साइबेरियन पक्षियों के लिए घर को बनाया टूरिस्ट स्पॉट:3 हजार को बचाया, पेशे से मजदूर सेवाराम की पक्षी सेवा के किस्से अमेरिका तक पहुंचे
खीचन (फलाेदी) के 43 साल के सेवाराम। जैसा नाम, वैसा काम। पेशे से मजदूर सेवाराम 27 साल से पक्षियों की सेवा में जुटे हैं। इस दौरान 3 हजार कुरजा का रेस्क्यू किया। इनके प्रयासों से पक्षियों की राह में आने वाले बिजली के तार भी अंडरग्राउंड हो गए। सेवाराम ने अपना घर भी हर साल साइबेरिया से आने वाली 'डेमोइसेल क्रेन' (कुरजां भी कहते हैं) के लिए समर्पित कर दिया है। उनका यह घर टूरिस्ट स्पॉट बन गया है। सेवाराम की सेवा के किस्से रूस, मंगोलिया, ब्रिटेन, अमेरिका तक पहुंच चुके हैं। इन देशों में उन पर कई आर्टिकल छप चुके हैं। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… साइबेरिया में सर्दियों में पारा माइनस 50 से 60 डिग्री तक गिर जाता है। ऐसे में वहां से पक्षी डेमोइसेल क्रेन साइबेरिया के टाइवा क्षेत्र से उड़ कर 3676 किलोमीटर की दूरी तय कर फलोदी जिले के खीचन में आ जाती हैं। ये क्रेन अगस्त–सितम्बर से लेकर मार्च तक यहीं रहती हैं। फिर मार्च में क्रेन फिर से साइबेरिया पहुंच जाती हैं। हजारों की संख्या में क्रेन 1970 से यहां आ रही हैं। यहां दाना चुगती हैं। तालाब के किनारे पानी पीकर धूप सेंकती हैं। करीब 6 महीने खीचन इनका निवास स्थान बन जाता है। 27 साल से कर रहे हैं रेस्क्यू सेवाराम माली ने बताया- स्कूल के दिनों की बात है। उन्होंने देखा कि एक कुरजां (डेमोइसेल क्रेन) बिजली के तार से करंट की चपेट में आकर घायल हो गई। वे उसे पांच किलोमीटर दूर रेस्क्यू सेंटर ले गए। तभी से उनका इन कुरजां से रिश्ता बन गया। 27 साल में सेवाराम माली ने 3 हजार कुरजां को रेस्क्यू किया। सभी रेस्क्यू पक्षियों का रिकॉर्ड भी रजिस्टर में मेंटेन किया है। सेवाराम माली का कहना है कि बिजली के तार से कुरजां के टकराकर घायल होने व जान गंवाने के मामले को उन्होंने उठाया। समाचार पत्रों में प्रकाशित करवाया। इसके बाद कोर्ट ने संज्ञान लेकर क्षेत्र में बिजली के तारों को भूमिगत (अंडरग्राउंड) करने का आदेश दिया। घर को बनाया टूरिस्ट पॉइंट सेवाराम का घर अब टूरिस्ट पॉइंट का रूप ले चुका है। सेवाराम के घर के पास का क्षेत्र कुरजां का चुग्गा घर है। सुबह 20 से 25 हजार कुरजां यहां आकर दाना चुगती हैं और एक साथ उड़ान भरती हैं। सुबह-सुबह का यह नजारा देखने देसी–विदेशी टूरिस्ट सेवाराम के घर पहुंचते हैं। छत से डेमोइसेल क्रेन की अठखेलियां देखते हैं। कैमरे में कैद करते हैं। सेवाराम हर दिन कुरजां कितने बजे आती हैं? कितने बजे दाना चुगती हैं? कितनी बजे उड़ कर तालाब की तरफ जाती हैं…यह सब डिटेल रजिस्टर में मेंशन करते हैं। यही नहीं कितनी कुरजां आईं, उनकी संख्या भी लिखते हैं। चुग्गा घर में आने वाली कुरजां के पैरों में टैग लगे होते