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Donald Trump के दावे की ईरान ने खोली पोल, 800 फांसी पर Prosecutor बोले- ये सरासर झूठ है

ईरान के शीर्ष अभियोजक ने शुक्रवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के उन बार-बार किए गए दावों को पूरी तरह से झूठा बताया कि उन्होंने वहां हिरासत में लिए गए 800 प्रदर्शनकारियों की फांसी रोक दी है। इस बीच, कार्यकर्ताओं के अनुसार, देशव्यापी प्रदर्शनों पर हुई खूनी कार्रवाई में मरने वालों की कुल संख्या बढ़कर कम से कम 5,032 हो गई है। कार्यकर्ताओं को आशंका है कि मरने वालों की संख्या इससे कहीं अधिक है। ईरान के इतिहास में सबसे व्यापक इंटरनेट ब्लैकआउट को दो सप्ताह से अधिक समय हो चुका है, ऐसे में वे जानकारी की पुष्टि करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

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अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बना हुआ है क्योंकि एक अमेरिकी विमानवाहक पोत समूह मध्य पूर्व के करीब पहुंच रहा है, जिसे ट्रम्प ने गुरुवार देर रात पत्रकारों से बातचीत में विमानजरा के समान बताया। विश्लेषकों का कहना है कि सैन्य शक्ति में वृद्धि से ट्रम्प को हमले करने का विकल्प मिल सकता है, हालांकि तेहरान को बार-बार चेतावनी देने के बावजूद उन्होंने अभी तक ऐसा नहीं किया है। कैदियों का सामूहिक नरसंहार सैन्य बल के लिए उनकी लाल रेखाओं में से एक था - दूसरी शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की हत्या थी। न्यूयॉर्क स्थित थिंक टैंक सूफान सेंटर ने शुक्रवार को एक विश्लेषण में कहा, "हालांकि राष्ट्रपति ट्रम्प अब क्षेत्रीय नेताओं के दबाव में आकर और यह समझते हुए कि केवल हवाई हमले शासन को गिराने के लिए अपर्याप्त होंगे, पीछे हटते दिख रहे हैं, फिर भी सैन्य संपत्तियों को क्षेत्र में भेजा जा रहा है, जो संकेत देता है कि अभी भी सैन्य कार्रवाई हो सकती है।

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ईरान के शीर्ष अभियोजक ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस दावे को ‘पूरी तरह झूठा’ बताकर खारिज कर दिया कि देश भर में विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिरासत में लिए गए 800 लोगों की फांसी उनके दखल देने की वजह से रुकी है। ईरान की न्यायपालिका की समाचार एजेंसी ‘मिजान’ ने देश के शीर्ष अभियोजक मोहम्मद मोवाहेदी की टिप्पणी का हवाला दिया है। इससे फिर सवाल उठता है कि क्या देश भर में हो रहे विरोध प्रदर्शनों को लेकर बड़ी संख्या में लोगों को फांसी दी जाएगी? अधिकारियों ने पहले ही कहा है कि कुछ कैदियों पर ऐसे आरोप हैं जिनमें मौत की सजा दी जा सकती है। ‘मिजान’ के मुताबिक, मोवाहेदी ने कहा, “यह दावा पूरी तरह से झूठा है; ऐसी कोई संख्या उपलब्ध नहीं है, और न ही न्यायपालिका ने ऐसा कोई फैसला लिया है।” ट्रंप ने कहा है कि बड़े पैमाने पर फांसी देना और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को मारना, दोनों ही ईरान पर संभावित अमेरिकी सैन्य हमले के लिए ‘रेड लाइन’ (सीमारेखा) हैं।

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Kurdish SDF ने क्यों छोड़ा मोर्चा? ISIS आतंकियों से भरी जेल अब Syrian Army के हवाले

सीरिया के उत्तर-पूर्वी हिस्से में लगभग किसी भी देश द्वारा मान्यता प्राप्त न किए गए रेगिस्तान में स्थित विशाल अल-होल शिविर वर्षों से एक जटिल समस्या बना हुआ था। एक दयनीय और लगातार खतरनाक होता जा रहा बंदी शिविर, जहाँ आईएसआईएस की विचारधारा जीवित थी। सीरियाई कुर्द बलों ने शिविर की सुरक्षा और प्रशासन किया और वहाँ हजारों महिलाओं और बच्चों को बंदी बनाया। ये बंदी इस्लामिक स्टेट के स्व-घोषित खिलाफत का हिस्सा थे, जिसे इस आतंकवादी समूह ने 2014 में सीरिया और इराक के बड़े हिस्से पर कब्जा करने के बाद स्थापित किया था, और जिसे 2019 में अमेरिकी और कुर्द बलों ने पराजित किया था। कुर्द नेतृत्व वाली सीरियाई डेमोक्रेटिक फोर्सेज (एसडीएफ) ने एक बयान में कहा कि  आईएसआईएस मुद्दे के प्रति अंतरराष्ट्रीय समुदाय की उदासीनता और इस गंभीर मामले को सुलझाने में अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में उसकी विफलता के कारण, हमारी सेनाओं को अल-होल शिविर से पीछे हटने और पुनः तैनात होने के लिए मजबूर होना पड़ा।

