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बांग्लादेश चुनाव सीरीज पार्ट-2:शेख हसीना और खालिदा जिया ने मिलकर राष्ट्रपति को हटाया, फिर जीवनभर दोनों ने दुश्मनी निभाई
राष्ट्रपति जियाउर रहमान की हत्या के बाद बांग्लादेश की राजनीति में उथल-पुथल मच गई। 1982 के मार्च में सेना प्रमुख हुसैन मोहम्मद इरशाद ने तख्तापलट कर सत्ता अपने हाथ में ले ली। देशभर में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया, संसद भंग हो चुकी थी, संविधान को निलंबित कर दिया गया। साथ ही सभी राजनीतिक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। एक साल बाद इरशाद खुद राष्ट्रपति बन गए। इसके बाद शेख मुजीब की बेटी हसीना और जियाउर रहमान की पत्नी खालिदा की राजनीति में एंट्री हुई, फिर दोनों ने मिलकर इरशाद को पद छोड़ने पर मजबूर किया। पार्ट-2 में हसीना और खालिदा की दोस्ती से दुश्मनी तक की कहानी पढ़िए… साल- 1981 पिता की विरासत संभालने बांग्लादेश पहुंची हसीना बांग्लादेश में राष्ट्रपति जियाउर रहमान की हत्या हो चुकी थी। देश अस्थिरता के दौर से गुजर रहा था। तब अवामी लीग के नेताओं ने महसूस किया कि पार्टी को फिर से खड़ा करने के लिए किसी ऐसे चेहरे की जरूरत है, जो शेख मुजीब की विरासत से जुड़ा हो। रहमान ने 1975 में शेख हसीना के देश लौटने पर रोक लगा दी थी। ऐसे में निर्वासन में रहते हुए ही उन्हें अवामी लीग का अध्यक्ष बनाया गया। इसके बाद उपराष्ट्रपति सत्तार ने हसीना को बांग्लादेश आने की इजाजत दे दी। वे भारत से बांग्लादेश लौटीं। यह पहला मौका था जब वे 1977 में पिता की हत्या के बाद देश पहुंचीं। इसके बाद शेख हसीना ने सड़कों पर उतरकर अपनी राजनीति शुरू की। साल- 1981 खालिदा जिया की राजनीति में एंट्री खालिदा जिया राजनीति से लगभग दूर थीं। घर, बच्चे और औपचारिक सार्वजनिक कार्यक्रम, बस यही उनकी दुनिया थी। लेकिन पति की मौत के साथ ही यह दुनिया टूट गई। 36 साल की उम्र में खालिदा जिया विधवा हो गईं। उधर रहमान की गैरमौजूदगी में पार्टी में ऐसा कोई चेहरा नहीं था जो उसे एकजुट रख सके। पार्टी कई गुटों में बंट गई थी और कोई भी गुट इतना मजबूत नहीं था कि बाकी सब उसे स्वीकार कर लें। सब अपने-अपने नेता बनाना चाहते थे। उधर, शेख हसीना अवामी लीग की कमान संभाल चुकीं थीं। ऐसे में BNP में खालिदा जिया का नाम उभरा। वे अपने पति की राजनीतिक विरासत लेकर लौटी थीं। यानी मुकाबला अब ‘मुजीब की बेटी बनाम जिया की पत्नी’ का बनने लगा था। पति की मौत के 1 साल के बाद जिया की पार्टी में एंट्री हुई। दो साल बाद 1984 में उन्हें पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया। तीसरा चुनाव– 1986 लोकतंत्र के नाम पर चुनाव, लेकिन असली ताकत फौज के पास आर्मी चीफ इरशाद ने भले ही सत्ता अपने कंट्रोल में ले लिया था लेकिन उन पर इंटरनेशनल प्रेशर बढ़ रहा था। ऐसे में उन्होंने वही रास्ता चुना जो उनसे पहले जियाउर रहमान ने चुना था। चुनाव के जरिए सत्ता को वैधता देना। इसी मकसद से इरशाद ने जातीय पार्टी बनाई थी। इसके बाद 7 मई 1986 को बांग्लादेश में तीसरा आम चुनाव कराया गया। हालांकि यह चुनाव शुरू से ही विवादों में रहा। अवामी लीग ने तय किया कि वह चुनाव में हिस्सा लेंगी, जबकि BNP ने इसका बहिष्कार किया। उस समय अवामी लीग की कमान शेख हसीना