हैं, जिसकी जानकारी भी सेवाराम रखते हैं। यूरेशिया से मिला सम्मान वीई फ्लिंट क्रेन वर्किंग ग्रुप ऑफ यूरेशिया…इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर एसएससी क्रेन स्पेशलिस्ट ग्रुप का एक हिस्सा है। यह संस्था यूरेशियाई क्रेन की आबादी, आवासों के रिसर्च व कंजरर्वेशन पर वर्क करती है। ईयरली न्यूज लेटर भी पब्लिश करती है। इस संस्थान ने सेवाराम माली के डेमोइसेल कंजर्वेशन पर आर्टिकल पब्लिश किया। फलोदी आकर फरवरी 2025 में सेवाराम माली को अवॉर्ड देकर सम्मानित भी किया। इसके साथ ही सेवाराम को लोकल, स्टेट, नेशनल और इंटरनेशनल वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन अवॉर्ड मिले हैं। बर्ड फ्लू में बचाई पक्षियों की जान सेवाराम के बेटे चिराग और पीयूष भी पिता के साथ क्रेन की सेवा में जुट गए हैं। चिराग ने बताया कि बर्ड फ्लू के समय उसने देखा कि कुरजां दाना चुगते समय अचानक नीचे गिर रही थीं। उसके मुंह से झाग निकल रहा था। उसने वहां पहुंच कर कुरजां को उठाया और फलोदी एनिमल हॉस्पिटल ले गया। पहले तो फूड पॉइजन ही बताया जा रहा था, फिर जब बाहर से टीम आई तो पता चला कि बर्ड फ्लू हुआ है। उस समय मुझे भी कई दिनों तक क्वारेंटाइन रखा गया। चिराग ने बताया कि वह अपने पिता के साथ कुरजां कंजर्वेशन में सहयोग करता है। चिराग सातवीं क्लास में पढ़ रहा है। मंगोलिया से बर्ड रिसर्चर कुरजां के पैर पर जो टैग लगाते हैं, उनको पहचान कर टैग की फोटो लेता है। यहां पक्षी विशेषज्ञ उस पर रिसर्च करते हैं। इस कार्य के लिए चिराग व पीयूष को भी कई पर्यावरण संस्थाएं सम्मानित कर चुकी हैं। 1800 बीघा जमीन कुरजा रिजर्व आवारा कुत्तों का शिकार होती कुरजां को बचाने के लिए सेवाराम ने कई प्रयास किए। इस समस्या को सबके सामने लाए। इसके बाद हाईकोर्ट के निर्देश पर देश का पहला कुरजां कंजर्वेशन रिजर्व बनाया गया। वर्तमान में खीचन में 1800 बीघा जमीन कुरजां के लिए रिजर्व है। इसके अलावा चुग्गाघर की 2 बीघा 2 बिस्वा जमीन का पट्टा भी कुरजां पक्षियों के नाम है। 1989 में ग्राम पंचायत खीचन व फलोदी ने निशुल्क यह जमीन कुरजां व कबूतर चुग्गा (दाना) स्थल के रूप में दे दी। यहां लाखों रुपए का चुग्गा (दाना) डाला जाता है, जिसकी व्यवस्था गांव का जैन समाज व ग्रामीण मिलकर करते हैं। बर्ड एंबुलेंस मिली गिफ्ट सेवाराम को 2001 में कॉर्पोरेट सोशल रेस्पोंसबिलिटी फंड से एंबुलेंस गिफ्ट मिली हैं। घायल पक्षियों को सेवाराम इस एंबुलेंस में फलोदी एनिमल हॉस्पिटल ले जाते हैं। सेवाराम इस एंबुलेंस का रखरखाव व डीजल की व्यवस्था अपने स्तर पर करते हैं। खीचन में ही बर्ड रेस्क्यू सेंटर बने, इसकी मांग लंबे समय से हो रही है। सेवाराम ने बताया कि इसके लिए जमीन मिल चुकी है। बजट मिला, लेकिन लैप्स हो गया। तालाब के चारों ओर लगी जाली को हटा कर दीवार बनाने की भी मांग कर रहे हैं, ताकि पक्षियों की जान बच सके। फॉरेस्ट गार्ड गिरधारी लाल माली ने बताया कि जोधपुर रेंज के अधीन यह क्षेत्र आता है। यहां रातड़ी नाड़ी, विजयसागर तालाब सहित 7 स्थानों पर कुरजां सुबह दस बजे से शाम पांच बजे तक रहती हैं। इनकी सुरक्षा के लिए तीन से चार फॉरेस्ट रेंजर तैनात रहते हैं।
