रेत माफिया पर पुलिस की कार्रवाई, आसन नदी से रेत भरकर ला रही 7 लाख की ट्रैक्टर-ट्रॉली जब्त
मुरैना जिले में नदियों से रेत और पत्थर के अवैध उत्खनन तथा परिवहन के खिलाफ पुलिस ने अभियान तेज कर दिया है। इसी कड़ी में बागचीनी थाना पुलिस ने बीती रात गश्त और चेकिंग के दौरान माधौंबाई की पुलिया के पास अवैध रेत से भरी एक ट्रैक्टर-ट्रॉली को पकड़ने में सफलता हासिल की। मौके से पकड़ा गया वाहन आसन नदी से अवैध रूप से रेत भरकर ले जा रहा था, जिसे पुलिस टीम ने घेरकर जब्त कर लिया।
चालक गिरफ्तार, 7 लाख रुपये कीमत का वाहन और सामग्री कस्टडी में
चेकिंग के दौरान सड़क किनारे संदिग्ध हालत में खड़े ट्रैक्टर-ट्रॉली की जब पुलिस टीम ने सघन तलाशी ली, तो ट्रॉली में आसन नदी से निकाली गई अवैध रेत भरी पाई गई। पुलिस बल ने बिना देर किए चालक को हिरासत में ले लिया। जब्त की गई ट्रैक्टर-ट्रॉली और अवैध रेत की कुल अनुमानित कीमत लगभग 7 लाख रुपये बताई जा रही है। पुलिस वाहन को कब्जे में लेकर आगे की कानूनी कार्रवाई में जुट गई है।
BNS और खनिज अधिनियम के तहत मामला दर्ज
पुलिस आरोपी चालक को हिरासत में लेकर थाने पहुंची, जहां उसके खिलाफ अपराध क्रमांक 223/26 दर्ज किया गया है। यह कार्रवाई भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 303(2), 317(5) और खान एवं खनिज अधिनियम की धारा 4(1) व 21(1) के तहत की गई है। पुलिस ने पूरे मामले को विवेचना में ले लिया है और चालक से पूछताछ की जा रही है ताकि इसके पीछे जुड़े पूरे नेटवर्क की जानकारी मिल सके।
खनिज विभाग को भेजी गई रिपोर्ट
बागचीनी थाना प्रभारी कुलदीप राजपूत ने बताया कि इलाके में अवैध खनन और परिवहन रोकने के लिए लगातार पुलिस गश्त की जा रही है। चेकिंग के दौरान पकड़े गए वाहन और चालक पर मामला दर्ज कर इसकी सूचना खनिज विभाग को भी दे दी गई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि नदियों से रेत का अवैध कारोबार करने वाले तस्करों और भू-माफियाओं के खिलाफ आने वाले दिनों में भी पुलिस की सख्त कार्रवाई जारी रहेगी।
मूवी रिव्यू- ‘प्रेम कीटाणु’:प्यार की तलाश में निकले वीर पहाड़िया की कहानी में है हंसी, उलझन और एक मजेदार ट्विस्ट; जानिए कैसी है फिल्म
कॉलेज में किसी पर दिल आ जाए तो लगता है कहानी बस इतनी सी है, लेकिन कभी प्यार पूरा होने से पहले ही कोई नया मोड़ आ जाता है और फिर वही कहानी चार साल बाद एक बिल्कुल अलग दुनिया में लौटती है। फिल्म ‘प्रेम कीटाणु’ इसी प्यार, दोस्ती और जिंदगी के बदलते रंगों को हल्के फुल्के अंदाज में लेकर चलती है। फिल्म हंसाती है, रिलेट करती है और बीच बीच में जिंदगी की थोड़ी सी कड़वी सच्चाई भी दिखा देती है। फिल्म की कहानी कैसी है कहानी बनारस के इंजीनियरिंग कॉलेज से शुरू होती है। एडमिशन के दौरान विशाल ठाकुर (वीर पहाड़िया) और सुहानी (आफिया सैयद) पहली बार आमने सामने आते हैं। पहली मुलाकात नोकझोंक में बदलती है और दोनों एक दूसरे को श्राप दे बैठते हैं कि चार साल तक विशाल की कोई गर्लफ्रेंड नहीं बनेगी और सुहानी का कोई बॉयफ्रेंड नहीं होगा। इसके बाद दोनों अलग अलग कॉलेज चले जाते हैं। चार साल की कॉलेज