Responsive Scrollable Menu

Tariffs पर India और Brazil मिलकर ऐसा जवाब देंगे, ये बात Donald Trump ने सपने में भी नहीं सोची होगी

भारत और ब्राजील के रिश्तों में इस समय एक नई सक्रियता दिखाई दे रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा के बीच हुई बातचीत ने यह साफ कर दिया है कि दोनों देश अपने संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के अगले चरण तक ले जाना चाहते हैं। इसी क्रम में यह भी तय हुआ है कि ब्राजील के राष्ट्रपति शीघ्र ही भारत की राजकीय यात्रा पर आएंगे। यह दौरा ऐसे समय में होने जा रहा है जब वैश्विक व्यापार व्यवस्था एक बार फिर अस्थिरता के दौर से गुजर रही है।

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक व्यापार नीति ने विश्व अर्थव्यवस्था में नई बेचैनी पैदा कर दी है। टैरिफ को हथियार बनाकर अमेरिका ने कई देशों पर दबाव बनाने की रणनीति अपनाई है। भारत और ब्राजील दोनों ही इस नीति से प्रभावित हुए हैं। अमेरिकी बाजार में पहुंच को सीमित करने वाले शुल्कों ने इन देशों के निर्यातकों के सामने कठिनाइयां खड़ी की हैं। लेकिन यही दबाव भारत और ब्राजील को एक दूसरे के और करीब भी ले आया है।

प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति लूला की बातचीत में यह साफ संकेत मिला कि दोनों देश ग्लोबल साउथ की एकजुट आवाज को मजबूत करना चाहते हैं। वार्ता के दौरान व्यापार, रक्षा, ऊर्जा, कृषि, स्वास्थ्य और तकनीक जैसे क्षेत्रों में सहयोग की समीक्षा की गई और आगे बढ़ने के रास्तों पर भी चर्चा की गई। देखा जाये तो यह केवल द्विपक्षीय संबंधों की बात नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक सोच का हिस्सा है जिसमें उभरती अर्थव्यवस्थाएं मिलकर एकतरफा वैश्विक फैसलों का संतुलित जवाब देना चाहती हैं।

अब सवाल यह है कि भारत और ब्राजील ट्रंप के टैरिफ हथियार का जवाब किस तरह दे रहे हैं? पहला रास्ता है आपसी व्यापार और निवेश को बढ़ाना। यदि अमेरिकी बाजार बाधा बनता है तो भारत और ब्राजील एक दूसरे के लिए वैकल्पिक और भरोसेमंद बाजार बन सकते हैं। दूसरा रास्ता है बहुपक्षीय मंचों पर संयुक्त रुख। विश्व व्यापार संगठन और अन्य वैश्विक संस्थाओं में दोनों देश मिलकर यह सवाल उठा सकते हैं कि एकतरफा टैरिफ नीति अंतरराष्ट्रीय नियमों की भावना के खिलाफ है। तीसरा रास्ता है ग्लोबल साउथ के अन्य देशों को साथ जोड़ना, ताकि यह संघर्ष केवल दो या तीन देशों का न रहकर सामूहिक आवाज बन जाए।

इसे भी पढ़ें: गाजा बोर्ड ऑफ पीस की वैश्विक कशमकश

भारत और ब्राजील की साझेदारी की सामरिक अहमियत भी कम नहीं है। दोनों ही देश अपने अपने क्षेत्रों में प्रभावशाली शक्ति हैं। भारत एशिया में और ब्राजील लैटिन अमेरिका में नेतृत्वकारी भूमिका निभाता है। इन दोनों का साथ आना उत्तर दक्षिण संतुलन को नई दिशा देता है। रक्षा सहयोग से लेकर समुद्री सुरक्षा तक और अंतरिक्ष अनुसंधान से लेकर स्वच्छ ऊर्जा तक, दोनों देशों के पास साझा काम करने के अनेक अवसर हैं।