सुंदर साध्वी हर्षा बोलीं- धर्म परिवर्तन के ऑफर मिल रहे:साधु-संत मुझसे मिलने से कतराते हैं, इसलिए कहा था- धर्म का प्रचार छोड़ दूंगी
जब से मैंने धर्म का रास्ता छोड़ने की बात कही है, तब से मुझे लगातार धमकियां मिल रही हैं। लोग गालियां दे रहे हैं, गंदे-गंदे कमेंट कर रहे हैं। अलग-अलग धर्मों के लोग मैसेज भेजकर अपने धर्म के बारे में पढ़ने और उसे अपनाने को कह रहे हैं। ये कहना है हर्षा रिछारिया का, जो इस समय सोशल मीडिया पर जारी किए एक वीडियो की वजह से सुर्खियों में है। हर्षा ने वीडियो में भारी मन से यह ऐलान किया कि वह धर्म प्रचार का काम छोड़कर वापस अपने पुराने प्रोफेशन, एंकरिंग, में लौट रही हैं। इस ऐलान के बाद से हर्षा को धमकियां मिल रही हैं और धर्म परिवर्तन का ऑफर दिया जा रहा है। भास्कर से बातचीत में हर्षा ने कहा कि अगर कोई लड़की धर्म के रास्ते पर आगे बढ़ रही है, तो उसे कैसे रोका जाए, कैसे नीचे गिराया जाए, इसी कोशिश में लोग लग जाते हैं। हर्षा ने बातचीत में और क्या कहा? पढ़िए... महाकुंभ में पेशवाई में संतों के साथ नजर आईं हर्षा रिछारिया का नाम देश भर में तब चर्चा का विषय बना, जब 4 जनवरी, 2025 को प्रयागराज महाकुंभ के दौरान वह निरंजनी अखाड़े की भव्य पेशवाई में संतों के साथ एक रथ पर सवार नजर आईं। उनकी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए। लोगों ने उन्हें 'महाकुंभ की सबसे सुंदर साध्वी' कहना शुरू कर दिया और वह रातों-रात इंटरनेट सेंसेशन बन गईं। इस प्रसिद्धि के साथ विवाद भी जुड़ गया। शांभवी पीठाधीश्वर स्वामी आनंद स्वरूप महाराज जैसे कुछ धार्मिक गुरुओं ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा, 'यह उचित नहीं है। इससे समाज में गलत संदेश फैलता है। धर्म को प्रदर्शन का हिस्सा बनाना खतरनाक है।' यहीं से हर्षा के लिए मुश्किलों का दौर शुरू हो गया, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। हर्षा बोली- जब अपने ही करने लगे हमला हर्षा बताती हैं कि प्रसिद्धि मिलने के बाद उन्हें संत समाज में स्वीकृति नहीं मिली। जब भी वह किसी संत से मिलने जातीं, तो उन्हें घंटों इंतजार करवाया जाता। उनके पुराने एंकरिंग प्रोफेशन को गंदी नजर से देखा जाता और उन्हें यह महसूस कराया जाता कि उन्होंने अतीत में कोई बहुत बड़ा पाप किया है। हर्षा कहती हैं, 'मुझे अपने पुराने प्रोफेशन पर गर्व है। उसी ने मुझे पहचान दी। मैंने सब कुछ छोड़कर धर्म का रास्ता चुना, लेकिन यहां मुझे समर्थन के बजाय संदेह मिला। हमारे ही धर्मगुरु हम पर शक