भारत की रूसी तेल खरीद से जुड़ा 25 प्रतिशत टैरिफ हटाएगा अमेरिका: व्हाइट हाउस
वॉशिंगटन, 2 फरवरी (आईएएनएस)। अमेरिका, भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल की खरीद बंद करने पर सहमति जताने के बाद, इससे जुड़े 25 प्रतिशत टैरिफ को हटाएगा। व्हाइट हाउस ने सोमवार को यह जानकारी दी।
व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने आईएएनएस से कहा, “भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद समाप्त करने के समझौते के तहत रूसी तेल से जुड़ा 25 प्रतिशत टैरिफ हटा लिया जाएगा।” यह बयान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुई फोन बातचीत के बाद सामने आया है, जिसमें दोनों देशों के बीच एक व्यापार समझौते पर सहमति बनी।
राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक विस्तृत पोस्ट में कहा कि इस समझौते के तहत अमेरिका भारतीय वस्तुओं पर लगाए जाने वाले पारस्परिक टैरिफ को तुरंत 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर देगा। उन्होंने इसे ऊर्जा सहयोग और व्यापक भू-राजनीतिक लक्ष्यों से जुड़े द्विपक्षीय व्यापार संबंधों में बड़ा बदलाव बताया।
ट्रंप ने कहा कि दोनों नेताओं के बीच “व्यापार और रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने सहित कई विषयों पर चर्चा हुई।” उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी ने रूसी तेल की खरीद बंद करने और अमेरिका से, तथा संभवतः वेनेजुएला से तेल आयात बढ़ाने पर सहमति जताई है।
प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर अपने संदेश में कहा, “यह जानकर खुशी हुई कि ‘मेड इन इंडिया’ उत्पादों पर अब 18 प्रतिशत का कम टैरिफ लागू होगा।”
उन्होंने कहा, “जब दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र साथ मिलकर काम करते हैं, तो इससे हमारे लोगों को लाभ होता है और पारस्परिक रूप से लाभकारी सहयोग के नए अवसर खुलते हैं।”
वरिष्ठ अमेरिकी प्रशासनिक अधिकारी ने आईएएनएस को बताया कि अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ सीधे तौर पर भारत की रूसी तेल खरीद से जुड़ा था, जिसे अब नई दिल्ली की ओर से आयात रोकने की प्रतिबद्धता के बाद हटा दिया जाएगा।
यह कदम व्यापार नीति को ऊर्जा और भू-राजनीतिक उद्देश्यों से सीधे जोड़ता है और रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच रूस की तेल आय से होने वाली कमाई को सीमित करने के वाशिंगटन के प्रयासों को दर्शाता है।
युद्ध शुरू होने के बाद से अमेरिका अपने सहयोगी देशों से रूसी ऊर्जा खरीद कम करने या पूरी तरह समाप्त करने का आग्रह करता रहा है। वहीं, भारत ने घरेलू ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रियायती दरों पर रूसी कच्चे तेल की खरीद में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की थी। भारतीय अधिकारियों का कहना रहा है कि ऊर्जा संबंधी फैसले राष्ट्रीय हित और बाजार परिस्थितियों के आधार पर लिए जाते हैं।
भारत ने साथ ही संवाद और कूटनीति के जरिए संघर्ष समाप्त करने की वकालत की है और रूस तथा पश्चिमी देशों- दोनों के साथ अपने संबंध बनाए रखे हैं।
व्हाइट हाउस की यह स्पष्टता ऐसे समय आई है जब भारत और अमेरिका व्यापार एवं निवेश सहयोग को और विस्तार देने की दिशा में काम कर रहे हैं। दोनों पक्षों के अधिकारियों का कहना है कि वार्ताएं अंतिम चरण के करीब हैं, हालांकि नई दिल्ली की ओर से अभी कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है।
ऊर्जा सहयोग भारत-अमेरिका संबंधों का एक अहम स्तंभ बन गया है। हाल के वर्षों में अमेरिका ने भारत को तेल और गैस निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि की है और खुद को एक भरोसेमंद दीर्घकालिक आपूर्तिकर्ता के रूप में स्थापित किया है।
इस टैरिफ फैसले पर भारतीय नीति निर्माताओं, उद्योग जगत- खासकर रिफाइनरियों और निर्यातकों और वैश्विक ऊर्जा बाजारों की करीबी नजर रहने की उम्मीद है।
