सवा सदी पहले स्वामी विवेकानंद (नरेन्द्रनाथ दत्त) ने जिस आर्थिक प्रभुत्व की आहट महसूस की थी, वही आज 2026 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और पूरी दुनिया के सामने वास्तविकता बनकर खड़ा है। विवेकानंद ने स्पष्ट कहा था कि पश्चिमी ताक़तें केवल संस्कृति या व्यापार से नहीं, बल्कि अपनी मुद्रा—डॉलर—के ज़रिए दुनिया को जकड़ेंगी। उन्होंने यह भी भविष्यवाणी की थी कि इस प्रभुत्व को चुनौती पूरब से ही उठेगी। आज वही परिदृश्य सामने है: भारत एक कठिन मोड़ पर खड़ा है जहाँ उसे तीन विकल्पों में से चुनना है—अमेरिकी डॉलर के तंत्र का हिस्सा बने रहना, चीन प्रेरित ब्रिक्स की नई मुद्रा को बल देना, या फिर अपने रुपये की गिरती साख को बचाना।
विवेकानंद की दूरदृष्टि
12 जनवरी 1863 को कलकत्ता के एक कुलीन कायस्थ परिवार में जन्मे नरेन्द्रनाथ ने 1893 में हांगकांग और चीन के व्यस्त बंदरगाह कैंटन (ग्वांगझू) की यात्रा की थी। विवेकानंद ने चीन को उस समय एक ऐसे राष्ट्र के रूप में देखा था जो “फीनिक्स पक्षी की तरह राख से उठ खड़ा होगा” और पश्चिमी साम्राज्यवादी ताक़तों के बीच शक्ति का संतुलन पैदा करेगा।
जब वे अमेरिका पहुँचे और वहाँ की अर्थव्यवस्था का सूक्ष्म अवलोकन किया, तो उन्हें अहसास हुआ कि डॉलर केवल व्यापार का साधन नहीं, बल्कि प्रभुत्व का औज़ार है। उनके पत्रों में यह पीड़ा साफ़ झलकती है कि अमेरिका ने उन्हें “डॉलर साम्राज्यवाद” के जरिए छला। आध्यात्मिक आदान प्रदान के वादे के पीछे आर्थिक वर्चस्व का खेल छिपा था।
आर्थिक दृष्टि और भविष्यवाणी
विवेकानंद की दृष्टि केवल आध्यात्मिक नहीं थी, बल्कि आर्थिक राजनीतिक भी थी। उन्होंने लिखा कि चीन तेजी से श्रमिक वर्ग की ओर बढ़ रहा है और भविष्य में समाजवाद व सामाजिक क्रांतियाँ सत्ता का केंद्र बदल देंगी। उनका विश्वास था कि आने वाले समय में सत्ता का केंद्र पूँजी से श्रम की ओर और पश्चिम से पूर्व की ओर स्थानांतरित होगा।
भारतीय रुपया और डॉलर का संघर्ष
नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक, भारत ने रुपये और डॉलर के बीच संतुलन साधने की कोशिश की। नेहरू ने योजनाबद्ध औद्योगीकरण से स्थिरता का प्रयास किया, शास्त्री के दौर में युद्ध और अकाल ने विनिमय दर पर दबाव डाला। 1966 में इंदिरा गांधी ने निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए रुपये का बड़ा अवमूल्यन किया। राजीव गांधी ने तकनीकी आधुनिकीकरण और उदारीकरण की खिड़की खोली। 1991 में नरसिंह राव और वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने ऐतिहासिक ‘दो चरणीय अवमूल्यन’ से संकटग्रस्त अर्थव्यवस्था को बचाया।
2026 की स्थिति
जनवरी 2026 में रुपया डॉलर के मुकाबले ₹90 के स्तर पर है और वैश्विक रेटिंग एजेंसियाँ इसके ₹94 तक गिरने की आशंका जता रही हैं। ऊर्जा आयात और इलेक्ट्रॉनिक्स पर निर्भरता आज भी भारी पड़ रही है। विपक्ष लगातार हमलावर है कि मोदी सरकार रुपये की साख बचाने में विफल रही है।