करते हैं और हमें सफाई देनी पड़ती है। हमारे धर्म में एकता की कमी है, हर किसी में अहंकार भरा हुआ है। धमकियां मिल रहीं और धर्म परिवर्तन के लिए उकसा रहे धर्म प्रचार छोड़ने के उनके ऐलान के बाद यह उत्पीड़न और भी बढ़ गया हर्षा ने बताया कि उन्हें न केवल दूसरे धर्मों के लोगों से, बल्कि अपने ही धर्म के कुछ ठेकेदारों से भी धमकी भरे संदेश मिल रहे हैं। उन्हें धर्म परिवर्तन करने के लिए उकसाया जा रहा है। इसके अलावा, अश्लील मैसेज और गालियों का एक अंतहीन सिलसिला चल पड़ा है। वह कहती हैं, "लोग कह रहे हैं कि नाम और शोहरत मिल गई, इसलिए अब सब छोड़ रही हूं। जो लोग खुद को बहनों का रक्षक बताते हैं, वही आज मेरे खिलाफ खड़े हैं। वे दूसरे धर्म के लोगों को भी मुझे गाली देने और धमकाने का रास्ता दिखा रहे हैं।" हर्षा ने स्पष्ट किया कि वह सनातनी हैं और हमेशा रहेंगी, लेकिन इस मानसिक पीड़ा को और बर्दाश्त नहीं कर सकतीं। 'माघ मेले में शिविर के लिए जमीन नहीं दी' हर्षा के लिए सबसे बड़ा झटका दिसंबर 2025 में माघ मेले के दौरान लगा। उन्होंने मेले में अपना शिविर लगाने के लिए जमीन आवंटन हेतु आवेदन किया। शुरुआत में संबंधित अधिकारियों ने उन्हें आश्वासन दिया और प्रक्रिया को मंजूरी भी दे दी। लेकिन जैसे ही कुछ प्रभावशाली संतों को इसकी भनक लगी, उन्होंने अधिकारियों पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। हर्षा बताती हैं, 'कुछ संतों ने अधिकारियों को धमकाया कि मुझे जमीन न दी जाए। इसके बाद अधिकारियों ने मेरे फोन उठाने बंद कर दिए और मुझसे मिलना भी छोड़ दिया। मुझे जमीन नहीं मिली। यह घटना उनके लिए आखिरी चोट साबित हुई। वह कहती हैं कि उन्होंने कभी श्रद्धालुओं से एक पैसा नहीं लिया, सारी व्यवस्था अपने खर्च पर करती थीं। 'परिस्थितियां बदलेंगी तो दोबारा इस मार्ग पर लौटूंगी' अपने अनुभव से सीखते हुए हर्षा ने युवाओं और महिलाओं को एक महत्वपूर्ण सलाह दी है। उन्होंने कहा, "अगर आपको धर्म से जुड़ना है, तो अपने परिवार और घर के मंदिर तक ही सीमित रहें। किसी के पीछे अंधे होकर न चलें। आखिर में, हर्षा ने साफ किया कि उन्होंने केवल धर्म का प्रचार छोड़ा है, सनातन धर्म नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि अगर भविष्य में कोई चमत्कार होता है और परिस्थितियां बदलती हैं, तो वह दोबारा इस मार्ग पर लौटने से पीछे नहीं हटेंगी। ये भी पढ़ें... मॉडल हर्षा बोलीं- सनातनी रहूंगी, प्रचार नहीं करूंगी 'सनातन धर्म को कोई तब तक नहीं अपना सकता, जब तक सनातन उस व्यक्ति को न अपनाए। मैंने धर्म नहीं, धर्म ने मुझे अपनाया है। सनातन धर्म का प्रचार जो एक साल से कर रही थी, उसे अब मैं यहीं विराम दे रही हूं।' ये बात महाकुंभ के दौरान वायरल हुईं मॉडल हर्षा रिछारिया ने जबलपुर में कही। पढ़ें पूरी खबर...
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