ईरान में जारी हिंसक प्रदर्शनों के पीछे विदेशी शक्तियों की साजिश है। इसका शक तो खामनेई की एजेंसियों को पहले से ही था। लेकिन अब सबूत साफ मिल चुके हैं। ईरान को बस इसी सबूत की जरूरत थी। यह हथियार ईरानी सुरक्षा एजेंसियों ने कुछ प्रदर्शनकारियों जब्त किए जो साफ बताते हैं कि यह पाकिस्तानी मेड है। ईरानी एजेंसियों का दावा है कि पाकिस्तान ने न सिर्फ हिंसा भड़काने के लिए हथियार भेजे बल्कि इसके लिए ट्रेंड लोगों को भी प्रदर्शनकारियों की भीड़ में भेजा। यह सुनकर आप चौंक रहे होंगे कि आखिर एक मुस्लिम देश के संकट से पाकिस्तान का इस्लामिक कट्टरपंथी जनरल मुनीर खुश क्यों होगा? अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप जिन्हें ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामनेई फूटी आंख नहीं सुहाते। ईरान 22 दिनों से जारी प्रदर्शन के हिंसक दौर से गुजर रहा है। और ऐसे में कुछ सुराग ऐसे मिले हैं जिससे यह पता चलता है कि प्रदर्शनकारियों को पाकिस्तान में ट्रेनिंग और ब्लाइंड सपोर्ट दिया गया। ईरान में हिंसा के पीछे मुनीर का स्लीपर सेल, प्रोटेस्टर्स के पास कहां से आए ग्रेनेड?
ईरानी अधिकारी प्रदर्शन की शुरुआत से ही यह कहते आ रहे हैं कि इसमें बाहरी ताकतों का हाथ है। इसमें अमेरिका और इजराइल की बड़ी भूमिका है। लेकिन अब सामने आ चुका है कि मुनीर की गुप्त सेना का हाथ इसमें है। गिरफ्तार प्रदर्शनकारियों के पास से सैन्य हैंड ग्रेनेड मिले हैं। सुराग नंबर दो, हिंसा का पैटर्न बांग्लादेश की तरह है। ईरानी मीडिया में प्रदर्शनकारियों की ट्रेनिंग पाकिस्तान में होने की बात सामने आई है। ईरान में इंटरनेट बंद है। फिर भी प्रदर्शनकारियों के बीच में मैसेजेस सर्कुलेट हो रहे हैं। अस्पतालों में आग, नर्सेज और डॉक्टर्स पर अटैक, बैंकों पर हमले, हिंसा भड़काने की साजिश है।
इन्हीं सुरागों पर ईरानी एजेंसियां अब कंफर्म है कि मुनीर ने बेहद गुप्त तरीके से पाकिस्तान में ट्रेन कुछ लोगों को ईरान भेजा और आम लोगों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के बीच में घुसकर हिंसा भड़काने की साजिश रची। इसके पीछे पाकिस्तान और अमेरिका का सीधा-सीधा हाथ है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह बताया जा रहा है कि ईरान में संकट बढ़ाने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और आसिम मुनीर के बीच में एक सीक्रेट डील हुई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रंप के आदेश पर मुनीर ने हाफिज सईद के आतंकियों को दो नए टारगेट्स दिए थे। इनमें पहला टारगेट ईरान था। इसके तहत ईरान के सर्वोच्च नेता खामनई की हत्या का प्लान है। उनके लिए अमेरिका ने 12 जनवरी को कराची में अपना जहाज भेजा। इस जहाज में ऑटोमेटिक हथियार भरे थे। 13 जनवरी को मुनीर ने ईरान बॉर्डर पर 3000 सैनिक तैनात किए और फिर 14 जनवरी को ईरान पाकिस्तान बॉर्डर से हथियारबंद संदिग्धों की गिरफ्तारी हुई।
तालिबान के साथ युद्ध में ईरान का अफगानिस्तान के साथ खड़ा होना भी है। आसिम मुनीर अपनी सेना के दम पर ईरान से बदला तो ले नहीं सकता। इसीलिए उसने बदले का दूसरा रास्ता चुना ईरान में हिंसा को बढ़ावा देना। लेकिन इसका अंजाम क्या होगा? ईरान का खलीफा बदला कैसे लेगा? इसका अंदाजा शायद मुनीर को अब तक नहीं है।
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इटली की प्रधानमंत्री जॉर्ज मेलोनी का जिन्होंने ग्रीनलैंड के मुद्दे पर अमेरिका को साफ-साफ दो टूक संदेश दिया है। मेलोनी ने कहा कि आर्कटिक क्षेत्र से जुड़ी सुरक्षा चिंताओं का समाधान नाटो के भीतर ही किया जाना चाहिए। दरअसल जॉर्जिया मेलोनी इन दिनों जापान के दौरे पर हैं। जहां इस दौरे के दौरान एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने ग्रीनलैंड को लेकर बयान दिया है। इस बयान में उन्होंने अमेरिका की ओर से उठाए गए सुरक्षा सवालों को गंभीर और जायज बताया है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि उस मुद्दे पर बातचीत और फैसला अटलांटिक गठबंधन यानी नाटो के ढांचे के अंदर ही होना चाहिए। मेलोनी ने आगे कहा कि ग्रीनलैंड की सुरक्षा नाटो के सभी देशों के साझा जिम्मेदारी है।
उन्होंने यह भी कहा कि आर्कटिक क्षेत्र में सहयोगी देशों की मौजूदगी को भी मजबूत करने पर विचार किया जाना चाहिए। लेकिन इससे आपसी मतभेद या विभाजन के रूप में नहीं देखना चाहिए। जॉर्जिया मेलोनी ने साफ किया कि ग्रीनलैंड को लेकर किसी भी तरह के जमीनी सैन्य हस्तक्षेप की संभावना बेहद कम है। उनके अनुसार यह एक राजनीतिक विषय है और इसका समाधान भी राजनीतिक बातचीत के जरिए ही निकलेगा। मेलोनी ने कहा कि यह इलाका सिर्फ अमेरिका के लिए नहीं बल्कि पूरे यूरोप और सभी देशों के लिए रणनीतिक रूप से अहम है। आपको बता दें कि ग्रीनलैंड के मुद्दे पर अमेरिका और यूरोप के बीच अब तनाव बढ़ता दिख रहा है। जहां राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफार्म ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए कहा कि 1 फरवरी से डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड्स, फिनलैंड और ब्रिटेन से आयात होने वाले सामानों पर 10% अतिरिक्त टेरिफ लगाया जाएगा।
जिसके बाद 1 जून से यह टेरिफ बढ़ाकर 25% तक कर दिया जाएगा। और टेरिफ का इस तरह बढ़ना तब तक जारी रहेगा जब तक ग्रीनलैंड पर कोई समझौता नहीं होता। वहीं यूरोप के कई बड़े नेताओं ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर पोस्ट करते हुए ट्रंप के टेरिफ की धमकी को गैर मंजूर बताया है और बोला है कि यूरोप इसका एक साथ जवाब देगा। अब देखना यह होगा कि ग्रीनलैंड को लेकर यह विवाद यूरोप और अमेरिका के रिश्तों पर क्या असर डालेगा।
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