हेडलाइंस हमें हमेशा देखने को मिलती है जहां लिखा होता है कि रुपए की कीमत बढ़ी या घटी है। लेकिन इसका मतलब क्या हुआ जब कोई यह कहता है कि आज रुपए की कीमत गिर गई है या बढ़ गई है। यह घटना और बढ़ना कौन और कैसे डिसाइड किया जाता है और डॉलर की ही तुलना इंडियन करेंसी से क्यों की जाती है और इससे हम आम जनता के पॉकेट पर क्या असर पड़ता है। 1947 में जब भारत आजाद हुआ तो एक डॉलर 3.3 रूपये का था। आज वही डॉलर 90 रूपये का हो गया है। हो सकता है भविष्य में एक डॉलर की वैल्यू 100 रूपये हो जाए।
जब करेंसी नहीं थी तब क्या होता था
आज से हजारों साल पहले करेंसी नहीं होती थी। उस टाइम पर लोग बाटर सिस्टम करते थे। मतलब किसी के पास अगर टमाटर है और उसे चावल की जरूरत है तो जिसके पास चावल हैं। उसको टमाटर देकर चावल ले लिया। इसी तरह अपनी जरूरत के हिसाब से लोग गुड्स एंड सर्विसेज को एक्सचेंज करते थे। लेकिन इस बाटर सिस्टम में छोटे मोटे लेन देन तो ठीक थे। लेकिन जब व्यापक स्तर पर लेन देन करना होता था तो दिक्कत आती थी। टमाटर, चावल जैसी चीजें कुछ वक्त बाद खराब हो जाती थी। ऐसे में बड़े ट्रेड करने में लोगों को दिक्कत आती थी। लेकिन कुछ टाइम बाद लोगों ने इसका भी तोड़ निकाला और ऐसी चीज में डील करना चालू किया जो खराब न हो। इसके बाद से ही सोना, चांदी, तांबा में व्यापार शुरू हुआ। लीडिया ने सोना, चांदी, तांबा सभी के सिक्के बना दिए ताकी आसानी से ट्रेड किया जा सके। लेकिन इसमें भी धीरे धीरे समस्या आने लगी। जैसे अगर लोग व्यापार करने के लिए निकलते थे और ज्यादा माल लेना होता था तो बदले में देने के लिए सिक्के ज्यादा मात्रा में ले जाना होता था और ये काफी भारी हो जाते थे। इन्हें चोरी से बचाकर रखना और ट्रांसपोर्ट करने में दिक्कत आती थी। इसका ये तरीका निकाला गया कि मान लीजिए अगर दिल्ली से मुंबई किसी को व्यापार करने जाना होता था। तो वो दिल्ली के किसी व्यापारी को ढूंढ़ लेते थे और कहते थे कि हमें इतना सारा सोना लेकर नहीं जाना है। आप अपने पास ये सोना रख लो। जब हम मुंबई पहुंच जाएंगे तो आप मुंबई में आपके जानने वाले व्यापारी हैं उन्हें वहां पर बोल देना कि हमें वहां पहुंचने पर इतने की मात्रा में सोना दे देगा। आपका जो इसमें बनेगा वो ले लेना। ऐसे में व्यापारी दिल्ली में सोना रखकर एक पेपर पर मुहर और साइन करके दे देता था। फिर पेपर लेकर मुंबई पहुंचने पर पेपर दिखाकर वहां के व्यापारी से सोना-चांदी जो भी है ले लो। रास्ते की धातु के सिक्के ले जाने की दिक्कत इससे खत्म हो गई। आज कल का आपने हवाला का काम सुना है वो भी इसी सिस्टम पर बेस्ड है। ये जो पेपर पर साइन औऱ स्टैंप लगकर मिलता है, इसी से करेंसी का मार्ग प्रशस्त होता है। आज भी आप 500 के नोट पर देखते हो मैं धारक को पांच सौ रुपए अदा करने का वचन देता हूं। ये वही तो है। लेकिन ये पूरी चीज अन आर्गनाइज्ड था और भरोसे पर ही चलता था। आगे चलकर इसे सिस्टम में डालने की दिशा में कदम बढ़ाए गए। साल 1154 में चीन में वेनयान लियांग ने चीन की अथॉरिटी के साथ मिलकर पूरे सिस्टम को आर्गनाइज किया। इसने इसी काम के लिए चीन के अंदर बैंक बना दिए। चीन के लोग बैंक के अंदर जाते थे और अपना सोना जमा करते थे, उसके बदले बैंक नोट ले आते थे।