लाइफ में विशाल की जिंदगी में प्यार की दस्तक तो होती है, लेकिन बात मुकम्मल नहीं हो पाती। उधर सुहानी अपनी पढ़ाई और फिर करियर की तरफ बढ़ती है। चार साल बाद दोनों की जिंदगी कॉलेज से निकलकर नौकरी की दुनिया में पहुंच चुकी है। सुहानी को अच्छी नौकरी मिलती है, जबकि विशाल को करियर और जिंदगी की अपनी जद्दोजहद से गुजरना पड़ता है। फिर दोनों की मुलाकात होती है और यहीं से पुरानी कहानी नए हालात में दोबारा खुलती है। फिल्म सिर्फ यह नहीं पूछती कि दोनों प्यार में पड़ेंगे या नहीं, बल्कि यह भी देखती है कि वक्त के साथ बदले दो लोग एक दूसरे की जिंदगी में फिर जगह बना पाएंगे या नहीं। इसी के साथ दोस्ती, परिवार और जिम्मेदारियां कहानी को थोड़ा और बड़ा बनाती हैं। फिल्म में एक्टिंग कैसी है वीर पहाड़िया विशाल के किरदार में सहज हैं। कॉलेज के मस्तमौला लड़के से लेकर जिंदगी की परेशानियों से जूझते युवा तक वह किरदार के बदलाव को स्वाभाविक रखते हैं। आफिया सैयद की यह पहली फिल्म है और वह सुहानी के किरदार में फ्रेश लगती हैं। वीर के साथ उनकी नोकझोंक और केमिस्ट्री फिल्म के रोमांटिक हिस्सों में अच्छी लगती है। निखिल विजय फिल्म की जान हैं। मगन अरोड़ा बनकर उनकी कॉमिक टाइमिंग, पंच और वीर के साथ झगड़बंदी कई जगह जबरदस्त मजा देती है। कहानी जहां थोड़ी धीमी पड़ती है, निखिल वहां माहौल फिर से गर्म कर देते हैं। अपारशक्ति खुराना ने अपने किरदार को पूरे अंदाज में निभाया है और उसे इंटरेस्टिंग रखा है। हां, किरदार की लिखावट थोड़ी और मजबूत होती तो उनकी परफॉर्मेंस का असर और बढ़ सकता था। फिल्म का डायरेक्शन कैसा है? अपूर्व सिंह कार्की ने फिल्म को हल्का और यूथफुल रखा है। कॉलेज की मस्ती से लेकर नौकरी और जिम्मेदारियों वाली जिंदगी तक टोन बदलता है, लेकिन फिल्म जरूरत से ज्यादा भारी नहीं होती। राइटर दीपक किंगरानी, जिन्हें सिर्फ एक बंदा काफी है के लिए नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिल चुका है, ने रिश्तों, दोस्ती और कॉमेडी को सहज अंदाज में पिरोया है। स्क्रीनप्ले की अच्छी बात यह है कि कहानी सिर्फ रोमांस पर नहीं टिकी। परिवार और दोस्ती को भी जगह मिलती है। हां, बीच में रफ्तार थोड़ी ढीली पड़ती है और कुछ मोड़ पहले से भांपे जा सकते हैं। इमोशनल हिस्सों में थोड़ा और ठहराव होता तो कहानी का असर और बढ़ता। तकनीकी तौर पर फिल्म का विजुअल ट्रीटमेंट रंगीन और यूथफुल है। कॉलेज और बनारस का माहौल कहानी को अपनी अलग फील देता है। फिल्म का म्यूजिक कैसा है ‘कहो तो’, ‘तू मेरा रइयो’ और ‘इश्क का गुलाम’ फिल्म के रोमांटिक और यूथफुल मूड को अच्छे से सपोर्ट करते हैं। गाने कहानी से अलग नहीं लगते और फिल्म की फील को बनाए रखते हैं। फिल्म को लेकर फाइनल वर्डिक्ट प्यार की मस्ती, दोस्ती की शरारत और जिंदगी की थोड़ी सी कड़वी मिठास, ‘प्रेम कीटाणु’ इन तीनों का अच्छा कॉम्बिनेशन है। निखिल विजय खूब हंसाते हैं, वीर और आफिया की जोड़ी जमती है। थोड़ी कसावट की कमी जरूर है, लेकिन ये फिल्म मुस्कुराने और पुराने कॉलेज वाले दिनों को याद करने का अच्छा बहाना है।
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