भगवान शिव के तीसरे नेत्र का रहस्य: जानिए प्रलय और ज्ञान की इस महागाथा को
Lord Shiva third eye story: हिंदू पौराणिक कथाओं में भगवान शिव को 'त्रिनेत्रधारी' (तीन नेत्रों वाले) के रूप में पूजा जाता है। उनके माथे पर सुशोभित तीसरा नेत्र सामान्य नेत्र नहीं है, बल्कि यह प्रलय, दिव्य ज्ञान और सर्वोच्च चेतना का प्रतीक है। जब भी सृष्टि पर कोई बड़ा संकट आता है या अधर्म अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाता है, तब भगवान शिव अपने इस तीसरे नेत्र को खोलते हैं। आइए जानते हैं कि शिवजी का यह तीसरा नेत्र पहली बार कब और किन परिस्थितियों में खुला था।
कामदेव का दहन और तीसरा नेत्र खुलने की कथा
शिव पुराण के अनुसार, सती के योगाग्नि में भस्म होने के बाद भगवान शिव गहरी और लंबी समाधि में लीन हो गए थे। उस समय तारकासुर नामक असुर के आतंक से तीनों लोक त्राहिमाम कर रहे थे। ब्रह्मा जी का वरदान था कि शिव पुत्र ही तारकासुर का वध कर सकता है, लेकिन शिवजी की समाधि टूटना असंभव प्रतीत हो रहा था।
देवताओं के अनुरोध पर कामदेव (कामदेवता) ने शिवजी की समाधि भंग करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने वसंत ऋतु का सृजन कर अपनी पुष्प बाण से भगवान शिव की ओर प्रहार किया। जैसे ही कामदेव का बाण शिवजी को लगा, उनकी समाधि टूट गई। अपनी साधना में इस प्रकार बाधा उत्पन्न होने से महादेव अत्यंत क्रोधित हो गए।
क्रोध की अग्नि में भगवान शिव ने अपने माथे पर स्थित तीसरा नेत्र खोल दिया। उस त्रिनेत्र से निकली दिव्य और प्रलयकारी अग्नि की एक ही चिंगारी से कामदेव तत्काल जलकर भस्म हो गए। कामदेव के भस्म होने के बाद उनकी पत्नी रती के विलाप और देवताओं की प्रार्थना पर शिवजी का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने कामदेव को पुनः जीवित होने का आशीर्वाद दिया।
तृतीय नेत्र का आध्यात्मिक और दार्शनिक महत्व
धार्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से भगवान शिव का तीसरा नेत्र केवल विनाश का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह आंतरिक ज्ञान और अहंकार के नाश का संदेश देता है। हमारे दोनों सामान्य नेत्र इस बाहरी भौतिक संसार को देखते हैं, लेकिन तीसरा नेत्र व्यक्ति को उसकी आत्मा, सत्य और परमात्मा की ओर ले जाता है। जब मनुष्य अपने भीतर के अज्ञान और अहंकार को भस्म कर देता है, तभी उसके भीतर दिव्य दृष्टि का मार्ग खुलता है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई कथा पौराणिक ग्रंथों और शिव पुराण की मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य पाठकों तक सनातन धर्म की पावन कथाओं और उनके दार्शनिक संदेशों को पहुंचाना है।
पंजाब सरकार पर हाई कोर्ट का चाबुक: विज्ञापनों पर लगी रोक, 15 दिनों में कर्मचारियों का DA चुकाने की सख्त हिदायत!
पंजाब सरकार और पंजाब स्टेट पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (PSPCL) द्वारा सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों को केंद्र सरकार के पैटर्न पर दिए जाने वाले महंगाई भत्ते और महंगाई राहत की बकाया किस्तों का भुगतान न करने का मामला हाई कोर्ट पहुंचा था। एकल पीठ द्वारा दिए गए आदेश के खिलाफ पंजाब सरकार ने डिविजन बेंच में अपील दायर की थी।
मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट की डिविजन बेंच ने राज्य सरकार और PSPCL की सभी अपीलों को खारिज करते हुए एकल पीठ के फैसले को बरकरार रखा और तय समय सीमा में भुगतान करने के कड़े निर्देश दिए।
विज्ञापनों के खर्च पर रोक, 15 दिनों में बकाया चुकाने का आदेश
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि जब तक कर्मचारियों और पेंशनरों के सभी बकायों का भुगतान नहीं हो जाता, तब तक सरकार बड़े पैमाने पर चलने वाले विज्ञापन अभियानों के खर्च पर रोक लगाए। अदालत ने कहा कि विज्ञापन जैसे खर्च कर्मचारियों के वैध बकायों का भुगतान टालने का आधार नहीं बन सकते।
अदालत ने समय सीमा में संशोधन करते हुए आदेश दिया कि समस्त बकाया राशि एक पखवाड़े (15 दिनों) के भीतर जारी की जाए। यदि निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं होता है, तो बकाया राशि पर 6 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज देना होगा।
संविधान के अनुच्छेद 14 का हवाला, चयनात्मक व्यवहार को बताया मनमाना
हाई कोर्ट ने फैसले के दौरान संविधान के अनुच्छेद 14 का हवाला देते हुए कहा कि जब एक ही सरकारी खजाने से अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों को केंद्र की दरों पर पूरा DA दिया जा रहा है, तब अन्य राज्य कर्मचारियों का बकाया रोकना अनुचित और भेदभावपूर्ण है। अदालत ने स्पष्ट किया कि 18 जून 2021 के निर्णय के आधार पर सरकार ने केंद्र सरकार के DA/DR पैटर्न को अपनाया था, इसलिए एक बार अपनाए गए मानक का लाभ कर्मचारियों से वापस नहीं छीना जा सकता।
'वित्तीय बोझ का तर्क कानूनन स्वीकार्य नहीं', मुख्य सचिव से मांगी अनुपालन रिपोर्ट
हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के वित्तीय संकट वाले तर्क को खारिज करते हुए कहा कि न्यायिक समीक्षा के तहत दिए गए यह निर्देश वित्तीय नीति में अनुचित हस्तक्षेप नहीं हैं और राज्य द्वारा 'वित्तीय बोझ' का तर्क कानूनन स्वीकार्य नहीं है। इसके साथ ही PSPCL की अलग कानूनी पहचान होने की आड़ में DA रोकने की दलील को भी खारिज कर दिया गया।
डिविजन बेंच ने पंजाब सरकार के मुख्य सचिव को आदेश का पूर्ण पालन सुनिश्चित करने और अगस्त 2026 के अंत तक शपथ पत्र के माध्यम से अनुपालन रिपोर्ट हाई कोर्ट रजिस्ट्री में दाखिल करने का निर्देश दिया है।
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