विदेशी इलेक्ट्रिक कारों के लिए अभी 'नो एंट्री', सरकार ने इंडियन कंपनियों को दिया 5 साल का मौका
भारत सरकार ने यूरोपीय संघ के साथ डील करते वक्त एक बहुत ही सधी हुई रणनीति अपनाई है. सरकार ने फैसला किया है कि बैटरी वाली इलेक्ट्रिक कारों (EVs)पर टैक्स में कटौती अगले 5 साल तक नहीं की जाएगी. इसका सीधा मतलब यह है कि सरकार चाहती है कि टाटा मोटर्स और महिंद्रा जैसी देसी कंपनियां, जिन्होंने इलेक्ट्रिक तकनीक में अरबों रुपये निवेश किए हैं, पहले भारतीय बाजार में अपनी जड़ें मजबूत कर लें. 5 साल बाद जब भारतीय कंपनियां ग्लोबल लेवल पर मुकाबला करने के लिए तैयार होंगी, तब विदेशी इलेक्ट्रिक कारों के लिए रास्ता खोला जाएगा.
इस 'महा-डील' से भारतीयों को क्या-क्या मिलेंगे बेनेफिट्स?
यह समझौता सिर्फ कारों की कीमतों तक सीमित नहीं है, इसके फायदे आपके रोजगार से लेकर शॉपिंग तक पहुंचेंगे. अभी जो विदेशी कार भारत में 1 करोड़ रुपये की मिलती है, उस पर करीब 110% टैक्स होता है. टैक्स घटकर 40% होने से इन कारों की कीमत में 20 से 25 लाख रुपये तक की कमी आ सकती है. यानी अब प्रीमियम कारों का सपना देखना और उसे पूरा करना मिड-लग्जरी सेगमेंट के ग्राहकों के लिए आसान होगा.
कपड़ों और ज्वेलरी का सस्ता होना और एक्सपोर्ट बढ़ना
यूरोपीय संघ भारत का बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है. इस डील के बदले भारत के कपड़ा (Textiles) और ज्वेलरी एक्सपोर्टर्स को यूरोप के बाजारों में बिना किसी रुकावट के एंट्री मिलेगी. जब भारत का सामान विदेश में ज्यादा बिकेगा, तो देश में विदेशी मुद्रा आएगी और इन सेक्टरों में काम करने वाले लाखों लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे.
वर्ल्ड-क्लास टेक्नोलॉजी तक पहुंच
जब यूरोपीय कंपनियां (जैसे BMW, Mercedes, Audi) भारत में अपने लेटेस्ट मॉडल्स आसानी से उतारेंगी, तो भारतीय ग्राहकों को दुनिया की सबसे बेहतरीन और सुरक्षित कारों की तकनीक का अनुभव मिलेगा. इससे भारतीय कंपनियों पर भी अपनी क्वालिटी सुधारने का दबाव बढ़ेगा, जिसका सीधा फायदा ग्राहकों को बेहतर प्रोडक्ट्स के रूप में मिलेगा.
सर्विस और मेंटेनेंस होगा बेहतर
टैक्स कम होने से जब सड़कों पर इन कारों की संख्या बढ़ेगी, तो कंपनियां भारत में अपने सर्विस सेंटर और स्पेयर पार्ट्स का नेटवर्क भी फैलाएंगी। इससे विदेशी कारों को मेंटेन करना पहले के मुकाबले काफी सस्ता और आसान हो जाएगा. बड़ी बात है कि यह डील भारत को एक बड़ा मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की दिशा में कदम है. सरकार का मानना है कि पहले पेट्रोल-डीजल कारों के जरिए बाजार खोला जाए और फिर धीरे-धीरे इलेक्ट्रिक सेगमेंट में भी दुनिया को भारत आने के लिए मजबूर किया जाए.
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अमेरिका पर निर्भरता बना यूरोपीय संघ के लिए मुसीबत, ट्रंप के इन फैसलों ने बदला यूएस-ईयू संबंधों का ऑर्डर
नई दिल्ली, 26 जनवरी (आईएएनएस)। भारत और यूरोपीय यूनियन के लिए 27 जनवरी का दिन बेहद अहम और ऐतिहासिक माना जा रहा है। दरअसल, मंगलवार को दोनों पक्षों के बीच मुक्त व्यापार समझौता हो सकता है। इसके साथ ही रक्षा सहयोग पर भी मुहर लग सकती है।
भारत के साथ व्यापार समझौता करने के लिए ईयू की बेचैनी देखते बन रही है। इसकी खास वजह कभी साए की तरह साथ रहने वाला अमेरिका है। आइए जानते हैं कि यूरोपीय देशों और अमेरिका के बीच कैसा संबंध था और अब तनाव क्यों दिख रहा है।
शुरुआती समय में यूरोपीय देशों और अमेरिका के बीच का संबंध ऐतिहासिक, साझा मूल्यों और रणनीतिक जरूरतों पर टिका था। हालांकि, समय-समय पर इसमें उतार-चढ़ाव भी देखने को मिला। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने यूरोप के पुनर्निर्माण में बड़ी भूमिका निभाई। अमेरिका ने मार्शल प्लान के तहत यूरोपीय देशों को आर्थिक मदद दी। इसके बाद से ही अमेरिका और ईयू में एकजुटता दिखाई देती रही।
यूरोपीय देश अमेरिका को सुरक्षा के दृष्टिकोण से अपना गारंटर मानते थे। नाटो के गठन के साथ अमेरिका और पश्चिमी यूरोपीय देश सामूहिक रक्षा के सिद्धांत पर एकजुट हुए। शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ के खतरे के खिलाफ यह गठबंधन यूरोप की सुरक्षा की रीढ़ बना।
अमेरिका और यूरोप दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अमेरिका और यूरोपीय देश अक्सर लोकतंत्र, मानवाधिकार और नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था का समर्थन करते आए हैं।
हालांकि, ट्रंप के कार्यकाल में ईयू और अमेरिका के संबंधों में तनाव देखने को मिला। ट्रंप की प्रेशर पॉलिटिक्स ईयू को अमेरिका से दूर धकेल रहा है। ट्रंप ईयू को टैरिफ की धमकियां देकर अपनी शर्तों पर व्यापार करने की कोशिश कर रहे हैं। वर्तमान में अमेरिकी राष्ट्रपति ने जैसे हालात पैदा कर दिए हैं, इसकी वजह से यूरोपीय देश अपने लिए एक स्थिर और भरोसेमंद साझेदार की तलाश में भारत की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं।
ट्रंप ने जिस तरह की स्थिति बना दी है, ऐसे में दुनिया के तमाम देशों के लिए भारत एक उम्मीद की किरण की तरह है। इसमें केवल टैरिफ ही नहीं, ग्रीनलैंड पर कब्जे वाला विचार भी मुख्य भूमिका में रहा है। ग्रीनलैंड को लेकर यूरोपीय देश ट्रंप के खिलाफ हैं, लेकिन एक हकीकत यह भी है कि अमेरिका के निकलने के बाद ईयू और नाटो पूरी तरह से बदल जाएगा।
--आईएएनएस
केके/एबीएम
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