Vastu Tips: घर में तुलसी का पौधा कहां रखें? उत्तर-पूर्व, उत्तर या पूर्व दिशा में रखना माना जाता है शुभ
वास्तु शास्त्र में घर के वातावरण को संतुलित रखने के लिए पौधों को महत्वपूर्ण माना जाता है। इनमें तुलसी के पौधे का विशेष स्थान है। सनातन धर्म में तुलसी को पवित्र और पूजनीय माना जाता है।
वास्तु मान्यताओं के अनुसार, घर में तुलसी का पौधा सही दिशा और उचित स्थान पर रखने से सकारात्मक वातावरण बना रह सकता है। वहीं, इसे रखने से पहले दिशा और स्थान का ध्यान रखने की सलाह दी जाती है।
उत्तर-पूर्व दिशा में रखें तुलसी
वास्तु शास्त्र में उत्तर-पूर्व दिशा को ईशान कोण कहा जाता है। वास्तु परंपरा में इस दिशा को शुभ और आध्यात्मिक ऊर्जा से जुड़ा क्षेत्र माना जाता है। इसी वजह से धार्मिक और वास्तु मान्यताओं में तुलसी जैसे पवित्र पौधे को ईशान कोण में रखना शुभ माना जाता है। अगर घर में इस दिशा में तुलसी रखने की पर्याप्त जगह हो तो यहां पौधा रखा जा सकता है।
उत्तर दिशा भी मानी जाती है शुभ
तुलसी के पौधे के लिए उत्तर दिशा को भी उपयुक्त माना जाता है। वास्तु परंपरा में उत्तर दिशा का संबंध कुबेर से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि उत्तर दिशा में तुलसी का पौधा रखने से घर में धन-समृद्धि और सकारात्मकता का वातावरण बना रहता है। हालांकि, इसे वास्तु संबंधी धार्मिक मान्यता के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
पूर्व दिशा में भी रख सकते हैं तुलसी
घर में तुलसी का पौधा रखने के लिए पूर्व दिशा को भी अच्छा माना गया है। वास्तु परंपरा में पूर्व दिशा का संबंध सूर्य और प्रकाश से जोड़ा जाता है।
मान्यता के अनुसार, पूर्व दिशा में तुलसी का पौधा रखना शुभ माना जाता है। साथ ही पौधे को ऐसी जगह रखना उचित माना जाता है जहां उसे पर्याप्त प्राकृतिक रोशनी और हवा मिल सके।
तुलसी रखने से पहले इन बातों का रखें ध्यान
तुलसी का पौधा रखने के लिए दिशा के साथ-साथ उसकी जगह का भी ध्यान रखना चाहिए। धार्मिक परंपराओं में तुलसी को सम्मानजनक और स्वच्छ स्थान पर रखने की सलाह दी जाती है। ध्यान रखें कि वास्तु से जुड़े ये नियम धार्मिक और पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित हैं, इनका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
Jitiya Vrat 2026: आज से शुरू हुआ जितिया व्रत, 3 अक्टूबर को निर्जला उपवास; जानें पूजा और पारण से जुड़ी खास बातें
जितिया व्रत यानी जीवित्पुत्रिका व्रत संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना से रखा जाने वाला महत्वपूर्ण व्रत है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, इस व्रत में माताएं अपनी संतान के लिए निर्जला उपवास करती हैं और भगवान जीमूतवाहन की पूजा-अर्चना करती हैं।
यह पर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल के मिथिला क्षेत्र में श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। व्रत में पूजा के साथ जितिया व्रत की कथा सुनने का भी विशेष महत्व माना जाता है।
साल 2026 में जितिया व्रत का तीन दिवसीय पर्व 2 अक्टूबर, शुक्रवार से शुरू हुआ है। पहले दिन नहाय-खाय किया जाता है। इसके बाद 3 अक्टूबर, शनिवार को निर्जला उपवास रखा जाएगा और 4 अक्टूबर को पारण के साथ व्रत का समापन होगा।
3 अक्टूबर को रखा जाएगा निर्जला व्रत
जितिया यानी जीवित्पुत्रिका व्रत शनिवार, 3 अक्टूबर 2026 को रखा जाएगा। इस दिन माताएं संतान की लंबी उम्र, सुख और अच्छे स्वास्थ्य की कामना से पूरे दिन और रात निर्जला उपवास करेंगी।
व्रत के दौरान भगवान जीमूतवाहन की पूजा-अर्चना की जाती है और जितिया व्रत की कथा सुनी जाती है। धार्मिक परंपरा के अनुसार प्रदोष काल में जीमूतवाहन के साथ चील और सियारिन की पूजा का विधान भी बताया गया है।
2 अक्टूबर को नहाय-खाय
जितिया व्रत की शुरुआत नहाय-खाय से होती है। 2 अक्टूबर को व्रत रखने वाली महिलाएं स्नान के बाद सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं। इस दिन पारंपरिक रूप से नोनी का साग और मडुआ की रोटी जैसे सात्विक भोजन का सेवन किया जाता है।
नहाय-खाय के बाद अगले दिन निर्जला उपवास रखा जाता है। इसलिए व्रत के पहले दिन सात्विक भोजन और शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है।
अष्टमी तिथि पर पूजा का विधान
इस बार जितिया व्रत आश्विन कृष्ण अष्टमी को पड़ रहा है। पंचांग के अनुसार शनिवार को आर्द्रा नक्षत्र और वरीयान योग का संयोग बताया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार अष्टमी तिथि का प्रदोष काल और चंद्रोदय से संबंध होने के कारण जितिया व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। भविष्य पुराण और निर्णय सिंधु में प्रदोष व्यापिनी अष्टमी को जीमूतवाहन पूजन के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है।
प्रदोष काल में जीमूतवाहन की पूजा
3 अक्टूबर को निर्जला व्रत रखने के बाद महिलाएं प्रदोष काल में भगवान जीमूतवाहन की पूजा करेंगी। इस दौरान व्रत कथा का श्रवण भी किया जाता है।
जितिया व्रत से जुड़ी धार्मिक परंपराओं में जीमूतवाहन की कथा को विशेष महत्व दिया गया है। मान्यता के अनुसार, इस व्रत और कथा का उद्देश्य संतान की दीर्घायु और उसके कल्याण की कामना करना है।
4 अक्टूबर को होगा पारण
तीन दिवसीय जितिया पर्व का समापन 4 अक्टूबर 2026 को पारण के साथ होगा। निर्जला उपवास रखने वाली महिलाएं पारण के बाद अन्न-जल ग्रहण करेंगी।
पारण का समय स्थानीय पंचांग और स्थान के अनुसार अलग हो सकता है। इसलिए व्रत रखने वाली महिलाओं को अपने क्षेत्र के स्थानीय पंचांग के अनुसार पारण का सही समय देखना चाहिए।
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