इससे पहले सोमवार को विदेश मंत्रालय ने घोषणा की कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर इस सप्ताह वॉशिंगटन का दौरा करेंगे, जहां वह अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो द्वारा आयोजित ‘क्रिटिकल मिनरल्स मिनिस्टीरियल’ में हिस्सा लेंगे।
मंत्रालय के अनुसार, यह बैठक आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती, स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण और महत्वपूर्ण खनिजों में रणनीतिक सहयोग पर केंद्रित होगी। जयशंकर की अमेरिकी प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात भी प्रस्तावित है।
पिछले एक दशक में भारत-अमेरिका संबंध रक्षा, प्रौद्योगिकी और आर्थिक क्षेत्रों में लगातार मजबूत हुए हैं। दोनों देशों ने इस साझेदारी को आने वाले वर्षों में सबसे अहम करार दिया है, जिसमें व्यापार और ऊर्जा सहयोग केंद्र में रहेगा।
--आईएएनएस
डीएससी
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अमेरिका और चीन के बीच फंसा भारत:अब कम ताकतवर देशों से बढ़ा रहा दोस्ती, ट्रम्प के टैरिफ से बदली भारत की विदेश और व्यापार नीति
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने पिछले महीने स्विट्जरलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के मंच से कहा कि दुनिया की पुरानी व्यवस्था ‘टूट’ रही है और अब मध्यम ताकत वाले देशों को साथ आकर काम करना होगा। दावोस में अपने भाषण में कार्नी ने न तो ट्रम्प प्रशासन का नाम लिया और न ही उन अमेरिकी टैरिफ का जिक्र किया, जिनकी वजह से पुरानी वैश्विक व्यवस्था हिल गई। अपने भाषण में उन्होंने सीधे तौर पर भले ही भारत का नाम न लिया हो, लेकिन इशारा साफ तौर पर भारत की तरफ था। भारत इस वक्त दो बड़े दबावों के बीच खड़ा है। एक तरफ अमेरिका की बदलती नीतियां हैं तो दूसरी ओर चीन की बढ़ती आक्रामकता। ऐसे हालात में भारत अब पारंपरिक साझेदारों से आगे बढ़कर दुनिया के दूसरे हिस्सों में नए दोस्त तलाश रहा है। भारत-EU ने 20 साल से अटकी डील पूरी की इस घटना के ठीक एक हफ्ते बाद, भारतीय पीएम नरेंद्र मोदी नई दिल्ली में यूरोपीय संघ की प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन के साथ खड़े थे। दोनों ने करीब 20 साल से अटके पड़े एक बड़े व्यापार समझौते की घोषणा की, जिसे उन्होंने ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा। इस डील से करीब 2 अरब लोगों का बाजार तैयार होगा। यह सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि उस नई अंतरराष्ट्रीय सिस्टम का हिस्सा है, जिसमें अमेरिका की भूमिका कमजोर होने के बाद बाकी देश मिलकर नया ढांचा खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। भारत की विदेश नीति में बदलाव आ रहा आज भारत उन देशों में शामिल है जिनकी राय और फैसले वैश्विक राजनीति को प्रभावित करने लगे हैं। 140 करोड़ की आबादी के साथ यह दुनिया का सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला देश है। भारत की इकोनॉमी भी जापान और जर्मनी के साथ दुनिया की टॉप-5 में शामिल हो चुकी है, हालांकि प्रति व्यक्ति आय अब भी इन देशों से बहुत कम है। प्रधानमंत्री मोदी की आत्मनिर्भर भारत वाली सोच अब थोड़ी नरम पड़ती दिख रही है। भारत में यह धारणा लंबे समय से रही है कि खुद को सुरक्षित रखने के लिए दूसरे देशों से ज्यादा आर्थिक जुड़ाव नहीं होना चाहिए। लेकिन यूरोप, कनाडा और दूसरे देश यह तर्क देते रहे हैं कि मिलकर व्यापार करने से ही देश मजबूत बनते हैं। भारत-ब्रिटेन के बीच FTA से बदलाव शुरू भारत और दूसरे अहम देशों के बीच रिश्तों में तेजी पिछले साल ब्रिटेन के साथ हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट से दिखनी शुरू हुई। यह समझौता लंबे समय से अटका हुआ था। इसके बाद दिसंबर में ओमान और न्यूजीलैंड के साथ भी ऐसे ही अहम समझौते किए गए। ये द्विपक्षीय समझौते दिखाते हैं कि भारत की नीति में बदलाव आ रहा है। पिछले कुछ हफ्तों में जर्मनी, जापान, यूएई