इस रिश्ते का एक और महत्वपूर्ण पहलू है लोकतांत्रिक मूल्य। भारत और ब्राजील दोनों बड़े लोकतंत्र हैं और बहुलतावाद में विश्वास रखते हैं। ऐसे समय में जब दुनिया में संरक्षणवाद और संकीर्ण राष्ट्रवाद बढ़ रहा है, इन देशों का मिलकर बहुपक्षवाद की वकालत करना वैश्विक राजनीति में संतुलन पैदा करता है। यह संदेश जाता है कि वैश्विक शासन केवल ताकतवर देशों की मर्जी से नहीं चल सकता।

देखा जाये तो ब्राजील के राष्ट्रपति का भारत दौरा प्रतीकात्मक भी है और व्यावहारिक भी। प्रतीकात्मक इसलिए कि यह ग्लोबल साउथ की एकजुटता का संदेश देता है और व्यावहारिक इसलिए कि इससे ठोस समझौते और योजनाएं सामने आ सकती हैं। कृषि उत्पादों का आदान प्रदान, फार्मा और स्वास्थ्य सहयोग, डिजिटल तकनीक और स्टार्टअप साझेदारी जैसे क्षेत्रों में दोनों देश एक दूसरे की पूरक क्षमताओं का लाभ उठा सकते हैं।

वैश्विक स्तर पर भारत ब्राजील संबंधों का असर संयुक्त राष्ट्र सुधार की मांग से लेकर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग तक देखा जा सकता है। दोनों देश लंबे समय से यह कहते आए हैं कि मौजूदा वैश्विक संस्थाएं आज की दुनिया की वास्तविकताओं को सही ढंग से नहीं दर्शातीं। जब भारत और ब्राजील एक स्वर में यह बात कहते हैं तो उसका वजन कई गुना बढ़ जाता है।

इसलिए यह कहा जा सकता है कि ट्रंप की टैरिफ नीति ने अनजाने में भारत और ब्राजील को एक साझा रणनीतिक रास्ते पर ला खड़ा किया है। यह साझेदारी किसी एक देश के खिलाफ नहीं बल्कि एकतरफा दबाव की राजनीति के खिलाफ है। आने वाले समय में यदि भारत और ब्राजील अपने सहयोग को गहराई देते हैं, तो वे न केवल अपने आर्थिक हितों की रक्षा कर पाएंगे बल्कि ग्लोबल साउथ के लिए एक नई दिशा भी तय करेंगे।

बहरहाल, यह संबंध केवल वर्तमान की जरूरत नहीं बल्कि भविष्य की तैयारी है। एक ऐसा भविष्य जहां वैश्विक फैसले सहयोग से होंगे, दबाव से नहीं। भारत और ब्राजील की बढ़ती नजदीकी इसी उम्मीद का संकेत देती है।

Continue reading on the app

गाजा बोर्ड ऑफ पीस की वैश्विक कशमकश

गाजा बोर्ड ऑफ पीस अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एक महत्वाकांक्षी पहल है, जो गाजा संघर्ष को सुलझाने के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर शांति स्थापना का एक नया मॉडल प्रस्तुत करती है। चूंकि यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र संघ के पारंपरिक ढांचे से बाहर काम करने का अदद प्रयास है, जिससे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में नई बहस छिड़ गई है। खासकर वैश्विक कशमकश बढ़ चुकी है, जिसके वैश्विक प्रभाव आने वाले वक्त में महसूस किए जाएंगे।

सवाल है कि आखिर अपनी ही बनाई पुरानी विश्व व्यवस्था की अनदेखी करते हुए अमेरिका बिल्कुल नई तरह की विश्व व्यवस्था क्यों बनाना चाहता है? ब्रेक के बाद वह अपनी ही नीतियों को क्यों बदल देता है। आखिर वह शेष दुनिया को अमेरिकी मुगालते में क्यों रखना चाहता है? आखिर चीन, रूस, भारत, फ्रांस, जर्मनी, नॉर्वे, स्वीडन जैसे कद्दावर देश ऐसे पीस बोर्ड से दूरी क्यों बनाए हुए हैं? खास बात यह कि आखिर गाजा बोर्ड ऑफ पीस के अंतर्राष्ट्रीय मायने क्या हैं? और इसके पीछे के वैश्विक निहितार्थ से किसको क्या फायदा और क्षति होने के कयास लगाये जा रहे हैं? 