के हाथ में थी। चुनाव के नतीजे पूरी तरह इरशाद के पक्ष में गए। जातीय पार्टी को 153 सीटें, अवामी लीग को 76 सीटें मिलीं। इरशाद ने राष्ट्रपति रहते हुए संसद और सरकार दोनों पर नियंत्रण कायम कर लिया। चुनाव के बाद उन्होंने मार्शल लॉ औपचारिक रूप से हटाने की घोषणा की, लेकिन देश की असली ताकत सेना के हाथ में ही बनी रही। चौथा चुनाव- 1988 खालिदा जिया और शेख हसीना ने साथ मिलकर लड़ाई लड़ी 1986 का चुनाव कराने के बाद इरशाद को उम्मीद थी कि इंटरनेशनल प्रेशर कम हो जाएगा और उनकी सत्ता को वैधता मिल जाएगी, लेकिन इसका उल्टा हुआ और चुनाव को नकली माना गया। सड़क से लेकर संसद तक आंदोलन जारी रहा। ऐसे में साल 1988 में इरशाद ने फिर से चुनाव कराने का ऐलान किया। हालांकि इस बार BNP की तरह अवामी लीग ने भी चुनाव का बहिष्कार कर दिया। अगले 2 साल देश में विरोध प्रदर्शन का सिलसिला जारी रहा। अक्टूबर 1990 में ढाका यूनिवर्सिटी के छात्रों ने सड़कों पर उतरना शुरू किया। देखते-देखते स्कूल, कॉलेज, मेडिकल छात्र सब जुड़ गए। नवंबर आते-आते हालात खराब हो चुके थे। पुलिस ने कई प्रदर्शनों पर सीधे गोलियां चलाईं। कई रिपोर्ट्स में 100 से ज्यादा छात्रों की मौत का दावा किया गया। कहा जाता है कि यही वो पल था जब छात्र नेताओं ने दोनों दलों से साफ कहा कि अगर खालिदा जिया और शेख हसीना उन्हें समर्थन देने के लिए एकसाथ नहीं आईं, तो यह आंदोलन मर जाएगा। खालिदा जिया और शेख हसीना ने पहली बार एक साझा विपक्षी मोर्चा बनाया। रैलियां तय हुईं, हड़तालें घोषित की गईं और दोनों ने सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे का समर्थन किया। कई जगह वे एक ही जुलूस का हिस्सा बनीं। बांग्लादेश की राजनीति में ऐसा पहली बार हो रहा था। पांचवां चुनाव- 1991 खालिदा जिया ने शेख हसीना को हराया खालिदा जिया और शेख हसीना जब एक साथ सड़कों पर उतरीं, तभी तय हो गया था कि इरशाद ज्यादा दिन टिक नहीं पाएंगे। आखिरकार इरशाद को राष्ट्रपति पद छोड़ना पड़ा और देश की जिम्मेदारी एक कार्यवाहक सरकार को सौंप दी गई। इसके बाद 1991 में चुनाव हुए। इस चुनाव का महत्व सिर्फ इस बात में नहीं था कि कौन जीतेगा, बल्कि इस सवाल में था कि देश चलेगा कैसे। जब शेख मुजीबुर रहमान ने एकदलीय व्यवस्था लागू की, तो सत्ता राष्ट्रपति के इर्द-गिर्द सिमटने लगी। उनकी हत्या के बाद हालात और बिगड़े। सेना सीधे सत्ता में आ गई और जियाउर रहमान और फिर हुसैन मोहम्मद इरशाद के दौर में राष्ट्रपति पद ही असली ताकत का सेंटर बन गया। धीरे-धीरे जनता के मन में यह धारणा बैठ गई कि जब राष्ट्रपति सबसे ताकतवर होता है, तो वही पद तानाशाही का रास्ता बन जाता है। ऐसे में 1991 का चुनाव सिर्फ सरकार बनाने की नहीं थी। राष्ट्रपति के हाथ में सारी ताकत आने से रोकने की थी। खालिदा जिया और शेख हसीना एक ही निष्कर्ष पर पहुंचीं कि अगर राष्ट्रपति के पास ज्यादा ताकत रही, तो सेना के लिए राजनीति में लौटना हमेशा आसान रहेगा। 1991 के चुनाव के बाद राष्ट्रपति के अधिकार सीमित कर दिए गए और देश को फिर से पूरी तरह संसदीय व्यवस्था में ले जाया गया। असली सत्ता प्रधानमंत्री और संसद के पास आ गई। भारत की ही तरह बांग्लादेश में राष्ट्रपति औपचारिक पद बन गया। 1990 के बाद, बांग्लादेश में लोकतांत्रिक चुनाव शुरू हुए, जहां हसीना और खालिदा जिया बारी-बारी से सत्ता में आईं। 