़ नहीं टूट गया
इससे पहले संसद की आईटी मामलों की स्थायी समिति के अध्यक्ष निशिकांत दुबे ने कहा है कि मेटा प्रमुख मार्क जुकरबर्ग को इस घटना के लिए व्यक्तिगत रूप से माफी मांगनी चाहिए। मामला पीएम मोदी के वीडियो से जुड़ा है।
भगवान शिव के तीसरे नेत्र का रहस्य: जानिए प्रलय और ज्ञान की इस महागाथा को
Lord Shiva third eye story: हिंदू पौराणिक कथाओं में भगवान शिव को 'त्रिनेत्रधारी' (तीन नेत्रों वाले) के रूप में पूजा जाता है। उनके माथे पर सुशोभित तीसरा नेत्र सामान्य नेत्र नहीं है, बल्कि यह प्रलय, दिव्य ज्ञान और सर्वोच्च चेतना का प्रतीक है। जब भी सृष्टि पर कोई बड़ा संकट आता है या अधर्म अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाता है, तब भगवान शिव अपने इस तीसरे नेत्र को खोलते हैं। आइए जानते हैं कि शिवजी का यह तीसरा नेत्र पहली बार कब और किन परिस्थितियों में खुला था।
कामदेव का दहन और तीसरा नेत्र खुलने की कथा
शिव पुराण के अनुसार, सती के योगाग्नि में भस्म होने के बाद भगवान शिव गहरी और लंबी समाधि में लीन हो गए थे। उस समय तारकासुर नामक असुर के आतंक से तीनों लोक त्राहिमाम कर रहे थे। ब्रह्मा जी का वरदान था कि शिव पुत्र ही तारकासुर का वध कर सकता है, लेकिन शिवजी की समाधि टूटना असंभव प्रतीत हो रहा था।
देवताओं के अनुरोध पर कामदेव (कामदेवता) ने शिवजी की समाधि भंग करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने वसंत ऋतु का सृजन कर अपनी पुष्प बाण से भगवान शिव की ओर प्रहार किया। जैसे ही कामदेव का बाण शिवजी को लगा, उनकी समाधि टूट गई। अपनी साधना में इस प्रकार बाधा उत्पन्न होने से महादेव अत्यंत क्रोधित हो गए।
क्रोध की अग्नि में भगवान शिव ने अपने माथे पर स्थित तीसरा नेत्र खोल दिया। उस त्रिनेत्र से निकली दिव्य और प्रलयकारी अग्नि की एक ही चिंगारी से कामदेव तत्काल जलकर भस्म हो गए। कामदेव के भस्म होने के बाद उनकी पत्नी रती के विलाप और देवताओं की प्रार्थना पर शिवजी का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने कामदेव को पुनः जीवित होने का आशीर्वाद दिया।
तृतीय नेत्र का आध्यात्मिक और दार्शनिक महत्व
धार्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से भगवान शिव का तीसरा नेत्र केवल विनाश का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह आंतरिक ज्ञान और अहंकार के नाश का संदेश देता है। हमारे दोनों सामान्य नेत्र इस बाहरी भौतिक संसार को देखते हैं, लेकिन तीसरा नेत्र व्यक्ति को उसकी आत्मा, सत्य और परमात्मा की ओर ले जाता है। जब मनुष्य अपने भीतर के अज्ञान और अहंकार को भस्म कर देता है, तभी उसके भीतर दिव्य दृष्टि का मार्ग खुलता है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई कथा पौराणिक ग्रंथों और शिव पुराण की मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य पाठकों तक सनातन धर्म की पावन कथाओं और उनके दार्शनिक संदेशों को पहुंचाना है।
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