आइए सबसे पहले इस बोर्ड के स्वरूप को जान लेते हैं। बता दें कि अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने 2025 में इसकी शुरुआत की, जहां खुद ही वे ही यानी पदेन अमेरिकी राष्ट्रपति इसके प्रमुख होंगे और अन्य सदस्य देश तीन-तीन साल के लिए चुने जाएंगे। वहीं, इसकी स्थायी सदस्यता के लिए 1 अरब डॉलर का योगदान जरूरी है, जबकि कार्यकारी बोर्ड में मार्को रुबियो, जेरेड कुशनर जैसे नाम शामिल हैं। यह बोर्ड गाजा के पुनर्निर्माण, प्रशासन और क्षेत्रीय समन्वय पर केंद्रित है। 

अलबत्ता, इसके गठन को लेकर जो वैश्विक प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं उसमें अमेरिका के पिछलग्गू देश यानी पाकिस्तान, सऊदी अरब, कतर, तुर्की, यूएई जैसे 35 से अधिक देशों ने इसमें अपनी भागीदारी की पुष्टि की है। जबकि चीन, फ्रांस, नॉर्वे, स्वीडन ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ बताकर खारिज कर दिया है। खास बात यह है कि भारत जैसे अहम वैश्विक खिलाड़ी ने फिलिस्तीन समर्थन और यूएन-आधारित दो-राज्य समाधान की नीति के चलते अभी इस पर चुप्पी साध रखी है। 

जहां तक गाजा पीस बोर्ड के भविष्य के निहितार्थ की बात है तो यह बोर्ड यूएनएससी के समानांतर वैकल्पिक तंत्र बन सकता है, जो वैश्विक संघर्षों में मध्यस्थता करेगा। क्योंकि इसे यूएनओ ने 2027 तक सीमित मान्यता दी है, लेकिन रूस-चीन की असहमति से विवाद बढ़ा है। जबकि भारत जैसे उभरते गुटनिरपेक्ष देशों के लिए यह कूटनीतिक संतुलन की परीक्षा की घड़ी है। यही वजह है कि गाजा बोर्ड ऑफ पीस की अंतरराष्ट्रीय वैधता सीमित और विवादास्पद बनी हुई है, क्योंकि यह यूएनएससी प्रस्ताव 2803 (2025) से 2027 तक की अस्थायी मंजूरी पर टिकी है। 

इसे भी पढ़ें: नाम है Board of Peace, मगर इसने दुनिया भर के नेताओं के मन की शांति छीन ली है

देखा गया कि रूस-चीन जैसे देशों की असहमति से इसकी वैश्विक स्वीकार्यता कमजोर है, जो अंतरराष्ट्रीय कानून पर सवाल उठाती है। जहां तक इसकी वैधता के आधार की बात है तो यूएनएससी ने इसे गाजा पुनर्निर्माण और विसैन्यीकरण के लिए अंतरिम वैधता प्रदान की, लेकिन यूएनओ के पूर्ण नियंत्रण के बिना। मसलन, बोर्ड को "अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यक्तित्व" दिया गया, जो फिलिस्तीनी तकनीशियनों की समिति और बहुराष्ट्रीय शांति बल के माध्यम से कार्य करता है। हालांकि, सदस्य चयन और जवाबदेही की कमी से इसकी आलोचना भी हो रही है।

