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Social Media पर रुके बाल यौन शोषण सामग्री, Supreme Court ने POCSO नियमों पर मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र सरकार द्वारा ऑनलाइन बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार सामग्री (CSEAM) के प्रसार को रोकने के निर्देशों को लागू करने के उपायों पर अपना जवाब दाखिल न कर पाने पर चिंता जताई और सरकार को ऐसा करने का एक आखिरी मौका दिया। जस्टिस जेबी पारदीवाला और के विनोद चंद्रन की बेंच ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) और कानून और न्याय मंत्रालय को निर्देश दिया कि वे आखिरी मौके के तौर पर अपनी-अपनी रिपोर्ट दाखिल करें। कोर्ट ने मंत्रालयों से कहा कि वे सुप्रीम कोर्ट के सितंबर 2024 के फैसले को लागू करने और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर CSEAM के प्रसार को रोकने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी देते हुए रिपोर्ट दाखिल करें। सुप्रीम कोर्ट 'जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन अलायंस' (JRCA) की उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था जिसमें सोशल मीडिया इंटरमीडियरीज़ (मध्यस्थों) को CSEAM (बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट) की जानकारी कानून लागू करने वाली एजेंसियों को देने के निर्देशों को सख्ती से लागू करने की मांग की गई थी। बेंच ने गौर किया कि 14 अगस्त के निर्देश के बावजूद, मंत्रालयों ने अपना जवाब दाखिल नहीं किया था। 

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा, दुर्भाग्य से आज तक ऐसा कोई जवाब या रिपोर्ट रिकॉर्ड पर नहीं आई है। हमारे सामने का मामला बेहद गंभीर है। हम दोनों मंत्रालयों को वह जवाब/रिपोर्ट दाखिल करने का एक आखिरी मौका देते हैं।" शीर्ष अदालत ने केंद्र को निर्देश दिया कि वह सितंबर 2024 के फैसले को लागू करने के लिए उठाए गए कदमों के बारे में जानकारी दे। उस फैसले में कहा गया था कि सोशल मीडिया इंटरमीडियरीज़ के लिए ज़रूरी है कि वे CSEAM से जुड़े अपराधों की रिपोर्ट 'बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण (POCSO) अधिनियम' और उसके तहत बने नियमों में बताई गई एजेंसियों को दें। बेंच ने ऐसे कंटेंट का पता लगाने और उसकी रिपोर्ट करने में इंटरमीडियरीज़ की तरफ से होने वाली चूक को रोकने के लिए प्रस्तावित सुरक्षा उपायों की जानकारी भी मांगी। केंद्र की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने बेंच को बताया कि सरकार इस मामले को गंभीरता से ले रही।

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इस मामले की अगली सुनवाई 15 अक्टूबर को होगी। यह अर्ज़ी एक BBC रिपोर्ट के बाद दायर की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि Instagram ने CSEAM को बढ़ावा देने वाले पेड विज्ञापन दिखाए थे। इसके बाद JRCA ने ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म द्वारा कानूनी दायित्वों और सुप्रीम कोर्ट के पहले के निर्देशों का पालन करने पर सवाल उठाए। इसमें कहा गया है कि मौजूदा अर्ज़ी का मुद्दा किसी खास मध्यस्थ (intermediary) के कामकाज तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत में काम करने वाले सभी मध्यस्थों और ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर लागू होने वाले कानूनी दायित्वों के एक समान पालन से जुड़ा है। इसमें आगे कहा गया है, डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी सामग्री (CSEAM) का प्रसार, प्रकाशन, प्रचार या उससे कमाई करना एक लगातार जारी रहने वाला अपराध है। यह पीड़ित बच्चों की गरिमा, निजता और शारीरिक अखंडता का उल्लंघन है और POCSO एक्ट, 2012 के मूल उद्देश्य को ही विफल करता है।

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Indira Gandhi का उदाहरण देकर Rahul Gandhi ने पूछा, BJP और Modi-Shah सत्ता विरोधी लहर से कैसे बचते हैं?

गुरुवार को चुनाव आयोग से जुड़े विवाद पर बोलते हुए विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने बीजेपी पर निशाना साधा। उन्होंने सवाल किया कि पार्टी बार-बार उस 'एंटी-इनकंबेंसी' (सत्ता-विरोधी लहर) फैक्टर से क्यों बचती दिखती है, जो दूसरे राजनीतिक मुकाबलों में देखने को मिलता है। बीजेपी के चुनावी रिकॉर्ड पर बात करते हुए गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि आम तौर पर सत्ता-विरोधी लहर (एंटी-इंकम्बेंसी) का असर राजनीतिक पार्टियों पर दिखता है, लेकिन मोदी, शाह और बीजेपी पर ऐसा होता नहीं लगता।