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सीरिया और कुर्दिश लड़ाकों के बीच हुए एक समझौते के पश्चात कुर्द लड़ाकों के उत्तरी क्षेत्र से हटने के बाद सीरियाई सरकारी बलों ने शुक्रवार को उस जेल पर नियंत्रण कर लिया जिसमें इस्लामिक स्टेट (आईएस) समूह से जुड़े आतंकवादी बंद हैं। सीरियाई गृह मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि सरकार के जेल प्राधिकरण को रक्का के उत्तर में स्थित अल-अकतान जेल का प्रभार सौंप दिया गया है और बंदियों की फाइलों की समीक्षा की जा रही है। अल-अकतान जेल दूसरी जेल है जिस पर सरकार का पुन: नियंत्रण हुआ है। इससे पहले सोमवार को सेना ने इराक सीमा के पास स्थित शद्दादेह जेल में प्रवेश किया था जहां हुई अराजकता के कारण आईएस के 120 कैदी भागने में कामयाब रहे थे। सरकारी मीडिया के अनुसार, उनमें से अधिकतर को फिर से पकड़ लिया गया है। अल-अकतान जेल पर सीरियाई बलों के नियंत्रण का कदम अमेरिकी सेना द्वारा यह कहे जाने के दो दिन बाद उठाया गया है कि उसने उत्तर-पूर्वी सीरिया में कुर्द नीत सीरियाई डेमोक्रेटिक फोर्सेज (एसडीएफ) के नियंत्रण वाले कई नजरबंदी केंद्रों में रखे गए आईएस के 9,000 बंदियों में से कुछ को स्थानांतरित करना शुरू कर दिया है। पिछले एक दशक में सीरिया में आईएस से लड़ने वाला मुख्य बल एसडीएफ था और मार्च 2019 में उसने चरमपंथियों के कब्जे वाली जमीन के आखिरी छोटे से हिस्से पर कब्जा कर लिया था। 

 

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  Sports

T20 World Cup 2026 से बाहर हो सकता है बांग्लादेश, सरकार के आदेश से बढ़ा संकट

बांग्लादेश के टी20 विश्व कप 2026 में खेलने की संभावनाएं लगभग खत्म होती नजर आ रही हैं। गुरुवार को हालात उस वक्त और बिगड़ गए जब बांग्लादेश सरकार के खेल सलाहकार आसिफ नज़रुल ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड और खिलाड़ियों को भारत की यात्रा न करने का निर्देश दे दिया है।

बता दें कि यह फैसला व्यावहारिक रूप से बांग्लादेश के टूर्नामेंट से बाहर होने की पुष्टि जैसा माना जा रहा है। मौजूद जानकारी के अनुसार, आईसीसी आज या कल आधिकारिक बयान जारी कर सकता है और बांग्लादेश की जगह स्कॉटलैंड को शामिल किए जाने का ऐलान संभव माना जा रहा है।

गौरतलब है कि क्रिकेट के दीवानों वाला देश बांग्लादेश हमेशा वैश्विक टूर्नामेंटों में अपनी मौजूदगी से रोमांच बढ़ाता रहा है। ऐसे में इस पूरे घटनाक्रम को बांग्लादेश क्रिकेट के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। जानकारों का कहना है कि अगर राजनीतिक और बाहरी दबाव बीच में न आते, तो इस स्थिति से बचा जा सकता था।

दरअसल, बांग्लादेश की भागीदारी पर सवाल उस वक्त से उठने लगे थे, जब बीसीसीआई ने कोलकाता नाइट राइडर्स से मुस्तफिज़ुर रहमान को रिलीज़ करने को कहा था। उस फैसले को बांग्लादेश में हुई कथित घटनाओं से जोड़कर देखा गया था। इसके बाद आईसीसी ने बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड को 24 घंटे का समय दिया था, ताकि वह अपनी स्थिति स्पष्ट कर सके। उस दौरान खिलाड़ियों को उम्मीद थी कि सरकार उनका साथ देगी।

लेकिन जब सरकार की ओर से सीधे निर्देश जारी हुए, तो हालात और जटिल हो गए। पीटीआई की एक रिपोर्ट के अनुसार, खिलाड़ी सार्वजनिक रूप से कुछ भी कहने से बचते दिखे। बताया गया है कि हालिया घटनाओं के चलते टीम के भीतर एक डर का माहौल बन गया है।

इसी बीच बांग्लादेश क्रिकेट के वरिष्ठ खिलाड़ी तमीम इक़बाल को लेकर भी विवाद सामने आया। गौरतलब है कि तमीम ने बोर्ड से भावनाओं में बहकर फैसला न लेने की अपील की थी। इसके बाद बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड के पूर्व अधिकारी एम नज़मुल इस्लाम ने उन्हें “भारतीय एजेंट” तक कह दिया था। इस बयान पर खिलाड़ियों में गहरा रोष देखने को मिला।

हालांकि नज़मुल इस्लाम ने बाद में अपने पद से इस्तीफा दे दिया, लेकिन इस टिप्पणी ने खिलाड़ियों के मन पर गहरी छाप छोड़ी है। मौजूदा हालात में बांग्लादेश क्रिकेट एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां खेल से ज़्यादा राजनीति और सुरक्षा जैसे मुद्दे फैसलों को प्रभावित करते नजर आ रहे हैं।

अब सबकी नजरें आईसीसी के अगले कदम पर टिकी हैं, क्योंकि उसका फैसला न सिर्फ टूर्नामेंट की तस्वीर बदलेगा, बल्कि बांग्लादेश क्रिकेट के भविष्य की दिशा भी तय करेगा।
Fri, 23 Jan 2026 21:01:24 +0530

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