केदारनाथ-बद्रीनाथ में अभी तक नहीं जमी बर्फ:NASA की सैटेलाइट तस्वीरों में पहाड़ सूखे-काले; तुंगनाथ में 1985 के बाद पहली बार बर्फ गायब
उत्तराखंड में इस बार सर्दियों के पीक सीजन में भी हिमालय के कई इलाकों में सामान्य के मुकाबले बहुत कम हिमपात रिकॉर्ड हुआ है। NASA FIRMS प्लेटफॉर्म से ली गई सैटेलाइट तस्वीरें इसकी गवाही दे रही हैं, जिसमें केदारनाथ और बद्रीनाथ जैसे प्रमुख धार्मिक धामों के आसपास के पहाड़ सूखे और काले नजर आ रहे हैं। आमतौर पर दिसंबर-जनवरी के महीनों में ये इलाके पूरी तरह बर्फ से ढके रहते थे, लेकिन इस बार स्थिति अलग है। केदारनाथ में साल की शुरुआत में बर्फबारी जरूर हुई, लेकिन वह जम नहीं पाई, जबकि बद्रीनाथ में तो अभी तक स्नोफॉल हुआ ही नहीं। हिमालयी चोटियों पर बर्फ की इस कमी को मौसम विशेषज्ञ अब ग्लोबल वार्मिंग और बदलते मौसम पैटर्न से जोड़कर देख रहे हैं। कम हिमपात का असर पर्यटन के साथ-साथ कृषि, बागवानी, जल स्रोत और पारिस्थितिक संतुलन पर भी पड़ रहा है। पहले सैटेलाइट से ली गई 2 तस्वीरें देखिए.... 1. बद्रीनाथ 2. केदारनाथ NASA FIRMS क्या है, जहां से सैटेलाइट तस्वीरें ली गईं फायर इन्फॉर्मेशन फॉर रिसोर्स मैनेजमेंट सिस्टम (FIRMS) नासा की एक फ्री ऑनलाइन मैप सर्विस है। इसे नासा अपने अर्थ साइंस डेटा सिस्टम्स प्रोग्राम के तहत चलाता है। इस प्लेटफॉर्म पर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में आग लगने की ताजा स्थिति को नक्शे पर दिखाया जाता है। यह सिस्टम पहले मुख्य रूप से जंगलों में लगने वाली आग पर नजर रखने के लिए बनाया गया था, लेकिन इसकी सैटेलाइट तस्वीरों से कई जगहों पर पहाड़ों और जमीन पर हो रहे बदलाव भी देखे जाते हैं। FIRMS का डेटा ऐसे सैटेलाइट से आता है, जो रोज लगभग एक ही समय पर किसी इलाके के ऊपर से गुजरते हैं, इसलिए इसमें बार-बार अपडेट मिलता रहता है। हालांकि, FIRMS का उपयोग बर्फ नापने के लिए नहीं बनाया गया है। इसलिए इससे यह तो साफ दिख जाता है कि किसी इलाके में बर्फ की परत नजर आ रही है या नहीं, लेकिन कितने फीट बर्फ जमी है या बर्फ की सही मात्रा कितनी है, यह FIRMS से पूरी तरह तय नहीं की जा सकती। तुंगनाथ में जनवरी में बर्फ नहीं जमी: 1985 के बाद ऐसा पहली बार तुंगनाथ के ऊंचे क्षेत्रों में भी आधा जनवरी बीत जाने के बावजूद बर्फ नहीं जमी, ऐसा 1985 के बाद हुआ है। पर्यावरण विश्लेषकों का कहना है कि इस सर्दी में पश्चिमी विक्षोभ कमजोर रहे, जिससे पर्याप्त बर्फबारी नहीं हो पाई। इसे स्नो ड्राउट जैसे पैटर्न से भी जोड़कर देखा जा रहा है, जो हिमालयी क्षेत्र के लिए असामान्य लेकिन बढ़ता हुआ ट्रेंड माना जा रहा है। मसूरी-नैनीताल में भी बर्फ न के बराबर: टूरिज्म और कमाई पर असर इस बार मसूरी, नैनीताल और मुक्तेश्वर जैसे प्रसिद्ध हिल स्टेशनों में भी बर्फ का दृश्य न के बराबर रहा। आमतौर पर सैलानी सर्दियों में बर्फ देखने के लिए बड़ी संख्या में यहां पहुंचते हैं, लेकिन बर्फ नहीं होने से टूरिस्ट व्यवसाय और राजस्व पर असर पड़ा है। यह असर सिर्फ पर्यटन तक सीमित नहीं है। हिमपात की कमी से कृषि, बागवानी, जल स्रोत और पूरे क्षेत्र के पारिस्थितिक संतुलन पर भी असर पड़ रहा है। बादल फटने के बाद अब सूखा: जंगलों में आग की घटनाएं भी बढ़ीं 2025 में बरसात के मौसम में हुई घटनाओं को देखें तो बीते साल बारिश के मौसम में बादल फटने की दर्जनों घटनाएं हुई थीं, जिसमें भारी जानमाल का नुकसान हुआ था। लगातार क्लाउड बर्स्ट की घटनाओं के पीछे भी मौसम के असंतुलन को कारण माना गया था। अब स्थिति उलटी है- बीते तीन महीनों में पूरे उत्तराखंड में नाम मात्र की बर्फबारी हुई है। सूखे के कारण पहाड़ों के नंदा देवी संरक्षित वनों में भी आग लगने की घटनाएं हो रही हैं। राज्य सरकार ने आपदाओं में 15 हजार करोड़ से अधिक की क्षति का अनुमान लगाया है। नवंबर-दिसंबर लगभग शून्य, जनवरी में भी बारिश नहीं मौसम विभाग बर्फबारी को भी बारिश के रूप में आंकड़ों में दर्ज करता है। विभाग के मुताबिक उत्तराखंड में नवंबर में सामान्य बारिश-बर्फबारी 6.5 एमएम, दिसंबर में 17.5 एमएम, और जनवरी में 42 एमएम दर्ज की जाती है। हालांकि इस बार नवंबर 2025 में 0.1 एमएम, दिसंबर में 00.00, और जनवरी 2026 में भी अब तक बारिश नहीं हुई। मौसम विभाग के अनुसार अत्यधिक ऊंचे इलाकों में जहां मौसम केंद्र नहीं है, वहां बेहद मामूली बर्फबारी हुई है। 16 से 21 जनवरी के बीच हल्की बारिश-बर्फबारी की संभावना मौसम विभाग ने 21 जनवरी तक हल्की बारिश और बर्फबारी की संभावना जताई है। इससे कुछ राहत मिलने की उम्मीद है, लेकिन अभी तक की स्थिति में बर्फ का अभाव लगातार साफ दिखाई दे रहा है। जनवरी में भी जो थोड़ी-बहुत बर्फ गिर रही है, वह धूप से पिघल रही है।
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