और सऊदी अरब के बड़े नेता नई दिल्ली आए। हर मुलाकात में भारत के साथ रिश्ते आगे बढ़ाने की बात हुई और नए समझौते किए गए। फरवरी में ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा भी भारत आने वाले हैं। इसके बाद मार्क कार्नी भी भारत आएंगे। उम्मीद है कि वे मार्च में कनाडा के एक डेलिगेशन के साथ नई दिल्ली आएंगे और एक और व्यापार समझौते को आगे बढ़ाएंगे। ट्रम्प के टैरिफ से रिश्ते खराब हुए पिछले साल डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत से आने वाले ज्यादातर सामान पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया था। इसमें आधा जवाबी टैरिफ था और आधा रूस से तेल खरीदने की सजा के तौर पर लगाया गया एक्स्ट्रा टैक्स। यही से भारत-अमेरिका के रिश्तों में बदलाव शुरू हुआ। इससे पहले 25 सालों तक अमेरिका और भारत के रिश्ते मजबूत करने की कोशिश होती रही थी, खासकर चीन की बढ़ती ताकत का मुकाबला करने के लिए। हालांकि भारत, चीन के खिलाफ खुलकर अमेरिका के साथ खड़ा होने से हिचक रहा था। सप्लाई चेन में भारत की पकड़ कमजोर वॉशिंगटन स्थित ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन की सीनियर फेलो तन्वी मदान के मुताबिक, भारत चाहता था कि वह चीन के साथ वही करे जो चीन ने पश्चिमी देशों के साथ किया। यानी उनकी प्रतिभा और तकनीक हासिल करे और फिर खुद एक मजबूत प्रतिस्पर्धी बने। अब इसमें भारत की सबसे बड़ी कमी यह है कि दुनिया की सप्लाई चेन में उसके हाथ कोई ऐसा मजबूत पत्ता नहीं है, जिससे वह दूसरों पर दबाव बना सके। जैसे चीन के पास रेयर-अर्थ खनिज हैं, या ताइवान और नीदरलैंड के पास एडवांस चिप बनाने की तकनीक है, जिनकी वजह से बाकी देश उन पर निर्भर रहते हैं। भारत के पास फिलहाल ऐसा कुछ नहीं है। आज हालात यह हैं कि चीन का सामान दुनिया भर के बाजारों में छाया हुआ है और चीनी सैनिक हिमालय के उस हिस्से में डटे हुए हैं, जिस पर भारत अपना दावा करता है। ऐसे में भारत को चीन के मुकाबले पहले से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय समर्थन की जरूरत है। अगर यह मदद अमेरिका से नहीं मिलती, तो फिर दूसरे देशों को आगे आना होगा। पटरी पर आ रहे भारत-कनाडा के रिश्ते कनाडा के साथ नया समझौता एक बड़ा बदलाव माना जाएगा। अक्टूबर 2024 में भारत और कनाडा के रिश्ते तब बिगड़ गए थे, जब वैंकूवर के पास रहने वाले एक सिख एक्टिविस्ट की हत्या को लेकर दोनों देशों ने एक-दूसरे के कई राजनयिकों को बाहर निकाल दिया था। इसके बाद जून 2025 में जब प्रधानमंत्री मोदी, मार्क कार्नी के निमंत्रण पर अल्बर्टा में हुए जी-7 शिखर सम्मेलन में शामिल हुए, तभी से रिश्तों में सुधार दिखने लगा था। इसके कुछ ही समय बाद अमेरिका के टैरिफ का झटका लगा। ईवाई इंडिया के मुख्य नीति सलाहकार डी. के. श्रीवास्तव का कहना है कि जितने ज्यादा देशों से भारत की साझेदारी होगी, उतना ही वह वैश्विक उतार-चढ़ाव से खुद को सुरक्षित रख पाएगा। हालांकि यह साफ नहीं है कि अमेरिकी टैरिफ से हुए नुकसान की भरपाई दूसरे देश कितनी कर पाएंगे। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा बाजार है और 50 फीसदी टैरिफ लगने के बाद वहां भारत के निर्यात में शुरुआती महीनों में भारी गिरावट आई। पिछले साल भारतीय मुद्रा डॉलर के मुकाबले 7 फीसदी कमजोर हुई। भारत ने इसकी भरपाई इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर पर ज्यादा ध्यान देकर की, क्योंकि इस पर टैरिफ नहीं लगता। साथ ही दूसरे देशों में भी अपना बाजार बढ़ाया। नतीजा यह हुआ कि कुल मिलाकर भारत का निर्यात पिछले साल बढ़ ही गया। इन नए व्यापार समझौतों के साथ-साथ देश के भीतर हो रहे आर्थिक सुधार भारत को और मजबूती दे सकते हैं। अर्थशास्त्री रजत कथूरिया कहते हैं, “भारत में अक्सर संकट को सुधार का मौका बना लिया जाता है। जैसे छत से पानी टपकने लगे, तो पूरा घर ही मरम्मत के लिए तैयार कर दिया जाता है।”
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