रुपया vs डॉलर
रुपए की वैल्यू डॉलर के अगेंस्ट में फिक्स्ड कौन करता है इंडियन गवर्नमेंट तो इसका जवाब है नहीं। अब आप सोच रहे होंगे कि आरबीआई द्वारा किया जाता होगा तो इसका जवाब भी है नहीं हालांकि रुपए की वैल्यू को स्टेबल रखने में आरबीआई का बहुत ही इंपॉर्टेंट रोल होता है। लेकिन आरबीआई भी यह तय नहीं करता है। तो सवाल यहां ये आता है कि फिर कौन करता है। इसका जवाब है करेंसी मार्केट। करेंसी मार्केट में जिस करेंसी की डिमांड ज्यादा होती है उसकी वैल्यू बढ़ती है जिसका डिमांड कम होता है। उसकी वैल्यू गिर जाती है और इस पूरे सिस्टम को फ्लोटिंग एक्सचेंज रेट सिस्टम कहते हैं। इसको थोड़ा डिटेल में समझते हैं। मान लीजिए कि अगर गवर्नमेंट ऑफ इंडिया और आरबीआई ने मिलकर $ 440 के बराबर फिक्स्ड कर दिया है मतलब अगर कोई भी प्रोडक्ट खरीदना है इंटरनेशनल मार्केट में पैसे लगाने हैं तो यह करेंसी अगर फिक्स्ड रहती है तो इसे फिक्स्ड एक्सचेंज रेट सिस्टम कहते हैं। लेकिन अगर यही रुपए की वैल्यू जो है वो डॉलर की तुलना में अगर मार्केट से डिसाइड किया जाए कि किस करेंसी की कितनी डिमांड और सप्लाई है तो उसे फ्लोटिंग एक्सचेंज रेट सिस्टम कहते हैं। 1993 के बाद इंडिया ने फ्लोटिंग एक्सचेंज सिस्टम को ही अपनाया है। मान लीजिए कि अगर रुपए की डिमांड बढ़ जाती है तो आज अगर $ की वैल्यू ९० है तो वो कम होकर ₹10 हो जाएगी । हम सब जानते हैं कि हर देश की अपनी एक अलग करेंसी होती है जैसे कि भारत में रुपैया अमेरिका में डॉलर यूरोप में यूरो और जापान में यन यह करेंसी की वैल्यू है। इसी वजह से एक दूसरे के मुकाबले में बदलती रहती है इस मूल्य को ही मुद्रा दर यानी कि एक्सचेंज रेट कहते हैं। एक्सचेंज रेट यह तय करती है कि एक देश की मुद्रा को दूसरे देश की मुद्रा से कितने बदले में लिया जा सकता है। जैसे कि स्टॉक को खरीदने और बेचने के लिए स्टॉक मार्केट होता है। वैसे ही करेंसी एक्सचेंज करने के लिए भी फॉरन एक्सचेंज मार्केट होता है। जैसे मान लीजिए कि अगर भारत को अमेरिका से कुछ प्रोडक्ट्स लेने हैं तो भारत को वो खरीदने के लिए डॉलर्स की जरूरत पड़ेगी। अगर भारत को आज के दिन में $ लर में कोई सामान खरीदना होगा तो उसके लिए भारत को ९० से ज्यादा खर्च करने पड़ेंगे।
डिमांड एंड सप्लाई
पूरी अर्थव्यवस्था ही डिमांड और सप्लाई चेन पर बेस्ड है जैसे किसी चीज की मांग बढ़े तो उसकी कीमत बढ़ जाती है । ठीक उसी तरह से करेंसी के मामले में भी यही होता है। अगर डॉलर की मांग बढ़ जाती है तो डॉलर की कीमत भी ऑटोमेटिक बढ़ ही जाती है। इसको भी उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए कि भारत के व्यापारियों को अमेरिका से बड़ी मात्रा में सामान खरीदने की जरूरत है। इसके लिए उन्हें डॉलर की आवश्यकता होगी। अगर डॉलर की सप्लाई लिमिटेड हो और भारत को डॉलर की ज्यादा जरूरत हो, डॉलर की जो कीमत है वह अपने आप ही बढ़ जाएगी। इससे डॉलर का मूल्य रुपए के मुकाबले भी बढ़ेगा और रुपया कमजोर हो जाएगा।
