दिल्ली: सिख फॉर जस्टिस के आतंकी पन्नु के खिलाफ एफआईआर दर्ज
नई दिल्ली, 23 जनवरी (आईएएनएस)। दिल्ली पुलिस ने शुक्रवार को सिख फॉर जस्टिस (एसएफजे) के नेता गुरपतवंत सिंह पन्नू के खिलाफ 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस समारोह से पहले राष्ट्रीय राजधानी में अशांति फैलाने की कथित धमकियों के आरोप में एफआईआर दर्ज की।
अधिकारियों के अनुसार, दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 196, 197, 152 और 61 के तहत एफआईआर दर्ज की है। ये प्रावधान आपराधिक साजिश, भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्यों और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने वाले अन्य अपराधों से संबंधित हैं।
पुलिस सूत्रों ने बताया कि यह कार्रवाई सोशल मीडिया पर सर्कुलेट हुए एक वीडियो के बाद शुरू की गई, जिसमें पन्नू ने कथित तौर पर गणतंत्र दिवस के आसपास दिल्ली को निशाना बनाने की धमकियां दी थीं। वीडियो में पन्नू ने दावा किया कि रोहिणी और डाबरी जैसे इलाकों में तथाकथित स्लीपर सेल के जरिए खालिस्तान समर्थक पोस्टर चिपकाए गए हैं।
हालांकि, बताए गए स्थानों पर वेरिफिकेशन और तलाशी के बाद स्पेशल सेल ने कहा कि अब तक ऐसे कोई पोस्टर नहीं मिले हैं। वीडियो के सोर्स और एसएफजे नेता द्वारा किए गए दावों के पीछे के इरादे का पता लगाने के लिए जांच जारी है।
इस बीच, एक अलग घटना में गुरुवार को भारत ने क्रोएशिया में भारतीय दूतावास में घुसपैठ और खालिस्तानी कार्यकर्ताओं द्वारा राष्ट्रीय ध्वज को नुकसान पहुंचाने की कड़ी निंदा की। विदेश मंत्रालय (एमईए) ने कहा कि इस घटना के दोषियों की पहचान की जानी चाहिए और उन्हें जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।
यह घटना विदेशों में भारतीय राजनयिक मिशनों को निशाना बनाने वाले खालिस्तानी तत्वों द्वारा की गई कार्रवाइयों की श्रृंखला में नवीनतम थी। जबकि ऐसे अधिकांश मामले पहले कनाडा, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका से सामने आए थे, क्रोएशिया की घटना ने नई चिंताएं बढ़ा दी हैं। जाग्रेब में भारतीय दूतावास को 27 जनवरी को नई दिल्ली में होने वाले भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन से कुछ दिन पहले निशाना बनाया गया था।
पन्नू द्वारा शेयर किए गए एक वीडियो में एक खालिस्तानी कार्यकर्ता कथित तौर पर जाग्रेब में दूतावास परिसर में घुसते हुए भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को हटाते हुए और उसकी जगह खालिस्तान का झंडा लगाते हुए दिखाया गया है। वीडियो से पता चलता है कि यह घटना 22 जनवरी को हुई थी।
--आईएएनएस
पीएसके
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
गूगल और मेटा से विवादित विज्ञापन हटाने की मांग, अमेरिकी सांसदों ने उठाए सवाल
वाशिंगटन, 23 जनवरी (आईएएनएस)। अमेरिका के दो वरिष्ठ डेमोक्रेट लॉमेकर्स ने टेक दिग्गज कंपनी मेटा और गूगल पर गंभीर आरोप लगाए हैं। सांसदों का कहना है कि अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (डीएचएस) और उसकी एजेंसी इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट (आईसीई) इन प्लेटफॉर्म्स पर ऐसे विज्ञापन चला रही है, जिनमें श्वेत राष्ट्रवादी विचारधारा और भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है।
हाउस ज्यूडिशियरी कमेटी की उपाध्यक्ष बेका बैलिंट और इमिग्रेशन प्रवर्तन की निगरानी करने वाली उपसमिति की प्रमुख, भारतीय मूल की सांसद प्रमिला जयपाल ने मेटा और गूगल के सीईओ को अलग-अलग पत्र भेजे हैं। इन पत्रों में उन्होंने मांग की है कि डीएचएस के साथ डिजिटल विज्ञापन से जुड़ी सभी साझेदारियां तुरंत खत्म की जाएं और यह बताया जाए कि कंपनियों के बीच समझौते का दायरा और अवधि क्या है।
सांसदों का कहना है कि आईसीई इन विज्ञापनों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर भर्ती अभियान के लिए कर रही है। इसके तहत मिनियापोलिस, शिकागो, पोर्टलैंड और न्यू ऑरलियन्स जैसे शहरों में हजारों नए अधिकारियों को तैनात करने की योजना है। आरोप है कि इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए भर्ती मानकों में भी ढील दी गई है।
पत्रों में दावा किया गया है कि आईसीई ने ऐसे विज्ञापन चलाए हैं, जिनमें श्वेत राष्ट्रवादी प्रेरित प्रचार की झलक मिलती है। फेसबुक और इंस्टाग्राम पर ये विज्ञापन उन लोगों को दिखाए जा रहे हैं जो स्पेनिश भाषा, मैक्सिकन खाने या लैटिन संगीत में रुचि रखते हैं, ताकि उन पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया जा सके।
सांसदों के अनुसार, पिछले 90 दिनों में डीएचएस ने सेल्फ-डिपोर्टेशन, यानी खुद देश छोड़ने को बढ़ावा देने वाले विज्ञापनों पर 10 लाख डॉलर से ज्यादा खर्च किए हैं। इसके अलावा, गूगल और यूट्यूब पर स्पेनिश भाषा में ऐसे विज्ञापनों पर करीब 30 लाख डॉलर खर्च किए गए। बताया गया कि पिछले साल आईसीई ने मेटा और गूगल पर कुल मिलाकर लगभग 58 लाख डॉलर के विज्ञापन चलाए।
सांसदों ने एक इंस्टाग्राम विज्ञापन का उदाहरण भी दिया, जिसमें लिखा था, हमारा घर फिर से हमारा होगा। सांसदों का कहना है कि यह नारा अक्सर कट्टरपंथी और नव-नाजी समूहों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है।
सांसदों ने यह भी आरोप लगाया कि आईसीई ने भर्ती के नियमों में ढील दी है, जैसे उम्र सीमा हटाना, 50,000 डॉलर तक का साइनिंग बोनस देना और नए भर्ती अधिकारियों को बिना पर्याप्त प्रशिक्षण के मैदान में उतारना शामिल हैं।
सांसदों ने मेटा और गूगल से यह भी पूछा कि उनके प्लेटफॉर्म पर ऐसे विज्ञापन कैसे चलने दिए गए, जबकि दोनों कंपनियों की नीतियां नफरत और भेदभावपूर्ण सामग्री के खिलाफ हैं। सांसदों ने मांग की कि कंपनियां यह स्पष्ट करें कि क्या इन विज्ञापनों का कंटेंट उनके आंतरिक मानकों के अनुरूप है और क्या उन्होंने डीएचएस से इस पर कोई बातचीत की थी।
--आईएएनएस
वीकेयू/एएस
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