बिना डाइटिंग और एक्सरसाइज के शहनाज गिल ने घटाया था 12 किलो वजन, वेट लॉस के लिए ये चीजें खाती थी एक्ट्रेस
Shehnaaz Gill Weight Loss Secret: बिग बॉस 13 फेम शहनाज गिल अपनी एक्टिंग और चुलबुले नेचर के लिए तो जानी जाती ही है. लेकिन इसके अलावा एक्ट्रेस अब अपने जबरदस्त ट्रांसफॉर्मेशन के लिए चर्चा में रहती है. कभी मोटी और चबी दिखने वाली शहनाज आज स्लिम ट्रिम हो गई है और अपने ग्लैमरस अंदाज से फिगर फ्लॉन्ट करती हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि शहनाज ने 6 महीने में 12 किलो वजन बिना किसी डाइटिंग और एक्सरसाइज के किया था. शहनाज 27 जनवरी को अपना बर्थडे (Shehnaaz Gill Birthday) मना रही है, तो ऐसे में आपको बताते हैं एक्ट्रेस क्या खाती थी और उन्होंने कैसे वेट लॉस किया था.
शहनाज ने कैसे घटाया था वजन?
शहनाज गिल जब बिग बॉस 13 में आई थी तो उनका वजन 67 किलो था. शो के अंदर एक्ट्रेस ने कहा था कि वो कभी पतली होने के बारे में नहीं सोच सकती है. लेकिन जब शो खत्म हुआ तो लॉकडाउन हो गया था, वहीं शहनाज को इंडस्ट्री में काम करना था. ऐसे में उन्होंने वजन कम करने के बारे में सोचा. इस बारे में शहनाज का कहना था कि वो ना एक्सरसाइज कर सकती थी और ना ही डाइटिंग उनसे हो पाती. इसलिए उन्होंने दूसरा रास्ता चुना और
सात्विक भोजन के जरिए नेचुरली अपना वजन कम किया. एक्ट्रेस ने बिना लहसुन और प्याज वाला खाना खाया और 12 किलो वजन कम कर लिया था.
शहनाज ने वेट लॉस के लिए क्या खाया?
एक्ट्रेस ने बताया था कि वो सुबह गरम पानी में एप्पल साइडर विनेगर और हल्दी मिलाकर पीती थी. शहनाज दिनभर में 3-4 लिटर पानी पीती हैं. सुबह के ब्रेकफास्ट में वह भीगोए हुए ड्राई फ्रूट्स और पोहा खाती हैं. इसके अलावा वह ग्रेनोला और दही को पोहा के साथ खाती है. दोपहर के खाने में वह दाल, हरी सब्जी और घी में लगी रोटी खाती हैं. अपनी छोटी-मोटी भूख को मिटाने के लिए वह भूने हुए मखाने खाती हैं. शहनाज का रात का खाना भी बेहद हल्का होता है, जिसमें वो सूप, खिचड़ी या दही खाती है. इसके अलावा शहनाज अपने रूटीन में 7 घंटे नींद लेती है. एक्ट्रेस ने कहा था कि वो योग करती है, लेकिन पूरी तरह से फॉलो नहीं कर पाती हैं.
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चीनी वैज्ञानिकों ने इबोला वायरस के अहम म्यूटेशन की पहचान की
बीजिंग, 27 जनवरी (आईएएनएस)। चीनी वैज्ञानिकों ने इबोला वायरस में एक ऐसे महत्वपूर्ण म्यूटेशन की पहचान की है, जिसने एक बड़े प्रकोप के दौरान वायरस की संक्रमण क्षमता को काफी बढ़ा दिया था। यह खोज महामारी निगरानी और दवा विकास के लिहाज से अहम मानी जा रही है।
यह अध्ययन प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका सेल में प्रकाशित हुआ है। शोध का केंद्र 2018 से 2020 के बीच कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (डीआरसी) में फैला इबोला वायरस रोग (ईवीडी) का प्रकोप रहा, जो अब तक का दूसरा सबसे बड़ा इबोला प्रकोप था। इस दौरान 3,000 से अधिक लोग संक्रमित हुए और 2,000 से ज्यादा की मौत हुई।
सन यात-सेन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर कियान जुन ने कहा, “यह शोध बताता है कि किसी भी बड़े संक्रामक रोग प्रकोप के दौरान वायरस की रियल-टाइम जीनोमिक निगरानी और उसके विकास (एवोल्यूशन) का विश्लेषण बेहद जरूरी है। इससे न केवल संक्रमण के बढ़ते जोखिम की समय रहते चेतावनी मिल सकती है, बल्कि मौजूदा दवाओं और वैक्सीन की प्रभावशीलता का आकलन कर नियंत्रण रणनीतियों में पहले से बदलाव किया जा सकता है।”
शोध का मुख्य सवाल यह था कि क्या स्थानीय स्वास्थ्य ढांचे की कमजोरियों के अलावा, वायरस के स्वयं के विकास ने भी इबोला प्रकोप के लंबे समय तक चलने में भूमिका निभाई।
प्रोफेसर जुन ने बताया, “हम जानते हैं कि वायरस के कुछ खास म्यूटेशन बड़े प्रकोपों के दौरान संक्रमण को तेजी से फैलाने वाले अदृश्य कारक बन जाते हैं। इबोला पर एक दशक से अधिक समय तक काम करने के बाद, यह जानना जरूरी था कि क्या इस वायरस में भी ऐसा कोई पैटर्न मौजूद है।”
2022 में शोध टीम ने इबोला वायरस के 480 पूर्ण जीनोम का विश्लेषण किया। इसमें पाया गया कि डीआरसी प्रकोप के शुरुआती चरण में वायरल ग्लाइकोप्रोटीन में एक खास म्यूटेशन सामने आया, जिसे जीपी-वी75ए नाम दिया गया। यह वैरिएंट तेजी से मूल स्ट्रेन की जगह लेने लगा और इसके फैलाव की दर इबोला मामलों में आई तेज बढ़ोतरी से मेल खाती थी, जिससे इसके अधिक संक्रामक होने के संकेत मिले।
इसके बाद किए गए प्रयोगों में यह पुष्टि हुई कि जीपी-वी75ए म्यूटेशन ने वायरस की विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं और चूहों में संक्रमण करने की क्षमता को काफी बढ़ा दिया था।
शोध में एक और चिंताजनक पहलू सामने आया। जीपी-वी75ए म्यूटेशन के कारण कुछ मौजूदा एंटीवायरल एंटीबॉडी और छोटे अणु (स्मॉल-मॉलिक्यूल) आधारित दवाओं की प्रभावशीलता कम हो गई, जिससे दवा प्रतिरोध (ड्रग रेजिस्टेंस) का खतरा पैदा हो सकता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि ये निष्कर्ष इस बात को रेखांकित करते हैं कि किसी भी प्रकोप के दौरान वायरस के जीनोम की लगातार निगरानी बेहद जरूरी है, ताकि भविष्य में होने वाले विकासात्मक खतरों को समय रहते पहचाना जा सके और व्यापक प्रभाव वाली उपचार रणनीतियां विकसित की जा सकें।
--आईएएनएस
डीएससी
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