रुपये में गिरावट के पीछे आर्थिक कारण
अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये (INR) का कमजोर होना अर्थशास्त्रियों, कारोबारियों और नीति-निर्माताओं के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। रुपये में यह गिरावट कई आर्थिक कारणों से जुड़ी है, जो भारत की वित्तीय स्थिति और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को सीधे प्रभावित करती है। आइए, उन प्रमुख कारकों पर नजर डालते हैं जो इस रुझान को आगे बढ़ा रहे हैं और भारतीय अर्थव्यवस्था पर उनके क्या प्रभाव पड़ सकते हैं।
भारत–अमेरिका व्यापार समझौता
भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा है कि डॉलर की बढ़ती मांग के कारण रुपया कमजोर होकर लगभग ₹90.17 प्रति डॉलर के स्तर तक दबाव में आया है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत के मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 696.61 अरब डॉलर के स्तर पर हैं—रुपये को अहम सहारा प्रदान कर रहे हैं। गवर्नर मल्होत्रा के अनुसार, यदि भारत और अमेरिका के बीच संभावित व्यापार समझौता तय होता है, तो इससे रुपये पर बना दबाव कम हो सकता है और बाजारों में स्थिरता लौट सकती है।
निवेशकों की सतर्कता बरकरार
मार्केट एक्सपर्ट कुणाल सोधानी का आकलन भी इसी दिशा में संकेत करता है। उनका कहना है कि भारत–अमेरिका व्यापार समझौते में हो रही देरी के कारण निवेशकों की धारणा अभी सतर्क बनी हुई है। जबकि भारतीय अधिकारियों को उम्मीद थी कि यह समझौता 2025 के अंत या 2026 की शुरुआत तक पूरा हो जाएगा, लेकिन अनिश्चितता के चलते विदेशी निवेश प्रवाह और मुद्रा बाजार पर असर पड़ रहा है।
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दुनिया में इन दिनों हथियारों वाले युद्ध से इतर अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा टैरिफ वॉर छेड़ा गया है। दुनियाभर के देशों को अपने टैरिफ वॉर का डर दिखा डील साइन करवाते ट्रंप ने माई फ्रेंड मोदी कह कह कर भी भारत के साथ वही हथकंडा अपनाया। दुनिया में एक वॉर चल रही है जिसमें ना तो हथियार इस्तेमाल हो रहे हैं और ना ही बड़ी-बड़ी मशीनें। लेकिन इसके बावजूद लाखों लोगों की जिंदगी दांव पर है। जिस तरह से ट्रंप कदम उठा रहे हैं भारत और अमेरिका के बीच 87 अरब डॉलर का निर्यात व्यापार दांव पर है। जहां अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। यह टैरिफ उन कई प्रमुख उद्योगों की कंपटीशन को चुनौती देता है जो पहले से ही वैश्विक मंदी का सामना कर रहे हैं। ट्रंप ने इस टैरिफ को ग्लोबल सप्लाई चेन में अमेरिका की ताकत के रूप में पेश किया।
सरल भाषा में टैरिफ का पूरा गणित समझें