1991 के चुनाव में BNP ने 140 सीटें जीतीं। खालिदा जिया 20 मार्च 1991 को पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। खालिदा जिया के जन्मदिन पर विवाद खालिदा जिया पर एक आरोप यह भी था कि उन्होंने अपनी जन्मतिथि गलत बताकर 15 अगस्त, जो शेख हसीना के लिए शोक का दिन है, उसे अपने जन्मदिन के रूप में मनाया। इस मामले में अदालत ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट भी जारी किया। छठा चुनाव- 1996 सिर्फ 12 दिन चल पाई सरकार 1991 में सत्ता में आने के बाद खालिदा जिया की सरकार से लोगों को उम्मीद थी कि सैन्य शासन के लंबे दौर के बाद लोकतंत्र मजबूत होगा। शुरुआत में हालात ठीक भी रहे, लेकिन जैसे-जैसे कार्यकाल आगे बढ़ा, सरकार और विपक्ष के बीच टकराव बढ़ता गया। अवामी लीग का आरोप था कि खालिदा जिया की सरकार रहते हुए निष्पक्ष चुनाव कराना संभव नहीं है। पार्टी लगातार यह मांग करती रही कि चुनाव एक तटस्थ कार्यवाहक सरकार के तहत कराए जाएं, लेकिन सरकार ने इस मांग को संविधान के खिलाफ बताते हुए खारिज कर दिया। इसी तनाव के बीच 15 फरवरी 1996 को आम चुनाव करा दिए गए। अवामी लीग और अधिकांश विपक्षी दलों ने चुनाव का बहिष्कार कर दिया। कई सीटों पर वोटिंग ही नहीं हुई और जहां हुई भी, वहां मतदाता बेहद कम नजर आए। सिर्फ 21 प्रतिशत मतदान हुआ। नतीजतन, BNP ने भारी जीत दर्ज कर ली और खालिदा जिया एक बार फिर प्रधानमंत्री बन गईं। अवामी लीग ने इस सरकार को मानने से इनकार कर दिया। विरोध प्रदर्शन और उग्र हो गए। अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने भी इस चुनाव को लेकर सवाल उठाए। हालात इतने बिगड़ गए कि खालिदा जिया को समझ आ गया कि बिना समझौते के आगे बढ़ना संभव नहीं है। आखिरकार भारी दबाव के बाद संसद भंग की गई। यह सरकार सिर्फ 12 दिन चल पाई। सातवां चुनाव- 1996 शेख हसीना पहली बार बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनीं इसके बाद संविधान में संशोधन कर चुनाव तटस्थ कार्यवाहक सरकार के तहत कराने की व्यवस्था की गई। जून 1996 में नए सिरे से चुनाव कराए गए। इस बार पूरा विपक्ष मैदान में था और मुकाबला सीधा खालिदा जिया और शेख हसीना के बीच था। 12 जून 1996 को हुए इस चुनाव में नतीजे बेहद करीबी रहे। अवामी लीग सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जबकि BNP थोड़े अंतर से पीछे रह गई। अवामी लीग ने 146 सीटें जीतीं। किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, लेकिन अवामी लीग ने छोटे दलों और निर्दलीय सांसदों का समर्थन जुटा लिया। हसीना 23 जून 1996 को पहली बार बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनीं। कल पार्ट-3 में पढ़िए… शेख हसीना-खालिदा के तकरार और तख्तापलट की कहानी… --------------------------- ये खबर भी पढ़ें… बांग्लादेश चुनाव सीरीज पार्ट-1: आजादी के हीरो शेख मुजीब ताकत मिलते ही तनाशाह बने, जिस सेना को ताकतवर बनाया उसी ने हत्या की सेना के कुछ जूनियर अफसरों ने राष्ट्रपति शेख मुजीबुर रहमान के तीन घरों पर एकसाथ हमला कर दिया। फायरिंग सुनकर मुजीब सीढ़ियों से उतरने लगे। इससे पहले वे कुछ समझ पाते, उन पर गोलियां बरसा दी गईं। पूरी खबर पढ़ें…
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