जहां तक गाजा पीस बोर्ड के संभावित प्रभाव की बात है तो यह यूएनओ के समानांतर तंत्र के रूप में यूएनओ की एकाधिकार को चुनौती दे सकता है, खासकर वैश्विक संघर्षों में। वहीं, ट्रंप की आजीवन अध्यक्षता जैसी संरचना से लंबे समय में वैधता संकट गहरा सकता है। जबकि भारत जैसे देशों की चुप्पी से बहुपक्षीय संस्थाओं की प्रासंगिकता पर बहस तेज हो रही है। कहना न होगा कि रूस और चीन का गाजा बोर्ड ऑफ पीस में असहयोग अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों को कमजोर करता है, लेकिन बोर्ड की वैधता को पूरी तरह समाप्त नहीं करता। 

दरअसल यह असहमति बहुपक्षीय संस्थाओं की प्रासंगिकता पर सवाल उठाती है और वैकल्पिक गठबंधनों को बढ़ावा दे सकती है। जहां तक इस बोर्ड के कानूनी आधार की बात है तो रूस-चीन ने बोर्ड को यूएन चार्टर के अनुच्छेद 2(4) के तहत "शक्ति राजनीति" का माध्यम बताकर खारिज किया, जो क्षेत्रीय संप्रभुता के हस्तक्षेप को प्रतिबंधित करता है। यूएनएससी प्रस्ताव 2803 की अस्थायी मंजूरी के बावजूद, इनकी वीटो शक्ति से स्थायी वैधता अवरुद्ध हो सकती है। 

जहां तक गाजा पीस बोर्ड के अंतरराष्ट्रीय निहितार्थ की बात है तो यह बोर्ड को "सॉफ्ट पावर" तंत्र तक सीमित रखेगा, जहां अमेरिकी प्रभाव वाले देश ही मान्यता देंगे। जबकि लंबे समय में, यह अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में चुनौतियां जन्म दे सकता है, जैसे फिलिस्तीन या प्रभावित देशों द्वारा ICJ में अपील पहल संभव है। वहीं, भारत जैसे तटस्थ देशों को भी अतिरिक्त कूटनीतिक दबाव झेलना पड़ेगा। 

देखा जाए तो भारत गाजा बोर्ड ऑफ पीस पर रणनीतिक चुप्पी अपनाए हुए है, जो बहुपक्षीय संस्थाओं को प्राथमिकता और संतुलित कूटनीति को दर्शाता है। भारत का यह रुख फिलिस्तीन समर्थन, इसराइल के साथ मजबूत संबंधों और यूएन सुधारों पर जोर को अधिक संतुलित करता है। दरअसल भारत की चुप्पी के कारण हैं, क्योंकि वह डांवांडोल अमेरिकी कूटनीति पर ज्यादा एतबार नहीं कर सकता है। भारत के साथ अमेरिकी नीतिगत चालबाजी के चलते ही इंडिया ने दावोस 2026 में गाजा बोर्ड ऑफ पीस के लॉन्च में भाग नहीं लिया, क्योंकि यह यूएन प्रस्तावों पर आधारित दो-राज्य समाधान से भटकता दिखता है।

चूंकि पीएम मोदी ब्राजील, जर्मनी, जापान और भारत जैसे जी-फोर (G4) देशों के साथ यूएनएससी विस्तार पर फोकस कर रहे हैं, न कि अमेरिकी वैकल्पिक तंत्र पर। इसलिए भी भारत ने इससे दूरी दिखाई है। इसके अलावा, इस बोर्ड में अमेरिकी पिल्ले पाकिस्तान की भागीदारी से भी भारत को क्षेत्रीय संतुलन की चिंता है। इसलिए भारत भविष्य की रणनीति पर बल दे रहा है। अपनी इसी कूटनीति के तहत भारत यूएन सुधारों को आगे बढ़ाते हुए ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करेगा, और गाजा बोर्ड ऑफ पीस को अप्रत्यक्ष रूप से निगरानी में रखेगा। वहीं, यदि यह बोर्ड वैश्विक संघर्षों में विस्तार चाहेगा, तो भारत तटस्थता बनाए रखकर ICJ या यूएन मंचों पर सक्रिय हो सकता है। इसप्रकार भारत की यह "रणनीतिक स्वायत्तता" वाली नीति उसकी लंबी परंपरा को मजबूत करती है। 

