अमेरिका पर निर्भरता बना यूरोपीय संघ के लिए मुसीबत, ट्रंप के इन फैसलों ने बदला यूएस-ईयू संबंधों का ऑर्डर
नई दिल्ली, 26 जनवरी (आईएएनएस)। भारत और यूरोपीय यूनियन के लिए 27 जनवरी का दिन बेहद अहम और ऐतिहासिक माना जा रहा है। दरअसल, मंगलवार को दोनों पक्षों के बीच मुक्त व्यापार समझौता हो सकता है। इसके साथ ही रक्षा सहयोग पर भी मुहर लग सकती है।
भारत के साथ व्यापार समझौता करने के लिए ईयू की बेचैनी देखते बन रही है। इसकी खास वजह कभी साए की तरह साथ रहने वाला अमेरिका है। आइए जानते हैं कि यूरोपीय देशों और अमेरिका के बीच कैसा संबंध था और अब तनाव क्यों दिख रहा है।
शुरुआती समय में यूरोपीय देशों और अमेरिका के बीच का संबंध ऐतिहासिक, साझा मूल्यों और रणनीतिक जरूरतों पर टिका था। हालांकि, समय-समय पर इसमें उतार-चढ़ाव भी देखने को मिला। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने यूरोप के पुनर्निर्माण में बड़ी भूमिका निभाई। अमेरिका ने मार्शल प्लान के तहत यूरोपीय देशों को आर्थिक मदद दी। इसके बाद से ही अमेरिका और ईयू में एकजुटता दिखाई देती रही।
यूरोपीय देश अमेरिका को सुरक्षा के दृष्टिकोण से अपना गारंटर मानते थे। नाटो के गठन के साथ अमेरिका और पश्चिमी यूरोपीय देश सामूहिक रक्षा के सिद्धांत पर एकजुट हुए। शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ के खतरे के खिलाफ यह गठबंधन यूरोप की सुरक्षा की रीढ़ बना।
अमेरिका और यूरोप दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अमेरिका और यूरोपीय देश अक्सर लोकतंत्र, मानवाधिकार और नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था का समर्थन करते आए हैं।
हालांकि, ट्रंप के कार्यकाल में ईयू और अमेरिका के संबंधों में तनाव देखने को मिला। ट्रंप की प्रेशर पॉलिटिक्स ईयू को अमेरिका से दूर धकेल रहा है। ट्रंप ईयू को टैरिफ की धमकियां देकर अपनी शर्तों पर व्यापार करने की कोशिश कर रहे हैं। वर्तमान में अमेरिकी राष्ट्रपति ने जैसे हालात पैदा कर दिए हैं, इसकी वजह से यूरोपीय देश अपने लिए एक स्थिर और भरोसेमंद साझेदार की तलाश में भारत की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं।
ट्रंप ने जिस तरह की स्थिति बना दी है, ऐसे में दुनिया के तमाम देशों के लिए भारत एक उम्मीद की किरण की तरह है। इसमें केवल टैरिफ ही नहीं, ग्रीनलैंड पर कब्जे वाला विचार भी मुख्य भूमिका में रहा है। ग्रीनलैंड को लेकर यूरोपीय देश ट्रंप के खिलाफ हैं, लेकिन एक हकीकत यह भी है कि अमेरिका के निकलने के बाद ईयू और नाटो पूरी तरह से बदल जाएगा।
--आईएएनएस
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Social Media Ban: फ्रांस में भी सोशल मीडिया पर लगने वाला है बैन, फ्रांसीसी राष्ट्रपति बोले- हमारे बच्चों का दिमाग बिकाऊ नहीं
Social Media Ban: फ्रांस में भी सोशल मीडिया पर बैन लगने वाला है. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों का कहना है कि उनके बच्चों और किशोरों का दिमाग बिकाऊ नहीं है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर से पहले 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर बैन लगा दिया जाएगा. सरकार इसके लिए कानूनी प्रक्रिया को तेजी से पूरा करने के लिए काम कर रही है.
फ्रांसीसी सरकार का साफ कहना है कि 15 साल से कम उम के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाया जाएगा. हाईस्कूल में मोबाइल फोन पर भी रोक लगाई जाएगी और इस फैसलों को माता-पिता और शिक्षकों को साफ तौर पर मानना होगा.
यूजर को उम्र साबित करना होगा
मैक्रों की पार्टी की सांसद लॉर मिलर फ्रांस में इस प्रस्ताव की अगुवाई कर रही हैं. उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उम्र की सही से जांच नहीं होती है. कोई भी व्यक्ति फर्जी बर्थ डेट डालकर आसानी से अपना अकाउंट बना लेते हैं. फ्रांस सरकार चाहती है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स उम्र की जांच सख्ती से करें. सरकार चाहती है कि यूजर्स को साबित करना पड़े कि वह 15 साल से ऊपर हैं.
ऑस्ट्रेलिया ने भी बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर बैन लगाया
सिर्फ फ्रांस ही सोशल मीडिया पर बैन लगाने वाला देश नहीं है. पश्चिमी देश इन दिनों बच्चों के सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर सख्त कानून बना रहे हैं. पिछले साल दिसंबर में ऑस्ट्रेलिया ने एक ऐतिहासिक कानून पास किया था, जिसके बाद 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए इंस्टाग्राम, फेसबुक और टिकटॉक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करना प्रतिबंधित है.
ब्रिटेन में बच्चों के लिए बैन हो सकता है सोशल मीडिया
मैक्रों की घोषणा से कुछ ही दिन पहले ब्रिटिश सरकार ने कहा था कि वे बच्चों की साइबर सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कई विक्लपों पर विचार कर रही है, जिसमें 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर बैन लगाना अनिवार्य है.
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