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राहुल ने कहा कि मैं हाल ही में चर्चा में रही कुछ बातों पर अपनी राय रखना चाहता हूँ... मैं एक राजनीतिक परिवार से आता हूँ और मैंने 50 से ज़्यादा साल ऐसे ही परिवार में बिताए हैं... भारत में 'एंटी-इनकंबेंसी' (सत्ता-विरोधी लहर) नाम की एक बुनियादी ताकत होती है, जो बहुत तेज़ी से किसी भी सरकार का विरोध करने लगती है। यह किसी को नहीं छोड़ती। इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश युद्ध जीता था, वे अपनी लोकप्रियता के शिखर पर थीं, और फिर अचानक, एक-दो साल के भीतर ही, ज़बरदस्त सत्ता-विरोधी लहर और भारी दबाव का सामना करना पड़ा। यही बात एक के बाद एक कई नेताओं के साथ होती है। यह कांग्रेस नेताओं के साथ होता है, क्षेत्रीय पार्टियों के साथ होता है, लेकिन न जाने क्यों, यह कभी भी नरेंद्र मोदी, शाह या बीजेपी के साथ नहीं होता।

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राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि वोट चोरी के बाद कानून चोरी और उससे संस्थाओं की चोरी होती है; आज वोट चला गया है, तो कानून बनाने वाली व्यवस्था भी चली गई है। 'वोट चोरी' करके जीतने वाले सांसदों का बनाया कोई भी कानून गैर-कानूनी है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग इस वोट का संस्थागत संरक्षक है। वोट की रक्षा करना उनकी ज़िम्मेदारी है। और फिर सब कुछ वहीं से शुरू होता है। अगर वोट ही खत्म हो जाए, तो संविधान काम नहीं करता, कानून गैर-कानूनी हो जाते हैं और संस्थाओं का कोई मतलब नहीं रह जाता। यही वो लोग हैं जिन्होंने ऐसा किया है।

राहुल ने साफ तौर पर कहा कि मैं हवा-हवाई बातें नहीं कर रहा हूँ। मैंने इसे सबूत के साथ दिखाया है। मैं आपको बता दूँ कि इस बात को 100 प्रतिशत पक्का करने के लिए पहले से ही काफी जानकारी मौजूद है - 99 प्रतिशत नहीं, बल्कि 100 प्रतिशत पक्का - कि भारतीय चुनाव, लोकसभा चुनाव, 2024 के चुनाव और विधानसभा चुनाव, सभी को खारिज किया जा रहा है। कांग्रेस द्वारा महाराष्ट्र, हरियाणा में 'वोट चोरी' का मुद्दा उठाना शुरू करने के बाद दो ईसी ने सीईसी ज्ञानेश कुमार का विरोध करना शुरू कर दिया।

कांग्रेस नेता ने कहा कि हरियाणा में 50 सालों से कभी एक पार्टी की सरकार बनती है तो कभी दूसरी की। अचानक एंटी-इनकंबेंसी (मौजूदा सरकार के खिलाफ़ नाराजगी) गायब हो जाती है। महाराष्ट्र में भी ऐसा ही होता है; अचानक यह गायब हो जाती है। उत्तर प्रदेश में भी यही हाल है। कभी समाजवादी पार्टी, तो कभी BSP; और एंटी-इनकंबेंसी गायब हो जाती है। मध्य प्रदेश में भी ऐसा ही होता है। गुजरात में भी। यह हमारे लिए एक बुनियादी सवाल रहा है। हम किसी व्यक्ति की लोकप्रियता और सरकार के कामकाज को तो समझ सकते हैं, लेकिन यह नहीं समझ पाते कि एंटी-इनकंबेंसी कैसे गायब हो जाती है। सद्दाम हुसैन के इराक में एंटी-इनकंबेंसी नहीं होती। उत्तर कोरिया में भी नहीं होती। दुनिया में ऐसी कोई डेमोक्रेसी नहीं है जहाँ एंटी-इनकंबेंसी न हो... वोट से ही, जिसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है, हमारे संविधान को ताकत मिलती है। संविधान से हमारे कानून बनते हैं, और कानूनों से हमारी संस्थाएँ बनती हैं। यह एक चेन है... अगर वोट ही खत्म हो गया, तो हमारा संविधान भी खत्म हो गया... अगर संविधान खत्म हो गया, तो हमारे कानून गैर-कानूनी हो जाते हैं। अगर कानून गैर-कानूनी हैं, तो हमारी संस्थाओं का कोई मतलब नहीं रह जाता। यहाँ मुख्य सवाल यह है कि यह सिर्फ़ वोट पर हमला नहीं है; यह हर भारतीय नागरिक की सोच, बुनियादी ढांचे और अभिव्यक्ति पर हमला है। हम बार-बार यही कह रहे हैं कि वोट को लेकर कोई समस्या है।
 

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  Sports

Women’s UPL 2026: देहरादून वॉरियर्स बनी उत्तराखंड प्रीमियर लीग की चैंपियन, फाइनल में मसूरी क्वींस को दी मात

Women's UPL 2026: विमेंस उत्तराखंड प्रीमियर लीग 2026 का फाइनल मैच देहरादून वॉरियर्स और मसूरी क्वींस की टीमें के बीच खेला गया. इस मैच में देहरादून वॉरियर्स ने 15 रनों से बाजी मारी. Fri, 25 Sep 2026 00:03:09 +0530

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