कुलमिलाकर भारत की गाजा बोर्ड ऑफ पीस पर चुप्पी रणनीतिक स्वायत्तता और बहुपक्षीय कूटनीति को मजबूत करने की नीति का हिस्सा है। भारत का यह रुख फिलिस्तीन समर्थन, इसराइल के साथ सैन्य सहयोग और अमेरिकी दबाव से संतुलन बनाए रखने के लिए अपनाया गया है। जहाँ तक ऐतिहासिक फिलिस्तीन नीति की बात है तो भारत ने 1947 से फिलिस्तीन के आत्मनिर्णय और दो-राज्य समाधान का समर्थन किया है, जो यूएन प्रस्तावों पर आधारित है। जबकि ट्रंप का यह बोर्ड यूएन ढांचे से बाहर होने के चलते भारत ने इसका खुला समर्थन टाल दिया, ताकि ग्लोबल साउथ में विश्वसनीयता बनी रहे। इससे इसराइल-अमेरिका संतुलन भी बना रहेगा। 

चूंकि इसराइल के साथ रक्षा सौदे (जैसे स्पाइस मिसाइलें) और अमेरिका से तकनीकी सहयोग महत्वपूर्ण हैं, लेकिन बोर्ड में पाकिस्तान की मौजूदगी से क्षेत्रीय जोखिम बढ़ता है। लिहाजा भारत की चुप्पी कूटनीतिक लचीलापन देती है, जहां भारत मानवीय सहायता जारी रख सकता है बिना राजनीतिक बंधन के। वहीं भारत यूएन सुधार पर फोकस कर रहा है, जहां पीएम मोदी G4 (भारत-ब्राजील-जर्मनी-जापान) के साथ यूएनएससी विस्तार पर जोर दे रहे हैं, न कि वैकल्पिक तंत्रों पर। इसप्रकार यह "देखो और इंतजार करो" रणनीति बोर्ड की वैधता की परीक्षा के बाद निर्णय लेगी। 

यह ठीक है कि भारत को गाजा बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने से कूटनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक लाभ मिल सकते हैं, खासकर अमेरिका के साथ मजबूत साझेदारी को देखते हुए।  हालांकि, यह फिलिस्तीन नीति और ग्लोबल साउथ की विश्वसनीयता से टकरा सकता है। जहां तक इसके कूटनीतिक लाभ की बात है तो भारत को अमेरिका-इसराइल के साथ उच्च-स्तरीय पहुंच मिलेगी, जो मध्य पूर्व में प्रभाव बढ़ाएगा। वहीं वैश्विक शांति मंच पर नेतृत्वकारी भूमिका से यूएनएससी स्थायी सदस्यता की दावेदारी मजबूत होगी। इसलिए यहां पर पाकिस्तान की मौजूदगी के बावजूद, भारत अपना अलग पहचान बना सकता है।

जहां तक भारत के लिए आर्थिक अवसर की बात है तो गाजा की पुनर्निर्माण परियोजनाओं में भारतीय कंपनियां (जैसे L&T) को अनुबंध मिल सकते हैं, जो बुनियादी ढांचे निर्यात को बढ़ावा देंगे। वहीं, इसकी स्थायी सदस्यता के लिए 1 अरब डॉलर निवेश से लंबे समय में लाभदायक साझेदारी बन सकती है। जहां तक रणनीतिक फायदे की बात है तो मानवीय सहायता के जरिए गाजा में सॉफ्ट पावर बढ़ेगा, जो इसराइल से रक्षा सौदों को सुरक्षित रखेगा। वहीं बोर्ड के विस्तार से अन्य क्षेत्रीय विवादों में मध्यस्थता का मौका मिलेगा। 