मोदी की चीन नीति भी विडंबना से भरी है। 2015 में निवेश की उम्मीदें, 2018 की ‘वुहान स्पिरिट’, 2019 का महाबलीपुरम संवाद—इन सबके बावजूद डोकलाम, लद्दाख और गलवान के संघर्षों ने रिश्तों में कड़वाहट भर दी। 2025 में तियानजिन शिखर सम्मेलन में मोदी की शी जिनपिंग और पुतिन से मुलाकात ‘खट्टा मीठा’ अनुभव रही।
विरोधाभास और आँकड़े
2013 में मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी ने कहा था कि “रुपया गिरता है तो देश का इकबाल गिरता है।” लेकिन आँकड़े बताते हैं कि 2014 में डॉलर ₹58.58 पर था, जो जनवरी 2026 तक ₹90 तक पहुँच गया—यानी मोदी शासन में रुपये में लगभग 34% से अधिक की गिरावट आई।
ब्रिक्स और नई मुद्रा
2026 में भारत ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है। मुख्य एजेंडा स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और डॉलर पर निर्भरता कम करना है। चीन अपनी मुद्रा युआन को वैश्विक विकल्प के रूप में पेश कर रहा है। यह वही गूँज है जिसे विवेकानंद ने सवा सदी पहले पहचाना था—कि डॉलर के विरुद्ध प्रतिरोध पूरब से उठेगा।
प्रस्तावित ‘आर5’ डिजिटल मुद्रा फिलहाल एक लेखा इकाई के रूप में अंतिम चरण में है और 2026 शिखर सम्मेलन में इसके पायलट लॉन्च की संभावना प्रबल है। लेकिन मोदी के लिए यह कदम आसान नहीं है। यदि वे ब्रिक्स अध्यक्ष के रूप में इस नई मुद्रा को आगे बढ़ाते हैं, तो इसे वॉशिंगटन के वित्तीय प्रभुत्व पर सीधा प्रहार माना जाएगा। नतीजा यह हो सकता है कि अमेरिकी पूँजी भारत से बाहर निकलने लगे और डॉलर की आक्रामकता और बढ़ जाए—जो पहले से ही कमजोर रुपये को और गहरे संकट में धकेल सकती है।
इसीलिए भारत आज अभूतपूर्व दबाव में है। चीन कह रहा है कि अमेरिका भारत को ‘धमका’ रहा है और भारत की चुप्पी वाशिंगटन को और मजबूत करेगी। रूस भी भारत को डॉलर से किनारा करने के लिए उकसा रहा है। ऐसे में मोदी सरकार के सामने यह यक्ष प्रश्न है: क्या वे ब्रिक्स की नई मुद्रा प्रणाली को मजबूत कर डॉलर को चुनौती देंगे, या गिरते रुपये को बचाने के लिए अमेरिकी तंत्र का सहारा लेंगे?
डॉलर का हथियार
आज अमेरिका डॉलर की शक्ति का उपयोग स्विफ्ट नेटवर्क से बहिष्कार और प्रतिबंधों के लिए कर रहा है। वेनेज़ुएला और रूस इसके उदाहरण हैं। यही वह “डॉलर साम्राज्यवाद” है जिसे विवेकानंद ने सवा सदी पहले पहचान लिया था।
तो सत्य ये है
नरेन्द्रनाथ दत्त की अंतर्दृष्टि और नरेन्द्र मोदी की वर्तमान चुनौतियाँ एक ही सत्य के दो पहलू हैं। विवेकानंद ने डॉलर के उदय और उसके प्रतिरोध को भांप लिया था। आज मोदी को ऐसी दुनिया में भारत का नेतृत्व करना है जहाँ वह प्रतिरोध हकीकत बन चुका है, लेकिन उसके साथ नए जोखिम भी जुड़े हैं। भारत को अपनी मुद्रा की मजबूती और वैश्विक वित्तीय पुनर्गठन के बीच स्वाभिमान के साथ सूक्ष्म संतुलन खोजना होगा।
- ओंकारेश्वर पांडेय
(वरिष्ठ स्तंभकार, राजनीतिक विश्लेषक एवं चुनावी रणनीतिकार)
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