आज की कहानी की शुरुआत दो रियासतों लखनऊ और भोपाल से करते हैं। दोनों रियासतें फोन बनाती थीं। फिर दोनों रियासतें एक दूसरे के क्षेत्र में अपने फोन को बेचती भी हैं। अब अचानक एक दिन भोपाल के पास एक ऐसी टेक्नोलॉजी आ जाती है जिससे वो बहुत कम कीमत पर फोन बना सकते हैं। अब दोनों रियासतें सेम फोन बना रही हैं। लेकिन भोपाल का फोन सस्ता है। मान लीजिए भोपाल अपना फोन ₹100 में बेचता है और लखनऊ अपना फोन ₹200 में बेचता है। अब आप सोचिए कि आप किस रियासत का फोन खरीदेंगे? जाहिर तौर पर आप भोपाल का फोन खरीदेंगे क्योंकि भोपाल का फोन सस्ता है। चाहे आप भोपाल में रहते हो या आप लखनऊ में रहते हो। है तो आप इंसान ही और सभी इंसान बचत करना चाहते हैं। ऐसे में लखनऊ को नुकसान होने लगता है क्योंकि उसके महंगे फोन को अब कोई नहीं खरीद रहा। अब आप सोचिए कि अगर आप लखनऊ के राजा होते तो आप क्या करते? लखनऊ के राजा भी इसी बात से परेशान थे। तभी उन्हें एक आईडिया आता है। उन्होंने सोचा कि भोपाल का फोन हमारी रियासत में ₹100 में बिकता है। तो क्यों ना हम उस पर ₹100 का एक्स्ट्रा टैक्स लगा दें। अब जब भोपाल के फोन पर ₹100 का एक्स्ट्रा टैक्स जुड़ जाएगा तो उसकी कीमत भी ₹200 हो जाएगी। फिर दोनों रियासतों के फोन बराबर कीमत पर बिकने लगेंगे और लखनऊ के फोन को भी लोग खरीदना शुरू कर देंगे। इस तरह लखनऊ का नुकसान भी नहीं होगा। तो इस कहानी में राजा ने जो एक्स्ट्रा शुल्क लगाया था उसे अर्थशास्त्र की भाषा में टेरिफ कहा जाता है। टेरिफ अलग-अलग कारणों से लगाया जाता है। जैसे लोकल इंडस्ट्रीज को बचाने के लिए, सरकार की कमाई को बढ़ाने के लिए, सरकार के नुकसान को कम करने के लिए, नौकरियों को बढ़ाने के लिए या फिर इसको एक पॉलिटिकल टूल की तरह भी कई बार इस्तेमाल किया जाता है।
ट्रेड वॉर क्या होता है
ट्रेड वॉर एक ऐसी सिचुएशन है जहां दो देश एक दूसरे को नुकसान पहुंचाने के लिए व्यापार का यानी कि ट्रेड का इस्तेमाल करते हैं। ट्रेड वॉर को आप एक रस्सी की गेम की तरह भी इमेजिन कर सकते हैं। जहां पर दो देश एक दूसरे को हराने के लिए या एक दूसरे को नुकसान पहुंचाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगाते हैं।
फायदा हमेशा ताकतवर का ही रहता
सबसे पहले इस बात को समझ लें जिसे शायद डोनाल्ड ट्रंप भूल गए हैं कि अमेरिका की ही पहल थी कि दुनियाभर के देशों को अपने हितों की हिफाजत करने की छूट मिली। कोई भी देश किसी भी देश के साथ व्यापार कर सकता था। जहां से सस्ता मिले वहां से खरीदों ऐसे बाजार खुला हुआ था। फ्री मार्केट का कंसेप्ट कहा गया और पिछले सात दशकों में अमेरिका इसका झंडाबदार रहा है। लेकिन ट्रंप अचानक इसे पलटना चाहते हैं। पहली सदी से ही दुनिया के अलग अलग हिस्सों के बीच व्यापार शुरू हो चुका था। सिल्क रूट के जरिए चीन का रेशन रोम पहुंचने लगा था। लेकिन इसमें एक समस्या ये थी कि व्यापार तभी फलता फूलता जब कोई ताकत उसकी हिफाजत करती। मंगोल, इस्लामिक सौदागरों से लेकर औपनिवेशिक काल तक चला। रास्ते बदले, सामान भी बदले लेकिन फायदा हमेशा ताककवर का ही रहता था। वही तय करता था कि कौन किससे व्यापार करेगा। किस कीमत पर करेगा। ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति के बाद 20वीं सदी में युद्ध छिड़ा और फिर अमेरिका में एक बिल पास हुआ। जिससे अमेरिका ने ट्रेड पर भारी टैक्स लगाए। फिर जो हुआ उसे हम द ग्रेट डिप्रेशन के नाम से जानते हैं।
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