गाजा बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने से भारत को अमेरिका के साथ कूटनीतिक साझेदारी मजबूत करने और मध्य पूर्व में प्रभाव बढ़ाने का प्रमुख लाभ मिलेगा। यह वैश्विक शांति पहलों में नेतृत्वकारी भूमिका प्रदान करेगा, जो यूएनएससी स्थायी सदस्यता की दावेदारी को बल देगा। इससे अमेरिका के साथ निकटता बढ़ेगी। ट्रंप प्रशासन के कोर सदस्यों (जैसे जेरेड कुशनर) के साथ प्रत्यक्ष संवाद से द्विपक्षीय संबंधों में गहराई आएगी। QUAD और I2U2 जैसे मंचों का विस्तार संभव होगा, जो इंडो-पैसिफिक रणनीति को मजबूत करेगा। 

जहां तक मध्य पूर्व प्रभाव की बात है तो सऊदी, यूएई जैसे सहयोगियों के साथ संयुक्त मंच पर भारत की आवाज मजबूत होगी, जो ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार समझौतों को आसान बनाएगा। वहीं पाकिस्तान की उपस्थिति के बावजूद, भारत क्षेत्रीय मध्यस्थ के रूप में उभर सकता है। इससे उसकी वैश्विक छवि मजबूत होगी। ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधि के नाते मानवीय योगदान से सॉफ्ट पावर बढ़ेगा, जो फिलिस्तीन नीति को संतुलित रखते हुए इसराइल सहयोग को सुरक्षित करेगा। दावोस जैसे मंचों पर नेतृत्व से बहुपक्षीय कूटनीति में नया स्थान बनेगा। 

भारत का गाजा बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने का निर्णय पड़ोसी देशों, खासकर पाकिस्तान पर महत्वपूर्ण कूटनीतिक प्रभाव डालेगा। यह क्षेत्रीय संतुलन को बदल सकता है, जहां पाकिस्तान की मौजूदा भागीदारी के बावजूद भारत का प्रवेश प्रतिस्पर्धा बढ़ाएगा। इसका पाकिस्तान पर प्रभाव पड़ेगा। पाकिस्तान ने पहले ही समर्थन की घोषणा की है, लेकिन भारत की भागीदारी से बोर्ड में द्विपक्षीय तनाव उभर सकता है। यह कश्मीर जैसे मुद्दों पर अप्रत्यक्ष दबाव डालेगा, क्योंकि अमेरिकी मंच पर भारत की मजबूत उपस्थिति पाकिस्तान को अलग-थलग कर सकती है।

जहां तक अन्य पड़ोसियों पर असर की बात है तो बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देशों को मध्य पूर्व शांति पहल से अप्रत्यक्ष लाभ मिलेगा, जैसे मानवीय सहायता और व्यापार मार्ग। हालांकि, चीन के प्रभाव वाले नेपाल-मालदीव में भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका से संतुलन की होड़ तेज हो सकती है। जहां तक क्षेत्रीय संतुलन की बात है तो कुल मिलाकर, यह निर्णय दक्षिण एशिया में भारत को अमेरिका-प्रायोजित मंचों पर नेतृत्व देगा, जो SAARC जैसे क्षेत्रीय मंचों को कमजोर कर सकता है। पड़ोसी देशों को नई कूटनीतिक गतिशीलता का सामना करना पड़ेगा। 

भारत का गाजा बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होना क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग में अमेरिका-केंद्रित गठबंधनों को मजबूत कर सकता है, लेकिन पाकिस्तान के साथ तनाव बढ़ा सकता है। यह QUAD और I2U2 जैसे मंचों को मध्य पूर्व तक विस्तार देगा, जहां भारत की भूमिका बढ़ेगी। वहीं दक्षिण एशिया में बदलाव भी होगा। खासकर पाकिस्तान की बोर्ड उपस्थिति के बावजूद भारत का प्रवेश कूटनीतिक प्रतिस्पर्धा लाएगा, जो कश्मीर जैसे मुद्दों पर अप्रत्यक्ष दबाव डालेगा। वहीं SAARC जैसे पारंपरिक मंच कमजोर हो सकते हैं, जबकि द्विपक्षीय सुरक्षा संवाद (भारत-श्रीलंका, भारत-बांग्लादेश) मजबूत होंगे। जहां तक इसके व्यापक सुरक्षा प्रभाव की बात है तो चीन के असहयोग से इंडो-पैसिफिक में नया ध्रुवीकरण हो सकता है, जहां भारत अमेरिका के साथ समुद्री सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी सहयोग बढ़ाएगा। वहीं पड़ोसी देशों को नई गतिशीलता का सामना करना पड़ेगा, जैसे नेपाल-मालदीव में संतुलन की होड़। 

गाजा बोर्ड ऑफ पीस में भारत की भागीदारी से समुद्री सुरक्षा सहयोग में इंडो-पैसिफिक और मध्य पूर्व की ओर विस्तार होगा, जहां QUAD और I2U2 जैसे गठबंधनों को मजबूती मिलेगी। वहीं अमेरिका के साथ संयुक्त नौसैनिक अभ्यास बढ़ेंगे, जो हिंद महासागर में चीन के प्रभाव को संतुलित करेंगे। जहां तक हिंद महासागर फोकस की बात है तो भारत को गाजा तट से लाल सागर तक समुद्री मार्गों की निगरानी में भूमिका मिलेगी, जो ऊर्जा आपूर्ति और व्यापार सुरक्षा को मजबूत करेगा। वहीं मालदीव, श्रीलंका जैसे पड़ोसियों के साथ कोलंबो सिक्योरिटी कॉन्क्लेव (CSC) के तहत क्षमता निर्माण तेज होगा। जहां तक रणनीतिक बदलाव की बात है तो पाकिस्तान की बोर्ड उपस्थिति से अरब सागर में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, लेकिन भारत अमेरिकी खुफिया साझा करने से पनडुब्बी निगरानी और एंटी-पाइरेसी ऑपरेशंस में आगे रहेगा। कुल मिलाकर, यह SAGAR विजन को मध्य पूर्व तक ले जाएगा। 

- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

Continue reading on the app

  Sports

अर्शदीप सिंह के नाम शर्मनाक रिकॉर्ड, मैच के पहले ही ओवर में खर्च किए इतने सारे रन

Arshdeep Singh Expensive 1st Over: न्यूजीलैंड के खिलाफ टी20 सीरीज के दूसरे मैच में भारतीय तेज गेंदबाज अर्शदीप सिंह काफी महंगे साबित हुए. उन्होंने पहले ही ओवर में जमकर रन लुटाकर एक शर्मनाक रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया. Fri, 23 Jan 2026 20:24:14 +0530

  Videos
See all

UP Blackout : UP के 75 जिलों में बिजली कटने के बाद बजा सायरन, छाया अंधेरा, हुआ ब्लैकआउट | Lucknow #tmktech #vivo #v29pro
2026-01-23T15:10:21+00:00

News Ki Pathshala | Sushant Sinha | Pakistan के उकसावे में Bangladesh बर्बाद ? | Hindi News #tmktech #vivo #v29pro
2026-01-23T15:00:49+00:00

ChakraView | Sumit Awasthi | Shashi Tharoor कांग्रेस के साथ या करेंगे दो-दो हाथ? | Kerala | PM Modi #tmktech #vivo #v29pro
2026-01-23T15:15:06+00:00

Shankaracharya: हिंदुओं पर अविमुक्तेश्वरानंद का ऐलान! देखिये Aishwarya का Agenda R Bharat पर #tmktech #vivo #v29pro
2026-01-23T15:03:59+00:00
Editor Choice
See all
Photo Gallery
See all
World News
See all
Top publishers